INTERVIEW!! ‘‘राधा हर काम दिल लगाकर करती है..’’ अथिया शेट्टी

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मासूम मगर समझदार अथिया शेट्टी यूं तो बचपन से ही फिल्मों से जुड़ना चाहती थी, पर उन्होंने इस बात को कभी भी अपने पिता व अभिनेता सुनील शेट्टी या किसी अन्य के सामने जाहिर नहीं किया। पर जब वह अमेरीका पढ़ाई करने जा रही थी, तब उनके दिमाग में आया कि उन्हें अमेरीका में फिल्म विधा में ही उच्च शिक्षा हासिल करनी चाहिए। अमेरीका के ‘न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी’ में एक साल की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनेत्री बनने का निर्णय लिया और मुंबई वापस आ गयी। मुंबई में उन्होंने खुद को अभिनेत्री बनने के लिए तैयार करना शुरू किया। इसी तैयारी के दौरान उन्हें सलमान खान की तरफ से उनके प्रोडक्शन हाउस की फिल्म ‘हीरो’ में सूरज पंचोली के साथ हीरोईन बनने का अवसर मिल गया।

यदि आपके पिता सुनील शेट्टी अभिनेता न होते तो भी क्या आप अभिनत्री बनने की बात सोचती?

जरुर! मुझे भी बचपन से ही अभिनय में रूचि रही है। स्कूल के दिनों से ही मैंने नाटकों में अभिनय करना, स्टेज पर परफॉर्म करना शुरू कर दिया था। मैंने स्कूल में पढ़ाई के साथ डांस, ड्रामा, थिएटर किया है। मैं आइने/शीशे के सामने खड़े होकर नाचती थी। यदि यह कहा जाए कि बचपन से ही मेरा माहौल अभिनय और नृत्य का था, तो गलत नहीं होगा, लेकिन मैने इस बात को कभी भी स्वीकार नहीं किया था, जब मैं मुंबई के अमेरीकन स्कूल में 12 वीं कक्षा तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरीका आगे की पढ़ाई करने जा रही थी, तब मैंने सोचा कि मुझे किस तरह की पढ़ाई करनी चाहिए और उस वक्त मैंने ‘न्यूयार्क फिल्म अकादमी’ में प्रवेश लिया।

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पहली फिल्म ‘हीरो’ कैसे मिली?

सच कहूं तो मेरा छोटा भाई बचपन से ही फिल्मी हीरो बनने की बात किया करता था। वह अभिनेता बनने की बात भी किया करता था, जबकि जैसा कि मैंने पहले ही कहा कि मैंने ऐसा कोई निर्णय नहीं लिया था पर ‘न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी’ में एक साल की पढ़ाई करने के बाद मुझे लगा कि मुझे अभिनेत्री बनना चाहिए। न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी में मेरी दोस्ती अरमान जैन के छोटे भाई आदार जैन से हुई। हम दोनों अलग अलग अपार्टमेंट में रहते थे। वहीं से मेरी जिंदगी में बदलाव आया। मैंने कपड़ों को प्रेस करना, खाना बनाना सीखा। अपने अंदर की ताकत को पहचाना। न्यूयार्क में एक वर्ष तक अकेले रहते हुए मैंने अपने अंदर बहुत कुछ खोजा। जैसे ही मैं न्यूयॉर्क फिल्म अकादमी से कोर्स करके मुंबई पहुंची, मुझे फिल्म ‘हीरो’ का ऑफर मिल गया।

आपका अपना चरित्र क्या है?

मेरे चरित्र का नाम राधा है, राधा एक सकारात्मक चरित्र है और अपने पापा की लाड़ली बेटी है। वह आज की लड़की है, जो भी करती है, दिल लगाकर करती है। साधारण होते हुए भी डिटरमिनेंट हैं, बहुत स्ट्रांग और आत्मनिर्भर लड़की है।

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पुरानी फिल्म से इसमें क्या बदलाव है?

सुभाष घई निर्देशित फिल्म ‘हीरो’ एक कल्ट फिल्म है। जबकि हमारी फिल्म उसका रीमेक है, इसमें समसामायिक बदलाव किए गए हैं। हमारी फिल्म आधुनिक जमाने की है।

आपने पुरानी फिल्म देखी थी?

जी हाँ! लेकिन फिल्म साइन करने के बाद नहीं देखी। मुझे नकल नहीं करनी थी, मुझे फिल्म में मीनाक्षी शेषाद्री का डांस व अभिनय दोनों बहुत पसंद है। यह एक कल्ट फिल्म है। इसका संगीत भी मुझे बहुत पसंद है।

आपकी फिल्म रिलीज होने के बाद लोग आपकी तुलना मीनाक्षी शेषाद्री से करेंगे?

मैं तो यही चाहूँगी कि ऐसा न हो, मैं तो उनकी प्रशंसक हूं। उनसे मेरी तुलना हो ही नहीं सकती।

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सूरज पंचोली के साथ काम करने के अनुभव क्या रहे?

अच्छा अनुभव.. निःस्वार्थ भाव से दूसरे कलाकार की मदद करने वाले सह कलाकर हैं। सामने वाले कलाकार को हर सीन में ऊंचा उठाने का प्रयास करता है। उनके साथ दोबारा काम करना चाहूंगी।

फिल्म ‘हीरो’ की शूटिंग के दौरान सुभाष घई आते रहे होंगे, उन्होंने आपको कोई सलाह दी?

सेट पर सुभाष घई कभी नहीं आए, सलमान सर ऐसे निर्माता हैं, जो कि हर कलाकार को उसका पूरा स्पेस देते हैं। वह अक्सर सेट पर आते थे, एक्शन, संगीत, दृश्य को लेकर वह बात करते थे। वैसे शूटिंग शुरू करने से पहले हुए वर्कशॉप में मैंने बहुत कुछ सीखा था।

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वर्कशॉप के दौरान क्या क्या सीखा?

फिल्म की शूटिंग से पहले हमने किरदार को बनाने के लिए वर्कशॉप किया था। इससे कलाकार के तौर पर हमारे कॉन्फीडेंस का स्तर बढ़ा। मैं और सूरज एक साथ गेम खेलते थे, नृत्य करते थे, अंदर का डर निकाल कर सूरज पंचोली के साथ एक इक्वेशन बनाने का काम वर्कशॉप के दौरान हुआ। फिर हमने वर्कशॉप के दौरान कुछ सीन किए, जैसे इमोशन वगैरह कहां कैसा होगा, यह सब समझा। राधा की सोच उसके गुस्से की वजह आदि समझना भी इस वर्कशॉप का हिस्सा रहा।

गैर फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकारों को अक्सर स्टार कलाकारों के बच्चों से शिकायत रहती है कि ऐसे लोगों को आसानी से मौके मिल जाते हैं, इस पर आप क्या कहेंगी?

यह सच है कि हम कलाकारों के बच्चों की आलोचना की जाती है, पर हमारी आलोचना करने वाले भूल जाते हैं कि हम भी बच्चे ही हैं, जो कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए कठोर परिश्रम करते हैं। माना कि हमें अपनी प्रतिभा को साबित करने का प्लेटफार्म मिल जाता है, पर यहां अंततः प्रतिभा ही काम आती है। बॉलीवुड में रिश्ते के आधार पर फिल्में नहीं मिलती। यहाँ ‘सरनेम’ नहीं कठोर परिश्रम और प्रतिभा ही काम आती है।

कोई दूसरी फिल्म?

अभी तो ‘हीरो’ के रिलीज का इंतजार है।


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Mayapuri

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