रियालिस्टिक संवादों को गाली कहना गलत बात है..’’ मुरली शर्मा

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लगभग बारह वर्ष पहले छोटे परदे से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाले मुरली शर्मा ने बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बना ली है। वह कई फिल्मों में मेन विलेन के रूप में नजर आए है. दक्षिण में प्रतिष्ठित नंदी अवार्ड हासिल कर चुके मुरली शर्मा ने अब तक दक्षिण की क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों के अलावा हिंदी व मराठी भाषा की फिल्मों की है, तो दूसरी तरफ उन्होंने कई सीरियलों में भी अपने अभिनय का जलवा दिखाया है।इन दिनों फिल्म ‘अपहरण’ के सात साल बाद फिल्म ‘चक्रव्यूह’ में अभिनय कर प्रकाष झा कैंप में वापसी को लेकर चर्चा में हैं, तो दूसरी तरफ वह बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित अति कंट्रोवर्सियल फिल्म ‘जीना है तो ठोक डाल’ को लेकर भी चर्चा में है।

॰ पूरे सात वर्ष बाद प्रकाश झा कैंप की फिल्म ‘चक्रव्यूह’ से जुड़ कर कैसा लग रहा है? इस वापसी के किस तरह देखते हैं?

– मैं इसे वापसी मानता ही नहीं। माना कि ‘अपहरण’ के बाद पूरे सात साल तक मैंने प्रकाश झा के साथ काम नहीं किया। पर हमारे बीच अनबन नहीं थी और न ही हम एक दूसरे से दूर ही थे. प्रकाश अपनी हर फिल्म में फिल्म के पात्रों में फिट बैठने वाले कलाकारों का चयन करते हैं। ‘अपहरण’ के बाद उन्होंने कुछ फिल्में बनायी, जिसमें उन्हें मेरे योग्य चरित्र नजर नहीं आया। जैसे ही फिल्म ‘चक्रव्यूह’ में उन्हें मेरे लायक चरित्र नजर आया, उन्होंने मुझे इस फिल्म के साथ जोड़ लिया।

॰ फिल्म ‘चक्रव्यूह’ व अपने चरित्र को लेकर क्या कहेंगे?

– यह फिल्म नक्सल समस्या पर है। इसमें मैंने नेगेटिव चरित्र निभाया है. एक बार फिर मैंने प्रकाश झा के साथ काम करते हुए काफी इंज्वॉय किया। इस फिल्म को हमने मध्यप्रदेश में भोपाल के आस पास फिल्माया है।

॰ लगता है कि नेगेटिव पात्रों के लिए आप हर फिल्मकार की पहली पसंद बन गए हैं?

– यह तो फिल्मकारों का बड़प्पन तथा दर्शकों का प्यार है, जो कि मुझे ऐसे चरित्रों में पसंद करते हैं। मैं भी अपनी तरफ से उनके वीजन पर खरा उतरने का पूरा प्रयास करता हूँ।

॰ आप पर यह आरोप लगता रहता है कि आप ज्यादातर पुलिस के पात्रों में ही नजर आते हैं?

– ऐस न कहे. मैंने हर तरह के चरित्र निभाए हैं। फिल्म ‘अजिंठा’ में तो गाँव का बूढ़ा जमींदार बना था.फिल्म ‘गली गली चोर है’ में एक भ्रष्ट पोलीटिशियन बना था। जिन फिल्मों में मैं पुलिस वाला बना हूँ, वह भी बहुत अलग-अलग रहे हैं. मसलन-बहुत जल्द लोग मुझे मनीष वात्सल्य निर्देशित फिल्म ‘जीना है तो ठोक डाल’ में एक अलग तरह के पुलिस वाले के रोल में देख सकेंगे।

॰ फिल्म ‘जीना है तो ठोक डाल’ के अपने पात्र को लेकर क्या कहेंगे?

– क्राइम ड्रामा प्रधान इस फिल्म में बिहार के चार आपराधिक प्रवृत्ति के लड़कों की कहानी है। जिसमें मैंने एक बिहारी पुलिस इंस्पेक्टर का पात्र निभाया है। इसका नाम हनुमंत सिंह है, जो कि एक निहायत ही घटिया और कमीना इंसान है. उसकी निगाह इस बात पर रहती है कि हर दिन शाम तक वह कितने पैसे इकट्ठा कर पाया है। उस क्षेत्र के चारों अपराधी लड़कों पर उसका अपना नियंत्रण है। पर एक दिन ऐसा आता है कि उसके हाथ से इन चारों लड़कों पर कंट्रोल खत्म हो जाता है, उसके बाद बहुत कुछ ऐसा होता है, जो कि दर्शकों को सोचने पर मजबूर करेगा. पर मेरा किरदार हर दर्शक को पसंद आएगा।

॰ फिल्म के जो प्रोमो जारी हुआ है, उससे तो फिल्म में सिर्फ गालियां होने के ही आरोप लग रहे हैं?

– माना कि इस फिल्म में कुछ आपत्तिजनक संवाद हैं। पर मेरी समझ में यह नहीं आता कि लोग इन संवादों को लेकर इतनी हायतोबा क्यों मचा रहे हैं। इस फिल्म के जो संवाद हैं, वह फिल्म की कथा वस्तु, कहानी के माहौल और परिवेश के अनुसार हैं. फिल्म को बहुत ही रियालिस्टिक स्तर पर बनाया गया है. जिस परिवेश की कहानी है, उस परिवेश में आम बोल चाल में जिस तरह से लोग शब्दों का उपयोग करते हैं, उन्हीं शब्दों का उपयोग इस फिल्म में किया गया है. एक ही शब्द के अलग-अलग माहौल में अलग-अलग अर्थ हो जाते हैं। कुछ लोगों को गाली लगती है. पर मुझे लगता है कि फिल्म के माहौल के अनुसार इस फिल्म के संवाद बहुत अच्छे है। सच कहूँ तो मेरी राय में फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसके संवाद हैं। दूसरी बात अब दर्शक भी कुएं का मेढक नहीं रहा. दर्शक काफी ग्रो हो चुका है. उसे भी इस बात की समझ है कि फिल्म में कहानी क्या है और कहानी के अनुसार जो संवाद हैं वह गाली है या नहीं. इस फिल्म में शब्दों का खेल काफी नजर आएगा।

॰ क्या आपने इस फिल्म के लिए खास तौर पर बिहारी भाषा सीखी है?

– बिहारी भाषा मैं पहले ही सीख चुका हूं। सात साल पहले जब मैंने प्रकाश झा के साथ फिल्म ‘अपहरण’ की थी, तब एक कठोर प्रिंसिपल की तरह उन्होंने मुझे बिहारी भाषा सिखा दी थी। मुझे बिहारी भाषा में महारत हासिल हो चुकी है। इस भाषा को मेरे अंदर पिरोने के लिए उन्होंने मुझे बहुत घिसा था। वैसे बिहारी भाषा बहुत मीठी भाषा है। इसका अपना एक अलग मजा है।

॰ प्रकाश झा, रोहित शेट्टी जैसे कई दिग्गज निर्देशकों के साथ काम करने के बाद मनीष वात्सल्य जैसे नवोदित निर्देशक के साथ काम करना?

– इसमें अचरज वाली तो कोई बात नहीं होनी चाहिए।एक दिन मैं ही बहुत नया था। मैंने तो फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए ही सीखा। जबकि मनीष वात्सल्य फिल्म निर्देशित करने से पहले पांच फिल्मों में अभिनय कर शोहरत बटोर चुके हैं। दूसरी बात वह स्वयं बिहार के पूर्णिया क्षेत्र के ही रहने वाले हैं. जहाँ के परिवेश में इस फिल्म की कहानी रची बसी है। इसमें मुख्य भूमिका निभायी है. पूरी फिल्म की षूटिंग के दौरान मुझे इस बात का अहसास ही नहीं हुआ कि मैं एक नए निर्देशक के साथ काम कर रहा हूं. हमने इस फिल्म को बिहार के पूर्णिया के ठेठ गाँव में यानी कि वास्तविक लोकेशन पर फिल्माया है। इस फिल्म के संबंध में मनीष वात्सल्य जब मुझसे मिले, तो उसने मुझे दो सीन सुनाए. उन दो सीन ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने मनीष से कहा कि मुझे स्क्रिप्ट नहीं सुननी है। मैं यह फिल्म करने को तैयार हूँ. पूरी फिल्म की शूटिंग करते हुए मैंने इंज्वॉय किया। अब जब कि यह फिल्म रिलीज होने वाली हैं, तो बहुत खुश हूं। क्योंकि एक बेहतरीन कथानक वाली फिल्म में मुझे कुछ बेहतरीन काम करने का मौका जो मिला है।

॰ इसके अलावा कोई फिल्म कर रहे हैं?

– कई फिल्में कर रहा हूँ। जिसमें से एक फिल्म हैं उमेष शुक्ला निर्देशित ‘ओह माई गॉड’ इसे परेश रावल व हेमल ठक्कर ने अक्षय कुमार के साथ मिलकर बनाया है। इस फिल्म में भी मेरा नेगेटिव किरदार है। फिल्म ‘ओह माय गॉड’ में पोलीटिशियन का किरदार निभाया है. इसमें परेश रावल के साथ-साथ अक्षय कुमार भी हैं। बहुत बेहतरीन किरदार हैं। फिल्म ‘माई फ्रेंड गणेशा भाग 4’ में मैं एक पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार निभा रहा हूँ। फिल्म ‘जिंदगी फिफ्टी फिफ्टी’ में महाराष्ट्रियन यानी कि मराठी भाषी पुलिस अफसर का किरदार निभा रहा हूँ।

॰ टीवी को बाय बाय कर दिया?

– ऐसा नहीं। फिल्मों में व्यस्त होने की वजह से टीवी कम कर रहा हूँ। पर जब भी कोई चुनौतीपूर्ण किरदार आता है, तो कर लेता हूँ। टीवी से एलर्जी नहीं हो सकती। वह तो बड़ा माध्यम है। मैं तो षुरू से ही टीवी पर काम करता आया हूँ।

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Mayapuri