दस कैरेट का हिंदुस्तान – डा. राही मासूम रज़ा

1 min


मायापुरी अंक 53,1975

हिंदुस्तान कई तरह के होते हैं। कबीर, नानक और चिश्ती का हिंदुस्तान. हिंदु-मुसलमान दंगो का हिंदुस्तान. खून पसीना एक करने वालों का हिंदुस्तान. मनु नारंगो का हिंदुस्तान. भविष्य के सपने देखने के लिये नींद टूटने वालों का हिंदुस्तान. हिंदुस्तान जय प्रकाश नारायण का रोग लग जाने से जिसकी नींद उड़ गई है। हमारा आपका हिंदुस्तान और सी-आई-ए का हिंदुस्तान… इन किस्मों के अलावा भी हिंदुस्तान की कई और किस्में हैं। परंतु जिस हिंदुस्तान की कोई बात ही नहीं करता, वह है फिल्मी हिंदुस्तान।

आज मैं उसी फिल्मी हिंदुस्तान की बात करना चाहता हूं।

मुझे इमरजेंसी का डर नहीं क्योंकि मैं न कहानियां स्मगल करता हूं न फॉरन एक्सचेंज। न आनंद मार्ग में हू, न जमायते-इस्लामी में। न मुरार जी भाई का चेला हूं। न मौलाना न दूध में पानी मिलाता हूं न नकली दवायें बेचता हूं.. तो मैं इमरजेंसी से क्यों डरूं? पर साहब मुंबई की एक फिल्म मासिक पत्रिका से डरता हूं। क्योंकि इस पत्रिका के ख्याल से मैं मशहूर होने के लिये झगड़े करता हूं गोया कि मैं मशहूर नहीं हूं इस पत्रिका वाले जिस हिंदुस्तान में रहते हैं, यह भी अनगिनत हिंदुस्तानों में से एक है कभी मूड आया तो इस हिंदुस्तान के बारे में भी बात करूंगा। यह हिंदुस्तान है पीली पत्रकारी का अरे भई मुझ जैसे शोहरत के शौकीन की तस्वीरें क्यों छापते हो?

मेरी हैसियत क्या है? मुंबई की इस पत्रिका वाले मुझे उर्दू के नमक हरामों में गिनते हैं और साथ ही साथ मुझे यह सूचना भी देते हैं कि उन्हें तो यह बात बहुत पहले से मालूम थी कि उर्दू कोई भाषा नहीं है।  यदि उर्दू कोई भाषा ही नहीं है तो मैंने नमक हरामी किस से की? यह तो पराये शगुन के लिए अपनी नाक कटवाने वाली बात हुई। पत्रिका वाले मुझे गालियां देने के लिये उर्दू को एक भाषा मान लेने पर भी तैयार हो गये… ऐसी पत्रिकाओं के युग में जवान खोलना ज़ोखिम का काम है। हो सकता है कि मेरा कहना सुनकर कि हिंदी फिल्मों के हिंदुस्तान का वास्तविक हिंदुस्तान से कोई ताल्लुक नहीं, यह लोग मुझे सी-आई-ए-या पाकिस्तान का एजेंट कहने लगें?

पता नहीं अपने देश में लोगों को विरोध करना कब आयेगा? राजनीति से लेकर साहित्य और पत्रकार तक लोग विरोध का मतलब ही नहीं समझते। क्या अच्छा हो अगर कोई युनिवर्सिटी विरोध का डिग्री कोर्स भी शुरू कर दे। और कुछ नहीं होगा तो कम से कम सलीके के विरोधी तो मिलने लगेंगे। वर्ना साहब हाल तो यह है कि उर्दू लिपि में दिल्ली से प्रकाशित होने वाली एक फिल्मी पत्रिका को मेरी एक बात बुरी लगी तो जवाब में उसने यह लिखा कि राही मासूम रज़ा लंगड़ा है। हिंदुस्तान के पीले पत्रकारों के सिवा भला ऐसा दो टूक और मुंह जवाब भला कौन दे सकता है? परंतु साहब वह जो हिंदी के महाकवि गालिब ने कहा कि।

“वो अपनी खूं न छोड़ेंगे,

हम अपनी वज्ज़ा क्यों बदलें…

मैं तो अपनी जबान

बंद नहीं करूंगा”

शुरू करता हूं साथ नाम अल्लाह के कि वही पीले पत्रकारों से जान बचाने वाला है। कहते हैं कि हिंदुस्तान में लिखे-पढ़े लोग कम हैं, पर लेखक ज्यादा हैं। जिसे कोई और काम करना नहीं आता, वह लेखक बन जाता है कि लेखक बनने के लिए, शायद, लिखा-पढ़ा होना आवश्यक नहीं है। यह तमाम लोग वह हैं जो अपने सपनों की दुनिया में रहते हैं और सपनों की उस दुनिया का वास्तविकता से कोई जायज़ या नाजायज़ ताल्लुक नहीं है। नतीजा यह निकलता है कि यह लोग अच्छे और महंगे में फर्क नहीं कर पाते।

हमारे लेखकों की पूरी खेप मध्यम या निचले-मध्यम वर्ग से आयी है… और शायद अपने वर्ग को पहचानते हुए शर्माती है। इसीलिये यह लोग अपनी फिल्मों में वह घर बनाने से कतराते हैं जो इनके अपने घरों से मिलते-जुलते होते हैं। यह ऐसे पात्र बनाने से घबराते हैं। जिनके बीच इनकी जिंदगी गुज़री है, उस भाषा का प्रयोग करने से डरते हैं जो इनकी अपनी भाषा है। हमारी ज्यादातर फिल्मी कहानियां लेखक के मध्यम वर्ग से भागने की कहानियां है। हमारी फिल्मों में गरीबी भारी मेक-अप किये नज़र आती हैं… इस हद तक कि कभी-कभी ऐसा लगता है कि जैसे गरीब होना कोई बड़ी अच्छी बात है। गरीब होने को जी चाहने लगता है। बात यही से बिगड़ने लगती है।

लेखकों से बात इसीलिये शुरू की गई है कि मैं खुद भी लेखक हूं।

कई हिट फिल्मी लेखकों को मैंने यह कहते सुना है कि अजी इन बातों को कौन देखता है। यह दो-धारी तलवार अपनी दोनों धारें लेखकों ही पर आज़माती है। एक तरफ तो इस रवैये का मतलब यह निकलता है कि हमारे दिलों में दर्शक की कोई इज्ज़त नहीं है और दूसरा मतलब यह निकलता है कि हमें अपनी जिम्मेदारी का कोई अहसास नहीं है। हम यह समझते हैं कि अच्छा लिखना हमारा काम ही है बल्कि दर्शक की आंखो में धूल झोंकना हमारा फर्ज है.. यह काम से जी चुराने की बात नहीं, यह काम न जानने की बात है। हम अपनी फिल्मी कहानियों के पात्रों का जीता-जागता आदमी नहीं समझते और इसीलिये खराब फिल्में बनाने में हमारा जवाब नहीं है। हम हॉलीवुड से भी ज्यादा गई-गुजरी फिल्में बनाते हैं।

फिल्मी लेखकों की दूसरी कमजोरी यह है कि हम यह समझते हैं कि हिंदुस्तानी जीवन इस लायक ही नहीं कि उस पर फिल्म बनाई जाये। इर्द-गिर्द के लोगों में कोई ऐसा है नहीं कि जिसके सांचे में हम अपने पात्र ढाले. तो हम अग्रेंजी के घटिया फिल्मों की नक्ल करने लगते हैं। कागज़ के रावण बनाने और जलाने ही को हम अपना काम समझ बैठे हैं.. जैसे कि हमारी कोई समाजी जिम्मेदारी ही न हो। आप समझ गये होंगे कि रावण की बात मैंने इर लिये निकाली है कि मैं फिल्मी हिंसा की बात करना चाहता हूं।

रामलीला हमारी सभ्यता का एक अध्याय है। रावण के जलाने पर भी हमें कोई ऐतराज नहीं। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जोर राम पर होना चाहिये। सच के लिये लड़ना भी चाहिए। मैं यह भी नहीं मानता कि फिल्मी हिंसा नवयुवकों को खराब कर रही है। जयप्रकाश नारायण हिंदी फिल्में के शौकीन नहीं है। नक्सलवादियों भी को हिंदी फिल्में देखने की आदत नहीं है। हिंदु-मुसलमान दंगे भी हिंदी फिल्मों के प्रभाव का नतीजा नहीं है। समाजी हिंसा की जड़ कहीं और है। मैं भी फिल्म में हिंसा का विरोधी हूं क्योंकि फिल्मों में जो लड़ाई दिखाई जाती है वह नकली होती है। अरे साहब श्रीराम को भी रावण पर चढ़ाई करने के लिये वानर सेना की जरूरत पड़ी थी। पर हमारी फिल्मों का हीरो कद में देवताओं से भी एक आध अंगुल आगे निकलता हुआ दिखाई देता है। वह अकेला स्मगलर के अड्डे पर पहुंच जाता है और मारते मारते उनका बखिया उधेड़ देता है। और इस लड़ाई में उसे चोट लगना तो दूर, उसका मेकअप तक भी नहीं बिगड़ता।

मैं फिल्मी हिंसा का विरोध इसलिये भी करता हूं कि अगर कुछ सीधे-सादे, ईमानदार नौजवान फिल्मी कहानियों के नायक से प्रभावित होकर किसी स्मगलकर के अड्डे पर जा निकलें तो बहुत पिटेंगे। क्योंकि यथार्थ जिंदगी में हीरो को पीटने वालों से यह नहीं कहा जाता कि पूरी जिम्मेदारी के साथ पीटे और इसका ख्याल रखें कि हीरो को चोट न लगने पाये। यह लड़ने वाले कलाकार पिटने की ही मजदूरी पाते हैं। वास्तविक जिंदगी में ऐसा नहीं होगा।

मुझे अपनी हिंदी फिल्मों से यही शिकायत है कि वह दर्शकों को जिंदगी से संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती। और सच पूछिये तो मार-पीट कहानी का हिस्सा भी नहीं, क्योंकि यदि ऐसा होता तो हिंसा के सीन को छंटाई से पूरी फिल्म बिखर जाती। यहां तो यह होता हैं कि बीस-बीस, तीस-तीस कट पाने के बाद भी फिल्में रिलीज़ होती हैं और दर्शक को पता भी नहीं चलता कि फिल्म का कौन-कौन सा हिस्सा कहां-कहां से काटा गया है? किसी कविता या कहानी से एक लाइन काट के देखिये। पूरी रचना बिखर कर बे मतलब हो जायेंगी, पर हम हर हफ्ते कटी छंटी फिल्में रिलीज़ करते हैं इसीलिए कि उनमें बहुत पैसा लगा हुआ है। गोया कि असल चीज़ फिल्म नहीं, पैसा है। यानी फिल्म सिर्फ एक उद्योग है। और फिल्म चूंकि सिर्फ एक धंधा है इसलिए हम लोग ‘स्मगल’ की हुई कहानियां धड़ल्ले से बेच रहे हैं। शायद प्रोड्यूसर भी इम्पोर्टेड माल के ठप्पे से रोब में आ जाता है।

नकली माल दो तरह का होता है फिल्मों के सिवा हर चीज़ में यह होता है कि नकली माल बेचने वाले असली पैंकिग और असली शीशी को वैसे का वैसा रहने देते हैं और ग्राहक उसी से धोखा खाता है। पर फिल्म में चोरी के माल की खपत का स्टाइल और है। यहां माल चोरी का होता है। पैकिंग बदल दी जाती है। फिल्मी कहानी हिंदुस्तानी माल के ठप्पे के साथ दर्शक के ऊपर थोपी जाती है। पात्रों के नाम बिल्कुल असली हिंदुस्तानी होते हैं। वस्त्र भी होते तो हिंदुस्तानी ही हैं पर यदि हीरोइन कश्मीरन है तब भी उसे राजस्थानी चोली-घाघरा पहनाई जाती है कि उसका बदन दिखाई देता रहे। कश्मीरन का बदन तो दिखाई ही नही देता। कड़ाके के जाड़ो में भी हीरोइन नायलॉन की साड़ी पहने बर्फ उछालती और गाने गाती इधर से उधर फुदकती फिरती है जैसे वह किसी कहानी की हीरोइन न होकर  किसी जाड़ा मार हवा का इश्तेहार है। हां, हीरो अलबत्ता अपने धंसे हुए सीने को चोड़ा चकला साबित करने के लिए गर्मियों में भी फुल ओवर पर सूट डटे ऐंठता दिखाई देता है। वह कुर्ते पजामे या धोती-कुर्ते में इसलिए नहीं दिखाई देते कि यह उनका वस्त्र ही नहीं है। चलिये यह तो हो गये पात्र। संगीत के बारे में कुछ कहना ही फिजूल है। यह बात किसे नहीं मालूम कि जो म्यूज़िक डायरेक्टर देसी संगीत पर ज़ोर देते हैं उनका पत्ता कट चुका है। और विदेशी धुनों पर हमारी भाषाओं में अच्छा गाना नहीं लिखा जा सकता क्योंकि भाषा और संगीत दोनों ही कोमों की चीजें होती हैं। अरबों के दस्तरख्वान पर मुजाफर अंग्रेजी के खाने को मेज मिर्चे का आचार अच्छा नहीं लगता भाषा ही की तरह संगीत का भी एक राष्ट्रीय चरित्र होता है। इसीलिए जब हिंदी फिल्मों के आसमान पर देशी संगीत का सूरज डूबा तो गानों में बसी हुई काव्य की महक भी तितर-बितर हो गई और गीतकारों की जगह तुकबंद आ गये… यूं यदि हम जरा गौर से देखें तो पता चलेगा कि हमारी फिल्मों में हिंदुस्तानी बहुत कम होता है।

कहानी   विदेशी

संगीत    विदेशी

वस्त्र      विदेशी

घर-बाजार  नकली

संवाद      लगभग देसी

प्यार       नकली

मार-पीट    नकली

लोकेशन      नकली

देख डालिये संवाद के सिवा कोई चीज हिंदुस्तानी नहीं है। कभी कभी तो फिल्मों के नाम भी अंग्रेजी में होते हैं।

इसीलिए तो कहता हूं कि हिंदी फिल्मों का हिंदुस्तान दस कैरेट का हिंदुस्तान हैं।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये