INTERVIEW!! रेखा हर एक शब्द तोते की तरह याद रखती! – मुज़फ्फर अली

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निर्देशक मुज़फ्फर अली बॉलीवुड में एक जानी पहचानी हस्ती तो है ही। अपनी फिल्म “उमराव जान” और “गमन” के लिए वह अस्सी के  दशक से ही अपने काम के लिए जाने जाते रहे हैं।  उन्होंने पद्मश्री अवार्ड 2005 और 2014 में राजीव गांधी नेशनल सद्भावना अवार्ड भी जीता।

अब एक अरसे बाद वो दोबारा एक रोमांटिक एवं ऐतिहासिक फिल्म,”जांनिसार से फिल्मों में अपनी वापसी कर रहे है।

लिपिका वर्मा के साथ मायापुरी के लिए उन्होंने ढ़ेर सारी बातें की

इतने बरसों बाद फिल्म, “जांनिसार” लेकर आ रहे है क्यों?

दरअसल मैं अपनी फिल्म को लिखते हुए जीता हूं और मुझे काफी कुछ करना होता है फिल्म को शुटिंग फ्लोर पर ले जाने से पहले। मैं अपने शहर कोटवार के बच्चों के लिए एवं अन्य सामाजिक कामों में भी बहुत उलझा हुआ था । साथ ही मैंने बहुत सारे  म्यूजिकल फेस्टिवल  में भी भाग लिया है इस दौरान।

स्क्रिप्ट लिखते वक्त निर्देशक की हैसियत से मैं उस कहानी को लेकर जीता हूं ,सोता हूं और हर पल वह कहानी  मेरे जहन में रहती है। सो मेरे हिसाब से मैंने कोई भी ब्रेक नहीं लिया है। जब तक फिल्म की स्क्रिप्ट दुरुस्त नहीं होती तब तक स्क्रीन पर उसका सही  जलवा नज़र नहीं आता  है। अत: अब मेरी कहानी ,”जांनिसार” को लेकर आ रहा हूं।

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पनी मैगनम  ओपस प्रसिद्ध रचना फिल्म,”उमराव जान” से यादें ताजा करके हम कुछ बताएं ?

जी हाँ ! कुछ सालों पहले मुझे यह मालूम हुआ कि उमराव जान नाम से एक और फिल्म प्रदर्शित हो रही   है। कुछ पल के लिए मुझे बहुत खराब  लगा था किन्तु फिर मुझे इस बात का  एहसास हो गया कि मेरी फिल्म जनता के दरबार में है सो जो कुछ तय करना है वही लोग करेंगे. मीडिया ने भी इस फिल्म की तुलना मेरी, “उमराव जान” से करने के लिए मुझ से पूछा था, किन्तु मैंने यह फिल्म देखी  ही नहीं है सो मैं क्या बोलता। आखिर लोगों ने हमारी,”उमराव जान को बहुत प्रोटेक्ट किया था और उन्हें 80 की दशक  वाली उमराव जान बहुत अच्छी लगती है अब तक। यह जान कर बहुत खुशी तो होती ही है। मेरा यही  मानना है यदि सार फिल्म का अच्छा हो तो वो  बॉक्स ऑफिस पर अपने झंडे जरूर गाढ़ती  है। ”

रेखा के साथ काम किया है ,क्या कहना चाहेंगे रेखा के बारे में?

रेखा के अंदर बहुत ही ठहराव है। वह एक नेचुरल ब्यूटी है।  रेखा अपने उच्चारण और डायलॉग्स का बहुत ख्याल  रखती थी। वो बहुत ही मेहनती है। जिस तरह उन्होंने “उमराव जान” के किरदार को संभाला -कभी गिरते  हुए और फिर गिर के संभलते हुए, उनकी अभिनय शक्ति  वाकई कबीले तारीफ है। रेखा  अपने संवाद को तोते की तरह रट  लिया करती थी कहीं भी कोई भी गलती करने की गुंजाईश  कभी नहीं दिया करती। रेखा ने एक बहुत ही मंझे हुए  कलाकार की तरह काम किया है. उन्होंने चरित्र को जीवंत किया है  अपनी बेहतरीन अभिनय शक्ति द्वारा। उन्होंने अपनी बोलती आंखों से हमारी उमराव जान का चरित्र -चित्रण पर्दे पर ना  भूलने वाला एक किरदार बना ड़ाला। रेखा अपनी प्रेरणा एवं  अभिव्यक्ति द्वारा उमराव जान के चरित्र को बेहतरीन तौर से जी गयी। मेरा ऐसा मानना है की रेखा आज भी इस किरदार को  संभाले हुए हैं।

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कुछ सोच  कर मुज़फ्फर जी बोले, ” रेखा चरित्र के अंदर तक घुस जाया करती। वह बनावटी तरीके का इस्तेमाल यानि मेक-अप कम से कम किया  करती यदि मेक उप की जरूरत ना  हो तो भी शॉट देने को राज़ी हो जाया करती, खूबसुरती  तो उनकी बेमिसाल है ही । आज की हीरोइन मेक उप से अपने चेहरे को  बनावटी शक्ल दे देती  है, किन्तु रेखा मेक अप करके या मेकओवर करके अपने चहरे  को बनावटी कभी भी नहीं बनाना  पसंद करती। जैसे वह गाना  है ना  -,”इन आँखों  की मस्ती” अपनी  आँखों से उस गाने में खूबसुरती के  चार चाँद लगा दिए रेखा ने। उस वक़्त का माहौल बहुत ही स्वच्छ हुआ करता।

स्मिता पाटिल के साथ काम करने का अनुभव भी बताएं ?

स्मिता खुद ही एक अधूरी कहानी है। उनका जीवन  बहुत ही छोटा सा रहा। उनकी पहचान  फेनोमिनल थी। स्मिता का व्यक्तित्व बहुत ही अनूठा है। कोई भी उनकी बेहतरीन शक्ल की आकर्षण शक्ति को पहचान नहीं पाया। उनकी स्क्रीन  प्रजेंस बेहद ही खूबसुरत थी। जिसकी वजह से हर किरदार में वो फिट बैठा करती और उनकी अभिनय शक्ति  की तुलना हम किसी से भी नहीं कर सकते।  स्मिता के साथ, “गमन” फिल्म करते समय  उन्होंने मेरी सामाजिक आकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की सलाह दी।  स्मिता की ही वजह से मैंने अपने गांव के बच्चों के लिए  स्कूल खोले और उनकी उन्नति के लिए बहुत कुछ करने का फैसला लिया। उनकी आँखे और उनके शरीर का हर एक अंग बोलता सा था जिस की वजह से  वो हर किरदार अच्छी तरह  निभा पाती।”

 

 

 


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Mayapuri

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