INTERVIEW!! ‘‘मेरी फिल्म ‘तमाशा’ इंसान के तसव्वुर की यात्रा है…’’ – इम्तियाज अली

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‘जब वी मेट’, ‘रॉक स्टार’, ‘हाइवे’ सहित अपनी हर फिल्म में प्यार के एक अलग रूप को पेश करने में महारथ रखने वाले फिल्मकार इम्तियाज अली इस बार ‘तमाशा’ लेकर आ रहे हैं, जिसमें उन्होंने रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण के साथ दूसरी बार काम किया है। फिल्म ‘तमाशा’ में भले ही नायक रणबीर कपूर और नायिका दीपिका पादुकोण के बीच इंटीमेसी के सीन न हों, मगर इसमें भी प्रेम का अनूठा रूप नजर आएगा।

आप लेखक व निर्देशक दोनों हैं। आपने निर्देशक बनने के बाद कहानियां लिखना शुरू किया या?

ऐसा नही है। आप जानते हैं कि मैं किसी समय थिएटर में अभिनय किया करता था। जब मैं अभिनय करता था, तब भी सोचता था कि मैं लेखन करूं और निर्देशक बनूं। तो मेरी कई कहानियों का बीज उसी समय पड़ा था। मैंने ‘हाईवे’ की कहानी काफी पहले लिखी थी। ‘जब वी मेट’ और ‘सोचा ना था’ की कहानियां बाद में लिखी थी। ‘तमाशा’ की कहानी का बीज सबसे पहले पड़ा था।

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फिल्म ‘तमाशा’ की कहानी का बीज कैसे पड़ा था?

जिस उम्र का बच्चा मेरी फिल्म में है, उसी उम्र से यानी बचपन से मैं भी कई तरह की कहानियों की कल्पना किया करता था। बच्चे के तौर पर भी मैं अपने इर्दगिर्द कई तरह की कहानियों की कल्पना किया करता था। मेरी राय में तमाम दूसरे लोग भी अपने बचपन में इसी तरह की कहानियों की कल्पना किया करते होंगे या यूं कहें कि बचपन में जब हम कहानी सुनते हैं, तो उसे विज्युलाइज करते हैं। फिर चाहे वह ‘हीर रांझा’ हो या ‘लैला मजनू’। हम सभी इंसान कहानियां सुनकर कल्पना में जीते और इंज्वॉय करते हैं। मैं भी बचपन से ही कहानियों को लेकर कल्पनाएं करता आया हूं। शायद आप लोगों ने फिल्म ‘टू् मैन शो’ देखी होगी। जिसमें एक स्टूडियो है। पर हीरो को लगता है कि उसकी निजी जिंदगी चल रही है। जबकि वह टीवी पर एक डेली सोप होता है। तो मुझे भी लगता था कि कहीं मेरे चारों तरफ पूरी दुनिया नकली तो नहीं है और मुझे मूर्ख बनाया जा रहा है। कहने का अर्थ यह है कि अंततः पूरा संसार ही एक तमाशा है।

फिल्म ‘तमाशा’ क्या है? जो मैं देख रहा हूं वह है या कहानी में… ?

जो आप देख रहे हैं, वह भी तमाशा है। आपकी अपनी जिंदगी भी उन तमाशाओं में से है, जिसे कहानी कहा जा सकता है। वह तमाशा ही है। तमाशा निगेटिव हो यह जरूरी नहीं। कुल मिलाकर यह एक खेल ही है। गुरू गोविंद सिंह ने एक जगह कहा है -‘मैं परम पूरख का दासा, देखन आयो जगत तमाशा..’ तो हम सभी खुद भी तमाशा है और हर जगह तमाशा ही देख रहे है।

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आपकी पिछली फिल्म ‘हाईवे’ रोड ट्रिप वाली फिल्म थी। आप ‘तमाशा’ को क्या कहेंगे? स्टूडियो की यात्रा या इंसानी दिमाग की कल्पनाओं की यात्रा?

मेरी फिल्म इंसान के तसव्वुर की यात्रा है। हमारी फिल्म की कहानी तब शुरू होती है, जब इंसान अपने आपको अपनी कहानी की गिरफ्त में पाता है और वह खत्म तब होती है, जब इंसान अपनी कहानी खुद लिखने लगता है। वही हमारी फिल्म की यात्रा है।

आपकी हर फिल्म में प्यार व रोमांस का एक रूप होता है। ‘तमाशा’ में प्यार या रोमांस किस रूप में है?

एक कहावत है- ‘‘हर सफल पुरूष के पीछे एक औरत होती है।’ इसी रूप में ‘तमाशा’ में प्यार व रोमांस है। यहां दर्शन शास्त्र यह है कि हर उड़ते हुए परिंदे को ड्रम की आवाज सुनाई देती है, जो उससे कहता है कि घर वापस आ जाओ। तो अपने प्यार की तरफ मुड़ना, वह चीज है, जो आपकी जिंदगी को व आपको बचाती है।

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फिल्म में कहानी सुनाने के लिए प्रेरणा की जरुरत क्यों पड़ी?

हमारा नायक बचपन से कहानी सुनता रहा है। पर फिर वह अपनी जिंदगी में गिरफ्तार होकर कहानी भूल जाता है। फिर वह उसी से प्यार करता है, जो उसकी जिंदगी में आकर बिना कहे उसकी वास्तविकता को पहचान जाए और फिर उसे वैसा बनने पर मजबूर कर दे। ऐसा हर इंसान के साथ होता है।

बॉलीवुड में प्रवेश से लेकर अब तक आपके अपने सपनों में कितना बदलाव आया?

जब मैं बॉलीवुड से जुड़ा उस वक्त मेरा एकमात्र सपना था, कुछ अच्छा काम कर, पैसा कमाकर अपना घर चला लूं। फिल्म बना लेने की बात नहीं सोची थी। आज मेरा सपना है कि अच्छी फिल्में बनाऊं। मेरी हर फिल्म इतनी ठीक ठाक चले कि मुझे अगली फिल्म बनाने का अवसर मिल जाए।

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आप दर्शक के तौर पर अधूरी कहानी में यकीन रखते हैं या पूरी कहानी में?

मेरी राय में किसी भी कहानी का पूर्ण अंजाम नहीं होता। लेखक व निर्देशक के तौर पर यह मेरा हक बनता है कि मैं कहां से कहानी शुरू और कहां खत्म करूं। लेकिन जहां मैं कहानी खत्म करूंगा, मेरी कहानी के पात्रों की यात्रा उससे आगे जारी रहेगी। वह खत्म नहीं होगी। मतलब पात्रों की अपनी यात्रा चलती रहेगी। पर मैंने एक जगह जाकर रोका है। मैंने अब तक जो भी फिल्में बनायी हैं या मैंने जितनी भी फिल्में देखी हैं, उनकी कहानी वहीं खत्म नहीं होती है। मेरी राय में अधूरेपन में भी एक पूरापन है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका अपना नजरिया क्या है।

एक आम इंसान के तौर पर आप देश की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक स्थिति को किस तरह से देखते हैं?

इसे बारे में बहुत सोचता हूं, मेरी विचार धारा यह है कि हम एक कैपिटलिस्टिक मॉडल की ओर जा रहे हैं। हमारे इर्दगिर्द बहुत सी चीजें हो रही हैं, जिसे हम मजहब या किसी और चीज का नाम देते हैं। यह सारी चीजें एक तरह से इंटरनेशनल मार्केट मूवमेंट हैं, जिसमें लोग सैक्रीफाय हो रहे हैं।

 

 


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Mayapuri

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