INTERVIEW!! आदमी चाहे तो कुछ भी असंभव नही है – केतन मेहता

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माउंटेनमैन जैसे सब्जेक्ट पर फिल्म बनाना ही अपने आप में एक ऐसा कार्य है जिसे करना दृढ़ संकल्प और मेहनत और जज्ब़े के साथ ही किया सकता था। फिल्म के डायरेक्टर केतन मेहता हमेशा अपनी फिल्म के लिए सबसे हटकर विषय ही चुनते है एक ऐसी कहानी जो असंभव लगती है, उस पर फिल्म बना देना, अपने आप में एक मिसाल है। हरविन्द्र माकंड़ ने मायापुरी ऑनलाइन के लिए उनसे खास बातचीत की।

केतन जी मेरा पहला सवाल यही है कि ‘माउंटेनमैन’ ही क्यों?

देखिए जब मुझे यह कहानी पता चली कि एक ऐसा व्यक्ति था जिसने अकेले एक पहाड़ काट कर रास्ता बना दिया तो मुझे भी यकीन नही हुआ पर जब मैंने इस पर रिसर्च की और जाकर वो जगह देखी व उसके गांव वालों से बात की तो मुझे लगा कि ऐसे आदमी की कहानी तो हजारों लाखों लोगों के लिए प्रेरणादायक हो सकती है। वो व्यक्ति जिसने छैनी हथौड़े से पूरा पहाड़ काट कर रास्ता बनाया। वो था दशरथ मांझी 22 साल दिल रात अपनी धुन में अपना लक्ष्य पाने के लिए उसने पथरीले रास्तों को बनाने में खर्च किए। और आखिरकार यह साबित कर दिया कि मेहनत करने वालों की कभी हार नही होती।

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आपको फिल्म बनाने में काफी परेशानियां भी आई होगी?

हरविन्द्र जी, मत पूछिए.. दशरथ मांझी की कहानी फिल्माना भी एक तरह से पहाड़ का सीना चीरने जैसा था। हमने पूरी शूटिंग रियल लोकेशन पर की है। सो मेरी सारी यूनिट को रोज पहाड़ पर चढ़ना पड़ता था। गर्मी, सर्दी व आंधी को पहाड़ो पर सबने झेला पर सबने ठान रखा था कि यदि दशरथ मांझी इन पहाड़ो की सख्ती को झेल सकता है तो उसकी कहानी को जन जन तक पहुंचाने के लिए हम सारी परेशानियों को हंसते हंसते सह जायेंगे।

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क्या आप बताना चाहेंगे कि इस फिल्म से बच्चों को क्या शिक्षा मिलती है?

बहुत बढ़िया सवाल है.. आज का यूथ और बचपन सुविधाओं में पला बढ़ा है। आज उन्हें हर सुविधा, हर कार्य करने का सरल तरीका आसानी से मिल जाता है। पर यह फिल्म उन्हें शिक्षा देती है कि जरूरी नही कि हालात हमेशा हमारे पक्ष में ही हो.. कभी कभी जिंदगी मुश्किल राहों पर भी ले आती है और हमें तब अपनी मंजिल पाने के लिए कठोर व सख्त होना पड़ता है। हालात से लड़ना पड़ता है। और अंत में मंजिल खुद व खुद हमारे कदमों तले आ जाती है।

इस फिल्म के लिए नवाजुद्दीन ही क्यों?

नवाजुद्दीन एक बेहतरीन कलाकार है। वो चरित्र में समा जाना जानते है। वो दशरथ मांझी बन जाते है तो नवाजुद्दीन नही रहते। पहाड़ो पर कठिन परिस्थितियों में उन्होंने अपना रोल निभाया है। यहां तक कि उनके पांवो में चोट लग गई थी। और उन्हें कुर्सी पर बिठा कर, कंधो पर उठाकर पहाड़ पर ले जाना पड़ता था पर उन्होंने पूरी हिम्मत से अपना किरदार निभाया। इसलिए नवाजुद्दीन, नवाजुद्दीन है।

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आप दर्शकों को कोई मैसेज देना चाहेंगे?

बस, मेहनत करो.. मुश्किलों से लड़ना सीखो। हालात जैसे भी हो.. मुकाबला करो। जिंदगी लॉन्ग रूट का नाम है..इसमें शॉर्टकट नही होता। यदि होता भी है तो वो ज्यादा देर टिकता नही। सोना आग में तप कर कुंदन बनता है। पत्थर पर घिस जाने के बाद ही मेहन्दी में रंग आता है। सो आगे बढ़ो… लक्ष्य कुछ भी हो.. माउंटमैन की तरह उसे पाने में लग जाओ… यकीनन एक दिन तुम कामयाब हो जाओगे।

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Mayapuri

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