दसवें ग्रह का नाम – देवानंद

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मायापुरी अंक, 55, 1975

कुछ ही दिनों पहले की बात है एक करोड़ रूपयों से भी अधिक लागत की, तेरह हजार फुट ऊंची हिमालय की बर्फीली चोटियों पर फिल्मायी गयी देव आनंद की आकांक्षापूर्ण फिल्म ‘इश्क इश्क इश्क’ फ्लॉप हो गयी तो एक ज्योतिषी महाराज जंत्र-मंत्र का कुछ टोटका लेकर देव साहब के पास पहुंचे। उन्होंने देव साहब पर प्रभाव ड़ालने की पूरी कोशिश की थी, पर देव साहब ने बड़ी फुर्ती से उनकी छुट्टी करते हुए कहा, मैं गीता के कर्म में विश्वास करता हूं, फल की चिंता नही करता और न कभी पीछे मुड़ कर देखता हूं मेरा काम है काम करते रहना, जो मैं कर रहा हूं कुछ और सेवा हो तो बताइये।

वे ज्योतिषी देव साहब से क्या लेकर लौटे, हमें नही मालूम? पर वे जहां भी जाते है उनकी चर्चा छेड़ देते है उनका कहना है कि 26 सितम्बर को गुरदास पुर में जन्मे देव आनंद पूर्व जन्म में योगी थे। विश्व विख्यात होने की उनकी एक तमन्ना पूरी नही हुई, इसलिए वे फिर से जन्म लेकर फिल्मी दुनिया में आये है।

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देव आनंद पूर्व जन्म में योगी थे या नही यह कौन जाने? पर हां, इस वक्त 52 वर्ष की उम्र में भी उनमें जो फुर्ती चुस्ती ताज़गी और नव चेतना है। आज भी जब वे चमकता सुनहरी शर्ट, पट्टू रंग का पेंट और काले रंग का चमचमाते जूते या डैकरॉन कॉटन लाल सफेद धारियों वाला स्पोटर्स शर्ट या चौड़े कॉलर वाला शर्ट और बड़ी गांठ वाली पीली टाई और पीला पैंट और चौड़ा पीली टाई और पीला पैंट और चौड़ा ब्राउन कमर पट्टा पहन कर सामने आते हैं तो बड़े छैल-छबीले और आज की नयी हवा के कॉलेज स्टूडेंट नज़र आते है। आज भी जब वे गले में रंग-बिरंगा चमकता स्कार्फ बांधकर, रूएंदार कोट को कंधे पर लटका कर प्यार के रंग में चमकती आंखो को मटका कर, अपने कोमल होठों के बीच एक टूटे दांत के खास अंदाज के साथ कुछ इशारा करते है तो लगता है वह आज की नयी पीढ़ी के हीरो हैं। कुछ लोग कहते है कि देवानंद ने जवानी को जीत लिया है। दिलीप कुमार उनकी उम्र से केवल एक साल बड़े है पर वे अपने उम्र की झुर्रियों को नही छुपा सके। राजकपूर उनसे केवल एक साल छोटे है पर वे देव साहब की तरह उम्र का मेकअप नही कर सके। और तो और, धर्मेन्द्र राजेश खन्ना उनसे छोटे है पर यदि तीनों को एक फिल्म में लिया जाये तो देव आनंद ही अधिक छैल-छबीले नज़र आयेंगे।

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देव साहब के सदाबहार यौवन को देख कर ना जाने लोग क्या-क्या कहते हैं? कुछ लोगों का कहना है कि उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी से फेस लिफ्ट कराया है पर बड़े-बड़े ब्यूटिशियनों का दावा है कि उनके चेहरे पर किसी तरह की कृत्रिमता नही है। उनके काले कजरारे बाल भी मिथ बने हुए है। उनके साथ काम करने वाली अनेक हीरोइनों ने उनके शरीर से बाल खींच कर इस राज को जानने की खूब कोशिश की कि वे नकली है या असली? इस संबंध में मुझे उनके एक नौकर ने बताया कि भले ही वे कभी विग लगाते हो, मुझे नही मालूम पर उनके असली बाल भी वैसे ही है क्योंकि वे उनकी बड़ी देखभाल करते है । उन्हें विदेशी शैम्पू से धोते है और कभी-कभी देशी औषधियों का भी प्रयोग करते हैं। वे घंटो बाथरूम बंद कर के मसाज करते है, तरह-तरह के रसायनों का इस्तेमाल करते हैं और एड़ी से चोटी तक एक-एक अंग की देखभाल करते है। वे अपने केवल शरीर की नहीं बल्कि आंख नाक, कान, हाथ पैर की उंगलियां और नाखून तक के का पूरा ध्यान रखते है। उनकी जवानी का राज़ या तो आपको उनके बाथरूम में मिलेगा या फिर उनकी खाने की टेबल पर वे जहां कुछ अंग्रेजी दवाइयों का, विटामिन की गोलियों आदि का इस्तेमाल करते है वहीं ताजे फलों का रस शहद, आवंला, त्रिफला चूर्ण, नीबूं और कुछ खास औषधियों का भी सेवन करते हैं। जिन्हें वे गुरुकुल कांगड़ी से मंगवाते है। नौकर के इस बयान से लगता है कि देव साहब अपनी खूबसूरती, अपनी ताज़गी और अपनी जवानी रखने के लिए बड़ी सावधानी बरतते हैं। पिछले दिनों, काफी भाग दौड़ के बाद जब साहिब बहादुर के सेट पर देव साहब से मुलाकात हुई तो अपनी सदाबहार जवानी के संदर्भ में उन्होंने मुस्कुरा कर खास अंदाज में कहा, आई बिलीव इन डिसीप्लेन ऑफ बॉडी एंड सोल मैं सब कुछ बेलेन्सड रखता हूं फूड एंड वर्क, बॉडी एण्ड माइंड मैं किसी तरह की टेंशन नही रखता मैं पीछे मुड कर नही देखता। बस आगे देखता हूं। मैं खाली कभी नही बैठ सकता। ‘इश्क इश्क इश्क’ का रेस्पॉन्स अच्छा नहीं हुआ, पर उस पर सोचने के बदले मैं आगे के प्रोग्राम के बारे में सोचने लगा। मैं यही कह सकता हूं कि मैं जो कुछ हूं अपने सेल्फ डिसीप्लेन से ही हूं।

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यह कितना शुभ संयोग है कि आत्मानुशासन में विश्वास करने वाले देव साहब की जिंदगी एक और गोल्डन जुबली है तो दूसरी ओर उनके करियर और उनकी निर्माण संस्था नवकेतन की सिल्वर जुबली आश्चर्य है कि इस मौके पर न शानदार पार्टियां हुई, न ट्राफियां बंटी और किसी तरह का हंगामा भी नहीं हुआ मैंने कहा, आप जुबली इयर इतनी खामोशी से क्यों मना रहे है?

देव साहब ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, नही तो यह तो बड़ा बम्पर और फैब्युलस इयर है एक और चेतन के डायरेक्शन में ‘जानेमन’ मोशन पिक्चर बन रही दूसरी और मैगनोफिशियेंट फिल्म है बुलेट जो गोल्डी के डायरेक्शन में बन रही है और तीसरी भी जल्दी फ्लोर पर जाने वाली है जिसे मैं डायरेक्ट करूंगा

अचानक मुझे याद आया कि नवकेतन की सिल्वर जुबली इयर की सबसे बड़ी फिल्म जाने वाली है जिसे मैं डायरेक्ट करूंगा।

अचानक मुझे याद आया कि नवकेतन की सिल्वर जुबली इयर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस मौके पर चेतन, गोल्डी और देव तीनों भाई अपने-अपने मतभेदों को भुलाकर फिर से गले मिल गए हैं। नवकेतन के लिए ‘अफसर’ आंधिया, और टैक्सी ड्राइवर का डायरेक्शन करने के बाद चेतन आनंद देव साहब से अलग हो गये थे। विजय आनंद ने भी ‘काला बाजार’ ‘गाइड’ और ‘ज्वैल थीफ’ का डायरेक्शन करने के बाद उनसे अलविदा ले ली थी। पर अब फिर तीनों मिल कर नवकेतन के ‘जुबली इयर’ को अपने-अपने डायरेक्शन में फैब्युलस फिल्में बनाकर ग्रैंड ‘सक्सेसफुल इयर’ मना रहे है।

पर एक दुर्घटना!

‘इश्क इश्क इश्क’ की असफलता के बाद ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ से देव जीनत की जोड़ी चमकी थी पर शीघ्र ही चमक दमक कर टूट गयी। जानेमन में हेमा है। जीनत नहीं। बुलेट में भी जीनत के बदले परवीन बॉबी को लिया गया है। ऐसा क्यों हुआ है?

ज़ीनत ने तो देव साहब की जिंदगी में वही स्थान बना लिया था जो सुरैया, कल्पना कार्तिक, गीता बाली और वहीदा रहमान ने बना लिया था। फिर हेमा ने तो ‘जॉनी मेरा नाम’ और ‘शरीफ बदमाश’ के बाद तो यह कहना शुरू कर दिया था कि देव साहब तो हर वक्त शीशे में ही मुंह देखते रहते है। बावजूद इसके देव आनंद को विश्वास है कि उनकी और हेमा की जोड़ी में वही कशिश है जो कभी सुरैया, गीता बाली और वहीदा रहमान और उनकी जोड़ी में थी। तो क्या देव ज़ीनत की जोड़ी में हरे राम हरे कृष्ण के बाद वैसी कशिश नहीं रही? क्या ‘इश्क इश्क इश्क’ की असफलता का आघात देव साहब बर्दाश्त नही कर सके? क्या कहीं इसी वजह से तो देव ने ज़ीनत से मुंह नही मोड़ लिया? इस तरह कई तरह के सवाल मेरे मन में उठ रहे थे। उन्हीं सवालों का उत्तर पाने के लिये मैंने देव साहब से सवाल किया, क्या जीनत आपके कैंप से अलग हो गयी? देव आनंद ने बड़ी गम्भीर मुद्रा से कहा मेरा कोई कैंप नही है।

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मुझे मेरा उत्तर नही मिला तो मैंने फिर पूछा, ‘जानेमन’ और ‘बुलेट’ में ज़ीनत क्यों नही है?

देव साहब ने टीचर की तरह अपना पाइंट ऑफ व्यू समझाते हुए कहा, ‘जानेमन’ में टिपीकल हेमा टाइप ‘डबल रोल’ है इतना ही नही,वह एक टेलेन्टेड एक्ट्रेस भी। और उसने हमारी ज़रूरत के अनुसार शूटिंग डैट्स भी दी है।

तो आप दोनों इस फिल्म में अपनी अपनी इमेज के अनुसार टिपीकल टेलर कट रोल कर रहे है?

मेरे इस सवाल पर देव साहब ने अपनी टिपिकल हंसी हंस दी। मूड अच्छा था, इसलिए मैंने फिर टटोला, ‘बुलेट’  में भी तो ज़ीनत ली जा सकती थी।

हां, क्यों नही, वह रोल उन्ही के लिए था पर उनके पास हमारी जरूरत के मुताबिक शूटिंग डेट्स नही थी क्योंकि पहले किसी को कमिट कर चुकी थी।

बिना आपके पूछे?

देव आनंद ने इस सवाल का उत्तर नहीं दिया बल्कि वे गम्भीर हो उठे।

आप दोनों आगे और किसी फिल्म में काम करेंगे?

देव साहब ने मुस्कुराकर इतना ही कहा, हम दोनों की शीघ्र ही ‘वारंट’ रिलीज़ हो रही है और उसके बाद आयेगी ‘डार्लिगं-डार्लिंग’।

देव आनंद ने ज़ीनत के साथ अपने संबंधो के बारे में खुल कर कुछ नहीं बताया पर जो कुछ भी उन्होंने कहा उससे यह आशंका जरूर होती है कि उन दोनों के सबंधों में पहले जैसी मधुरता नही रही तो हरे रामा हरे कृष्णा’ ‘हीरा पन्ना’ ‘प्रेम शास्त्र’ और ‘इश्क इश्क इश्क’ के दौरान पायी गयी थी। ‘इश्क इश्क इश्क’  की कलर बुकलेट में यहां तक लिखा था, चार पिक्चरों के बाद ज़ीनत अमान फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन का स्थान प्राप्त करने के लिए चुनौती पूर्ण रोल कर रही है और सुपर स्टार बनने जा रही है।

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उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनकी सफलता का राज़ यही है कि वे खूब मेहनत करते है और गहरी चोटों के बावजूद भी उनका धैर्य नही टूटता।

‘प्रेम पुजारी’ के रिलीज के वक्त कुछ तत्वों ने उनकी उस फिल्म का विरोध किया। जिसकी वजह से उन्हें काफी घाटा हुआ। इन घटनाओं का जिक्र छिड़ने पर देव साहब ने बड़ी गंभीरता से कहा, मुझे तो हर फिल्म के साथ किसी न किसी ओड सिच्युएशन का सामना करना पड़ा है। यह डर्टी पॉलिटिक्स है जिससे हम सबको नुकसान हो रहा है। आज भी कुशल माहौल नहीं है।

इसी संदर्भ में मैंने पूछा, आज के फिल्मी अखबारों के गॉसिप कॉलमों के बारे में आपका क्या कहना है।

देव साहब ने तपाक से कहा जिस सोसायटी में एक दूसरे पर कीचड़ उछाला जाता है, वह सोसायटी कभी प्रोग्रेस नही कर सकती।

कुछ लोग कहते है देव आनंद सेल्फ सेंटर्ड है, कुछ कहते हैं वह कंफ्यूज पर्सनेलिटी है, कुछ कहते है वे स्टाइलिश स्टार है, आर्टिस्ट नही, कुछ का कहना है कि वे रोमांटिक और इगोस्टिक है पर मैं उनके संपर्क में आने के बाद यही कह सकता हूं कि वे दसवें ग्रह की तरह है क्योंकि उन पर इन सब बातों का कोई असर नही होता। यहां तक कि टाइम और एज भी उनके सामने हार गए है।

देव आनंद कभी कभी रात को ऑफिस आकर एडीटिंग रूम में बैठ जाते है और अपनी निर्माणधीन फिल्मों को बारीकी से देखते है एक एक फ्रेम को। उस वक्त उनके कमरे में आइने नहीं होते बल्कि एडीटिंग रूम में आईने नही होते बल्कि एडीटिंग मशीन होती है, खुद होते है और उनके अपने सपने, और जब घर में होते हैं तो उनके आसपास किताबें होती हैं, स्क्रिप्ट होती है और होती है उनकी भावी योजनाएं फिल्मों के प्रति उन जैसा डिवोशनल हीरो कौन होगा कि तीन तीन दिन गुज़र जाते है कि वे अपनी पत्नी मोनिक (कल्पना कार्तिक ) का चेहरा भी ठीक से नही देख पाते।

और…

और फिर कभी…

महफिले इश्क है ये, लब न हिलाना तालिब अरे नादान यहां,

आंख जुबां होती है!!

देव आनंद फिल्म साहिब बहादुर में


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Mayapuri

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