INTERVIEW!! ‘दोनों का सोचने और काम करने का तरीका लगभग एक जैसा है’ – अरशद वारसी

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अरशद वारसी का नाम सामने आते ही एक हंसमुख चेहरा सामने आ जाता है । मुन्ना भाई एम बीबीएस हो, धमाल हो या फिर गोलमाल हो । अरशद आपको हंसाते नजर आयेगें । उनकी काॅमेडी की टाइमिंग का जवाब नहीं । लेकिन निर्देशक सुभाश कपूर की फिल्म ‘गुड्डू रंगीला’ में वो अपनी इमेज के विपरीत नजर आने वाले हैं । क्यों । बता रहे हैं एक बातचीत में ।

इमेज से परे काम करने की कोई खास वजह ?

मैं काफी अरसे से कोई ऐसी फिल्म करने की सोच रहा था जिसमें मैं कुछ अलग करता नजर आऊं। सुभाश कपूर ने जब ये कहानी सुनाई तो दिल खुश हो गया । क्योंकि ऐसी ही फिल्म की तो मुझे तलाश थी ।

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लेकिन फिल्म के नाम से तो लग रहा है कि ये आपके टेस्ट की फिल्म है?

गुडडू रंगीला दो लोग है । इसमें मेरा काम गुडडू कर रहा हैं जबकि रंगीला यानि मैं गंभीर किस्म का बंदा है । मैने सुभाष से कहा था कि हमारे किरदारों के नाम बदल दो वरना लोग इसे चिटिंग मान सकते हैं । लेकिन उनका कहना था कि रंगीला शुरू से ऐसा नहीं था । वो भी कभी हंसने हंसाने वाला खुशमिजाज बंदा था लेकिन उसके साथ ऐसा हादसा हुआ कि उसके बाद वो ऐसा हो गया है । बावजूद इसके ऐसा भी नहीं हैं कि मैं हमेशा मुंह बनाये रहता हूं । यहां मैं नहीं बल्कि मेरी बाॅडी लैंग्वेज मुस्कराने पर मजबूर करती है ।

सुभाश कपूर की जाॅली एल एल बी और इस फिल्म में क्या फर्क है ?

फिल्में अलग हैं लेकिन मेरी भूमिकाओं में काफी सिमलेरिटी है । वहां भी मैं एक हद तक सीरयस रोल कर रहा था और इस फिल्म में भी मेरी ऐसी भूमिका है ।

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फिल्म में आपके सामने अमित और अदिति काफी नये हैं ?

हां ये तो है लेकिन आपके सामने नया आर्टिस्ट है तो आपको ये फायदा तो हैं कि आप उसे जैसे चाहे ढाल सकते हैं वरना कोई आपके बराबर या आपसे सीनियर बंदा हो तो कई बार दोनों की इगो आड़े आ जाती है । अमित बहुत ही सींसियर लड़का है । वो बहुत ही प्यारा और मेहनती है । इसी तरह अदिति भी अपने काम को लेकर काफी संजीदा रहती है । इन लोगों के साथ काम करके माजा आया।

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एक तरफ आप राजू हिरानी के साथ काम करते हैं । दूसरी तरफ सुभाष कपूर । दोनों में क्या फर्क है?

कुछ ज्यादा फर्क नहीं है । दोनों का सोचने और काम करने का तरीका लगभग एक जैसा है , दोनों में ढेर सारी चीजों को लेकर काफी सिमलेरिटी है । लेकिन मैने तो रोहित शेट्टी के साथ भी काम किया है । उनका तरीका सबसे अलग हैं वे आपको आपका सीन समझाकर खुला छोड़ देते हैं ।

किसी भी किरदार को आप किस तरह लेते हैं ?

मैं कभी किसी जिन्दा आदमी को अपने भूमिका के लिये फाॅलों नहीं करता । मैं पहले किरदार को सुनता हूं फिर समझता हूं । उसके बाद उसमें पूरी तरह से घुस जाता हूं । इस तरह अरशद की जगह वो किरदार दिखाई देने लगता है ।

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आपकी काफी फिल्में अनरिलीज्ड हैं ?

हां हैं ता जैसे 6 दिसबंर ऐ लव स्टोरी, भैयाजी सुपरहिट,मुन्ना भाई चले अमेरिका,टोटल धमाल तथा जमानत आदि । यंहा आर्टिस्ट कुछ नहीं करता । उसका काम एक्टिंग करना है । उसके बाद फिल्म के साथ सो लफड़े होते हैं जिनका प्रोडयूसर को ही पता होता है ।


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Mayapuri

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