वाह रे कन्हैया लाल

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मायापुरी अंक, 55, 1975

वाह रे कन्हैयालाल, क्या अंदाजे-बयां है। जब भी आप पर्दे पर आते है कुछ ऐसा रंग जम जाता है कि धुले नही धुलता। चरित्र-नायक और खलनायक तो बहुत हुए है और आगे भी होंगे, पर आप में जो अदाएं है, वे भुलाये भूली नही जाती। वाह रे, कन्हैयालाल! अब बूढ़े हो रहे हो पर अभिनय में अभी भी वैसी ही तरंग, वैसी ही जवानी, वैसी ही ताज़गी, वैसी ही उमंग है जिसकी छाप मिटाये नही मिटती।

कन्हैयालाल जी, आप तो पूरे बनारसी है यदि आपके रूप-रंग, चाल-ढ़ाल हाव-भाव को देखकर हम आपको कन्हैयालाल बनारसी कहें तो ज्यादा अच्छा लगेगा। बनारसीपान की तरह आपके रोल भी विख्यात हो गये हैं। तीन दशक से अधिक समय से आप कंजूस सेठ, कठोर साहूकार, बदमाश मुनीम, लालची बनिया, चालाक नौकर, बेईमान पोस्टमेन, झूठे गवाह, गांव में फूट की आग लगाने वाले विभीषण की और न जाने कितनी भूमिकाएं कर चुके हैं और कर रहे हैं और भगवान करे आगे भी करते रहें। आपके भोलेपन के नीचे दबा खलनायक अंगार की तरह धधक रहा है और चरित्र-चित्रण की तरह चमक रहा है।

अब तक आपने जो भी रोल किये, अपनी-अपनी अदाओं के साथ जमकर उदाहरण बन गये। आज तो हाल यह है कि पर्दे पर धोती कुर्ता, गंजी या गंवाई जाकेट, साफा या गंवाई टोपी, हाथ में छड़ी या छाता धारण किये मूंछोवाली कोई छाया भी नज़र आ जाये तो दर्शक आपको पहचान कहेंगे ये तो कन्हैयालाल है फिर भी आश्चर्य की बात है कि आपके अभिनय में एड़ी से चोटी तक खालिस भूमिकाएं पसंद की जाती है। किसी ने कहा असली बनारसी ठग हैं तो कन्हैयालाल ही, जो हर भूमिका में अपना रूप रंग और हाव-भाव बदल कर दर्शकों को ठग लेते हैं।

वस्तुत:  देखा गया है कि आप एक्टिंग के लिए एक्टिंग नहीं करते बल्कि उसे जिंदगी का रस समझकर पात्र के चरित्र को बारीकी के साथ पेश करने की पूरी कोशिश करते हैं। यही वजह है कि चलने में, उठने में, हंसने में, आंखे मटका कर बातें करने में, चुटियां लटका कर गंवाई भोलेपन के साथ बातें करने में किसी को फंसाने के लिए जाल रचने की क्रिया में, यहां तक कि हंसने और खांसने तक में आपका मैनेरिज़्म कुछ इस तरह का होता है कि रोल में जान आ जाती है। वैसे आपके रोल बंधे-बंधाये रहते हैं और जब परदे पर आपका नाम आता है तो दर्शक कुछ कुछ समझ जाते है कि आप क्या बनने वाले है फिर भी उन सीमाओं में भी आपने अपनी भूमिकाओं को बासी नही होने दिया वर्ना अब तक टाइप्ड होकर महत्वहीन हो जाते। आप एक बार नही अनेक बार मुनीम बने हैं पर हर बार कुछ अलग हटकर दिखायी दें ऐसा प्रयास किया है आपने। यही वजह है कि आप मुनीम, सेठ, पुजारी, चोर, उचक्का, लफंगा, ठग बदमाश, होशियार, चुस्त तेज तरार्र, ग्रामीण और शहरी उस्ताद कुछ भी बन सकते है और बनकर दर्शकों को प्रभावित भी कर सकते है। पर हां कुछ लोग कहते हैं कि कन्हैयालाल कभी-कभी सीन में नाटकीय हो जाते है। कुछ यह भी कहते हैं कि वे अपनी भूमिकाओं में कुछ लाउड रहते है जहां हल्का टोन चाहिये, वहां भी वे तेज हो जाते हैं। जोर से बोलते हैं, चीखते चिल्लाते हैं, इस समीक्षा के बारे में वे बोले कि मेरे रोल ही हाइपिच वाले होते हैं। उनके कैरेक्टर में ही ड्रामा रहता है। आपने खुद आम जिंदगी में देखा होगा कि कुछ लोग इसी तरह रहते हैं जैसे वे ड्रामा खेल रहे हों। मैंने ऐसे साहूकारों को देखा है जो दिन रात बक बक करते रहते हैं। गांव में तो हर व्यक्ति अपनी टोन को ऊंचा रखता है ताकि उसका असर बना रहे। इस वजह से मैं उन भूमिकाओं को बनाने के लिए कभी-कभी लाउड रहता हूं करैक्टर का टैम्परैचर बराबर नही रहेगा तो उसे कौन ठीक से समझ पाएगा?  पर हां जान-बूझकर नाटकीय बन कर किसी सीन में हावी होने की कोशिश कभी नही करता और न कभी करूंगा।

kanhaiyalal
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कन्हैयालाल है जो अपने डायलॉग के साथ कुछ ऐसा तकियाकलाम निकाल लेते है जिसकी वजह से वह रोल कई दिनों तक याद रहता है। कभी कभी वे एक्टिंग करते हुए इस तरह मुहावरेदार डायलॉग ( जो अक्सर वे खुद सहज भाव से बना लेते है और निर्देशक से जिसकी स्वीकृति पा लेते है) बोल लेते है कि वे तीर की तरह असर करते है। गंगा जमुना में “राम बचाये कल्लू को अंधा करदे लल्लू को” यह डायलॉग उन्होंने इस तरह बोला कि उसके बाद कई दिनों तक कन्हैयालाल कहीं भी दिखायी पड़ते, परदे पर या परदे के बाहर तो दर्शक उस डायलॉग को बोलकर ही उनका अभिनंदन करते। ‘ताकियाकलाम’ के और मुहावरेदार डायलॉग के उस्ताद कन्हैयालाल कवि भी है, कथाकार भी है पर आश्चर्य इस बात का है कि पूरे बनारसी पंडे और पंडित होने के बाद भी फिल्मों में उनका अब तक सही उपयोग नहीं हुआ है। वैसे वे मुफ्त दवा की तरह अपने आइडिया बांटते रहे हैं पर उसका धंधा नही किया इसलिए अपनी सीमाओं में ही बंधे-बंधाये रह गये।

उनकी प्रतिभा के कायल थे स्व. महबूब खां जिन्होंने औरत को दूसरी ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाया तो बाकी सारे आर्टिस्ट बदल दिये पर कन्हैयालाल को नहीं बदला। उन्होंने उस वक्त यही कहा मेरी नज़र में उन जैसा खलनायक ‘मदर इंडिया’ के लिए और कोई नही है। इससे बड़ा प्रमाणपत्र कन्हैयालाल के लिए और क्या हो सकता है। मनोज कुमार की चर्चित फिल्म ‘उपकार’ में उन्होंने टिपिकल साहूकार की जो भूमिका की उसकी सभी क्षेत्रों में प्रशंसा हुई और कुछ समीक्षकों ने तो यहां तक लिखा कि वह करैक्टर उस फिल्म की जान है और कन्हैयालाल ने उस रोल को इस तरह साकार किया कि गांव का सही चित्र हमारी आंखो के सामने उभर आता है।

इसी तरह तरह ‘गंगा जमुना’  धरती कहे पुकार के, अपना देश, आदि में उन्होंने जिस तरह की सशक्त भूमिकाएं की है, उनसे वे किसी श्रेणी में शामिल नही होते बल्कि हट कर लगते है कन्हैयालाल कन्हैयालाल है और वे जिस तरह की ओजेस्वी खलनायक की भूमिकाएं करते आएं है, उन्हें केवल कन्हैयालाल ही कर सकते है।

कन्हैयालाल जिस तरह से फिल्मों में दिखायी पड़ते है वह एक अलग नज़र आते हैं। उनके बारे में कहीं लिखा है चरित्र में यह बनारसी छाप उनका खुद का बनारसी ठाठ है। बंबईया वातावरण में आज भी वे घर पर वही घुटन्नी धोती, पंडिताऊ बनियान पहने मिलेंगे। पान और भांग की तरंग के बिना पंडित कन्हैयालाल कहां और इसी तरंग के साथ-साथ उनका एक बहुत बड़ा शौक और है कविताई का.. बैठे-बैठे तुकबंदी शुरू कर देंगे। उनसे कहो पंडित जी इसे छपा क्यों नही देते? तो बिगड़ पडेंगे।

उनकी रचनाओं में व्यंग्य का पुट रहता है। सामयिक विषयों पर कविता लिखना उन्होंने आज भी नही छोड़ा। आप उनसे मिले तो हो सकता है आप पर ही कुछ लिख डालें वे आशुकवि है। बैठे-बैठे बिना सोचे-समझे धारा प्रवाह कविता रच कर उसी वक्त बोल लेते है। लिखना काहे का…

कन्हैयालाल इस वक्त 65 वर्ष के हो चुके हैं पर रोल करने में अब भी वैसी ही फुर्ती और चुस्ती है। वे अब भी चिरस्मरणीय भूमिकाएं करने के लिए छटपटा रहे है। यह छटपटाहट तो बचपन से ही रही है। फिल्मों में आने से पहले कन्हैयालाल का पूरा नाम पंडित कन्हैयालाल चतुर्वेदी था और वे इसी नाम से “नाटक आंख के नशे में” तबलेवाले की भूमिका में आये। मुंबई में भी वह इस नाटक को खेलने के लिए आये थे। उन्होंने इसे बड़ी लागत से तैयार किया पन्द्रह अगस्त को नाटक खेला भी, पर सेंसर के प्रकोप से वह चल नहीं सका। इससे उनको काफी घाटा हुआ और मुंबई में नाटक खेलने के सपनों पर पानी फिर गया। नाटक का शौक उन्हें बचपन से ही था। उनका मन पढ़ाई में कैसे लगता? उनके घरवाले उनकी हरकतों से परेशान हो उठे उन्होंने पहले किराने की दुकान पर उन्हें बैठाया। पर वे दुकान बंद कर नाटक देखने भाग जाया करते थे। नाटकों के इस पंछी को वे बांधकर नही रख सकते। उन्होंने उस पंछी को फिर हमेशा के लिए जुदा कर दिया जो सीधा नाटकों में चहचहाने लगा और वहां से फर्र से उड़ कर फिल्मों में आ गया। इस पंछी का नाम है पंडित कन्हैयालाल चतुर्वेदी।


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Mayapuri

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