INTERVIEW!! ‘मुझे ऐसा लगता है आपके फ्लॉप आपको आपके हिट्स से ज्यादा सिखाते हैं’ – महेश मांजरेकर

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ज्योति वेंकटेश

तो आप कितने खुश हैं नटसम्राट फिल्म की सफलता से ?

जब मैंने नटसम्राट नाना पाटेकर के साथ बनाने का निश्चय किया तो मैंने एक बहुत बड़ा रिस्क लिया था, क्योंकि सबने मुझे पहले ही चेतावनी दे दी थी कि अगर मैं नाना पाटेकर के साथ नटसम्राट फिल्म बनाता हूं तो फिल्म बनने से पहले ही  खत्म हो जाएगी, क्योंकि नाना पाटेकर एक वर्सेटाइल एक्टर हैं पर नाना ने मेरा पूरा सहयोग किया और नटसम्राट के द्वारा ये साबित कर के दिखा दिया कि एक एक्टर हमेशा एक एक्टर ही होता है। नाना ने इस फिल्म में कोई नाना गिरी नहीं दिखाई जैसा कि लोग सोच रहे थे कि उन्हें कुछ ऐसा देखने को मिलेगा। आप मानेंगे मैंने जब नटसम्राट को बतौर एक फिल्म बनाने का निश्चय किया तब तो इसका ओरिजिनल प्ले भी मैंने नहीं देखा था। बल्कि जब मैंने ये फिल्म बनाई तो मेरी मराठी और भी अधिक सुधर गई। स्वागत भाषण यानि सोलिलोकी किसी भी प्ले की जान होता है ये फिल्म में तो नहीं है पर ये मेरी फिल्म नटसम्राट का एक पार्ट था जिसे लोगों ने भी पसंद किया। हमने इस फिल्म को बनाते समय टाइम नहीं देखा 36 घंटे लगातार काम किया। नितिन केनी और निखिल सने ने इस फिल्म को ऐसे बनाया जैसे ये कोई फिल्म नहीं बल्कि उनका अपना बेबी हो।

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आपने नटसम्राट में एक अभिनेत्री रीमा लागू के स्थान पर अपनी वाइफ मेधा को क्यों लिया इसकी कोई खास वजह?

असल में मैं और नाना उस समय काफी दुविधा में थे क्योंकि रीमा लागू ने खुद फिल्म शुरू होने के कुछ दिन पहले फिल्म करने से इंकार कर दिया था उस समय हम बहुत परेशान थे कि हमें ‘नीलकांति’ नाना की पत्नी और ‘मेधा’ मेरी वाइफ में से किसी एक को चुनना था अब मुझे लग रहा था कि नाना जरूर नीलकांति के लिए कहेंगे पर उन्होंने खुद कहा था कि हमें मेधा को कास्ट करना चाहिए। मैं उस समय मेधा की परफॉर्मेंस को लेकर काफी घबराया हुआ था पर मेधा ने बहुत अच्छा काम किया और ये सिर्फ मैं नहीं कह रहा सबने मेधा के काम की बहुत तारीफ की।

आप हिंदी सिनेमा के साथ साथ मराठी सिनेमा दोनों में एक साथ कैसे तालमेल बैठाते हैं ?

मैं हिंदी और मराठी सिनेमा में कोई अंतर नहीं समझता, क्योंकि मेरे लिए एक फिल्म एक फिल्म है, फिर चाहे वो हिंदी में हो या मराठी में और अगर फिर भी कोई ऐसा अंतर है तो मैं उसे मिटाना चाहूंगा।

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आप ऐसा क्यों सोचते हैं आज कल की मराठी फिल्मों का म्यूजिक उतना अच्छा नहीं है जितना अच्छा पुरानी मराठी फिल्मों में हुआ करता था ?

मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि जब मराठी सिनेमा के म्यूजिक को नए सिरे से तैयार कर उसका पुराना गौरव और पहचान उसे वापस दिलानी चाहिए। एक समय था जब मराठी सिनेमा में मराठी म्यूजिक एक अहम किरदार निभाता था और जिसके लिए मराठी सिनेमा बहुत सोचता भी था। पर अब मराठी म्यूजिक बहुत पिछड़ चुका है और अब लोग उस पर हसते हैं पर फिर भी अजित पूरब, शंकर एहसान लॉय, अवधूत और अजय अतुल जैसे संगीत निर्माता मराठी म्यूजिक मैं नई जान फूंकने मे लगे हुए हैं, मगर फिर भी मराठी फिल्म निर्माता मराठी म्यूजिक पर पैसे नहीं लगाना चाहते क्योंकि उनको लगता है कि मराठी म्यूजिक पर पैसा लगा कर उन्हें नुकसान ही होगा क्योंकि मराठी म्यूजिक को सेल कर के भी उन्हें वापस अच्छा लाभ नहीं होगा।

आपको नहीं लगता कि मराठी फिल्मों के मुकाबले हिंदी फिल्मों को थिएटर आसानी से मिल जाते हैं जबकि मराठी फिल्मों को बहुत मुश्किल का सामना करना पड़ता है ?

कौन कहता है कि हिन्दी मूवीज को थिएटर्स आसानी से मिल जाते हैं, आपको पता है कि अजय देवगन की ‘सन ऑफ सरदार’ जैसी मूवी को थिएटर नही मिल रहा था क्योंकि उसी डेट पर शाहरुख खान की ‘जब तक है जान’ रिलीज होने वाली थी तब अजय को अपनी मूवी मुंबई डेलिस्ले रोड के दीपक थिएटर में रिलीज करनी पड़ी क्योंकि ‘जब तक है जान’ के आगे उनके पास कोई विकल्प ही नहीं था। पर अब चीजें बदल रही हैं और नटसम्राट की सफलता ये स्पष्ट करती है। इससे पता चलता है जहाँ राह है वहां चाह है।

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अब आपका रुझान हिन्दी फिल्मों में दिखाई ही नहीं देता, क्या अब आप हिन्दी मूवीज नहीं बनाना  चाहते ?

मुझे बहुत से ऑफर मिले हिन्दी रीमेक बनाने के लिए जिसका आज कल काफी चलन है पर मुझे नहीं लगता कि मैं रीमेक फिल्म्स बना सकता हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि एक फिल्म निर्माता के तौर पर यदि मैं देखूं तो रीमेक बनाने में मेरी कुछ अलग करने की चाह कहीं दब जाती है या कह सकते हैं जो मुझे पसन्द नहीं और सबसे बड़ी बात जो बॉलीवुड के ज्यादातर स्टार के साथ पेश आती है कि उनके पास मेरी कहानी सुनने के लिए एक मिनट से ज्यादा समय नहीं होता वो मेरी कहानी सुनने की बजाए महेश बाबू की मूवी अपने बेडरूम मे देख कर निश्चय करना ज्यादा पसन्द करते हैं कि वो ये मूवी करना चाहेंगे या नहीं। पर यदि कोई ऐसा एक्टर हो जो मेरी फिल्म में दिल से काम करने के लिए सोचे, ना कि ये कि वो 100 करोड़ वाले सिनेमा का हिस्सा बनना चाहता है तो तुरन्त उस स्टार के साथ फिल्म बनाने को तैयार हो जाऊंगा और जिस कीमत पर और इतनी बड़ी तादाद में आज कल ये हिन्दी फिल्मकार साउथ की फिल्मों का रीमेक बना रहे हैं उस तरह तो ये ही लगता है की यदि साउथ की फिल्में बनाने वाले अपनी फिल्मों का अधिकार हिंदी फिल्म वालों को देना बंद कर देंगे तो मुझे डर इस बात का डर है कि कहीं हिंदी फिल्म बनाने वाले फिल्में बनाना ही बंद न कर दें।

तो कहीं आप ये तो नहीं कहना चाहते कि आप उन फिल्मों को बनाने के खिलाफ हैं जो बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ऊपर की कीमत पर बनाई जाती हैं?

क्या आपको पता है कि बतौर एक एक्टर मेरी कई फिल्म्स हैं जिन्होंने 100 करोड़ का बिजनेस किया जो सलमान खान और अक्षय कुमार की मूवी से भी ज्यादा हैं, बल्कि मेरे पास ऐसी सात से ज्यादा हिन्दी फिल्म्स हैं जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई की है जैसे दबंग और दबंग 2 (जिन फिल्मों में मेरे कई सीन हैं), वॉन्टेड, रेडी, बॉडीगार्ड, ओह माय गॉड एंड स्लमडॉग मीलियनर आदि ।

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आप हिन्दी फिल्मों की बजाय सिर्फ मराठी फिल्मों में ही एक्सपेरिमेंट करते हैं ऐसा क्यों है?

नहीं ऐसा बिलकुल नहीं है मैं हिन्दी फिल्म्स मे भी एक्सपेरिमेंट्स करता हूं जैसे कि मैंने अस्तित्व और निदान फिल्में की थी जो कि किसी ने भी नहीं देखी और अगर ऐसा कोई दिन आया जिस दिन सलमान खान मेरे साथ मेरी फिल्मों में काम करने को राजी हो तो मैं उनके साथ शिक्षणाचा आईचा घो और मी शिवजिराओ भोसले जैसी फिल्मों का हिन्दी रीमेक बनना चाहूंगा, जिसके लिए वो बिल्कुल सही एक्टर होंगे और वैसे भी हिन्दी फिल्मों ने मुझे ना सिर्फ एक पहचान दी बल्कि एक मुकाम भी दिया जो मुझे चाहिए था पर फिर भी मैं मराठी फिल्मों के साथ ही एक्सपेरिमेंट करना पसन्द करूँगा क्योंकि इसकी वजह हिन्दी फिल्में ही हैं।

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Mayapuri