INTERVIEW!! ‘‘मैंने उनके प्लस प्वाइंट यूज किये और माइनस प्वाइंट नजर अंदाज करता रहा’’ – राइटर डायरेक्टर अनीस बाज्मी-

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बतौर लेखक करीब पचपन फिल्में और लेखक निर्देशक पंद्रह फिल्में कर चुके अनीस बज्मी बॉलीवुड की नामचीन हस्ती है। अनीस जहां गंभीर फिल्म बनाने के लिये जाने जाते हैं वहीं हास्य फिल्म बनाने में भी उनका जवाब नहीं। वेलकम जैसी कॉमेडी फिल्म के बाद उनकी रिलीज होने वाली फिल्म का नाम ‘वैलकम बैक’। इस फिल्म को लेकर क्या कहना है अनीस बज्मी का।

एक नार्मल फिल्म और एक सीक्वल फिल्म में क्या फर्क होता है ?

आप जब एक नार्मल फिल्म बनाते हैं तो आपको सिर्फ एक अच्छी फिल्म बनानी होती है लेकिन जब आप कोई सीक्वल बनाते हैं तो आपके ऊपर एक प्रेशर होता है और अगर पिछली फिल्म वेलकम जैसी हो जिसमें बेहतरीन कलाकार हो जिन्हें दर्शक भी खूब पंसद करते हो तथा जो पिछले आठ साल से लगातार टीवी पर दिखाई जा रही हो तो वो प्रेशर सबसे ज्यादा होता है। हालांकि वेलकम के रिलीज होने के दूसरे दिन ही हमने ‘वेलकम बैक’ नामक टाइटल रजिस्टर्ड करवा लिया था लेकिन पूरे आठ साल तक वो सीक्वल नहीं बना पाये। जब सीक्वल बनाने का ज्यादा ही प्रेशर आ गया तो हमने फिर ये फिल्म शुरू की।

सीक्वल को लेकर क्या कहना है ?

यही कि जब हमने वेलकम बैक का प्लान बनाना शुरू किया तो कई कहानियों को टटोला। सही कहानी सामने आते ही हमने फिल्म शुरू कर दी और अब जल्द ही दर्शकों के सामने आने वाली है। सबसे बड़ी बात कि मैं मनी माइंडिड नहीं हूं। मेरा एक ही हिसाब हैं कि फिल्म इतनी चल जाए कि प्रोड्यूसर का पैसा निकल जाए और मुझे गालियां न पड़े ।

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इस बार इस सीक्वल में जॉन और नसीर जैसे कलाकारों की एंट्री हुई है ?

लोग कहते हैं कि अक्षय कुमार की जगह जॉन को लिया गया। सभी को पता है कि वे एक बेहतरीन एक्टर हैं जिन्हें कॉमेडी की बहुत अच्छी सेंस है वे कमाल की कॉमेडी और एक्शन करते हैं उनसे मेरी ट्यूनिंग काफी पुरानी हैं हमने साथ साथ फिल्में की है वे मेरे साथ काम करना चाहते हैं मैं उनके साथ काम करना चाहता हूं। लेकिन यहां कहानी दूसरी है। जॉन की बात की जाए तो उन्होंने वेलकम देखी थी और बाद में मुझे गले लगा कर कहा था कि क्या फिल्म बनाई हैं अनीस भाई। इसके बाद हम दोनों ही एक दूसरे के साथ काम करना चाह रहे थे। एक दिन मुझे लगा कि अगर फिल्म को उनके कंफर्ट जोन से निकाल कर कुछ अलग किया तो। इस तरह जॉन की एंट्री फिल्म में हुई। दूसरे जॉन ने भी कभी ऐसी फिल्म नहीं की थी, ऐसे डायलॉग नहीं बोले थे ऐसी ड्रेसिस नहीं पहनी थी। इस तरह वे बिल्कुल नये रूप में दिखाई देने वाले हैं।

जॉन की पर्सनेलिटी का उनके रोल में कितना योगदान रहा ?

बहुत योगदान रहा। दरअसल जॉन एक लंबा चौड़ा रौबदार पर्सनेलिटी वाला आर्टिस्ट हैं वो अपने रोल में खूब जंचा है। लेकिन पर्सनल लाइफ में भाई या दादा ऐसे नहीं होते, मैं तो मुबंई में खूब रहा हूं और यहां मैने ऐसे ऐसे दादे देखें है जिन्हें फूंक मारेंगे तो उड़ जायेंगे, उनका कहना होता है कि दादागिरी शरीर से नहीं, जिगर से होती है लेकिन फिल्म की बात और है। यहां एक लंबा चौड़ा रौबदार शख्स चाहिये था। ये सारी खूबियां जॉन में हैं। बतौर डायरेक्टर मैने उनके प्लस प्वाइंट ज्यादा यूज किये और माइनस प्वाइंट नजर अंदाज करता रहा ।

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क्या स्व.फिरोज खान का पर्याय नसीरूद्दीन शाह हो सकते हैं ?

खान साहब अपने आप में एक ही थे उनका विकल्प नहीं हो सकता। उनसे मेरे बहुत अच्छे ताल्लुकात हुआ करते थे। पहली वैलकम में मुझे उनका बहुत आर्शीवाद मिला। जंहा तक इस फिल्म के किरदार की बात की जाये तो ये एक बहुत बड़ा डॉन हैं जिसके लिये हमें बहुत उम्दा एक्टर की जरूरत थी और जब एक बढि़या एक्टर की बात आती है नसीर साहब से बड़ा एक्टर कौन हो सकता है। मैंने उनकी फिल्म स्पर्श देखी थी जिसमें वे अंधे बने थे। यहां भी वे एक ऐसे डॉन हैं जो कहने को अंधे हैं लेकिन उन्हें पता रहता है कि उनके पास बैठा शख्स कौन से कलर की कमीज पहने हुये है या उनके सामने जो लड़की खड़ी हैं वो कितनी खुबसूरत है ।

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फिरोज नाडियाडवाला के बारे में कहा जाता हैं कि फिल्म की शूटिंग के दौरान उनका इन्टरफेयर बना रहता है ?

मुझे जब पहली फिल्म के दौरान ये बात पता चली तो मैने उनसे इस बारे में जिक्र किया था, तो उनका कहना था कि मैं चाहता नहीं हूं लेकिन कई बार मुझे ये सब करना पड़ता है लेकिन आपके साथ मुझे कोई प्रॅाब्लम नहीं। इसके बाद सेट पर वे एक या दो बार ही आये होगें। इस फिल्म के क्लाइमेक्स की बहुत ज्यादा रिक्वायरमेन्ट थी जैसे घोड़े, गधे आदि तो उस समय वो सेट थे वरना उन्हें भरोसा था कि अनीस डायरेक्टर के अलावा प्रडयूसर भी है ।

आपकी फिल्म के किरदारों के नाम बहुत ही यूनिक होते हैं ?

मैं जब भी कोई कहानी लिखता हूं तो उसके किरदारों से बहुत प्यार करने लगता हूं। किसी भी कहानी के लिये मैं लोनावाला स्थित अपने बंगले पर चला जाता हूं और वहां इत्मिनान से सारे किरदारों के बारे में सोचते हुये लिखता हूं और हर किरदार को लिखते हुये ये नाम अपने आप सूझने लगते हैं। अब जैसे मेरा एक किरदार है मजनू  । यह आदमी प्यार में तीन आदमियों का मर्डर करके भाग गया, बाद में उसका नाम मजनू पड़ गया,  जबकि उसका असली नाम सागर पांडे था जिसे वो खुद भी भूल चुका है। जैसे आरडीएक्स, ये एक ऐसा आदमी है जिसे कितने ही मुल्कों की पुलिस ढूंढ रही है। अंडरवर्ल्ड में इसका बहुत बड़ा नाम है। इस फिल्म में नसीर भाई का वॉटेड भाई है। किसी भी किरदार का नाम से बहुत बड़ा ताल्लुक होता है  इसलिये मैं किरदारों के नामों पर ज्यादा ध्यान देता हूं ।

 


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Mayapuri

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