‘‘गुलजार साहब से लेकर अनीस बज्मी तक’’ ‘मेरे लिये इतनी बड़ी फिल्म का थीम सांग तैयार करना बहुत बड़ी बात थी’ सिंगर कंपोजर- अभिषेक रे

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होनहार बीरवान के होत चीकने पात वाली कहावत साकार करते अभिषेक रे ने महज सोलह साल की उम्र में टीवी पर म्युजिक कंपोज करना षुरू कर दिया था। उस उम्र में ही उसने ढेर सारा म्यूजिक बैंक बना लिया था। बाद में फिल्मों के लिये अभिषेक के चक्कर दिल्ली से मुबंई भी लगने लगे। एक बार एक हवाई यात्रा में उसकी मुलाकात गुलजार साहब से हुई तो उसने उन्हें अपनी कंपोजिंग कैसेट उन्हें दे दी लेकिन उसे जरा भी विश्वास नहीं था कि उसकी कम उम्र को देखते हुये गुलजार साहब उसे सीरियसली लेगें, लेकिन उसके पास सिर्फ दो दिन बाद ही गुलजार साहब का फोन आया उन्होंने उसकी कंपोजिंग की तारीफ करते हुये मिलने के लिये कहा।

अभिषेक गुलजार साहब से मिला और उसके बाद उसने उनके साथ दो एलबम बनाये ‘उदास पानी’ तथा ‘रात चांद और मैं’ वे दोनों एलबम अलग मूड के थे उनमें कंपोजिंग के अलावा उसने  सारे गाने गाये भी थे। इस प्रकार अभिषेक की एन्ट्री बॉलीवुड में हो गई, बाद में अभिषेक ने ढेर सारी उन फिल्मों के भी गीत कंपोज किये जिनमें एक से ज्यादा म्यूजिक कंपोजर होते हैं। लेकिन उसकी सोलो फिल्में हैं हासिल, ये साली जिन्दगी, शागिर्द, आई एम कलाम, साहेब बीवी और गैंगस्टर तथा पान सिंह तोमर। अभिषेक रे को निर्देशक अनीस बज्मी ने अपनी फिल्म ‘वैलकम बैक’ का टाइटल करने का अवसर दिया। इस तरह अभिषेक रे का अब कमर्शियल फिल्मों में भी पर्दापण हो गया है। छोटी से उम्र में अभिषेक इतने टेलेंटिड हैं कोई भी उनसे प्रभावित हुये बिना नहीं रहता ।

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बेसिकली अभिषेक कोलकाता से हैं। उनकी मां क्लासिकल विषारद सिंगर थी और पापा गिटारिस्ट लेकिन वे कभी पेशेवर नहीं बने क्योंकि दोनों ही वर्क करते थे लेकिन घर का माहौल पूरी तरह संगीत का था। बावजूद इसके मैंने कभी म्यूजिक की पढ़ाई नहीं की मैं कॉलेज में था उस वक्त भी फिल्मों में काम कर रहा था। मेरी पहली फिल्म तिग्मांशू धूलिया की हासिल थी उसका मैंने बैकग्राउंड म्यूजिक और एक सैमी क्लासिकल गाना कंपोज किया था। उस वक्त मेरी उम्र उन्नीस  साल थी। इससे पहले अभिषेक ने महज चौदह पंदरह साल की उम्र में टीवी पर जिंगल्स और एड फिल्मों में म्यूजिक देना शुरू कर दिया था। सबसे बड़ी बात कि अभिषेक ने हमेशा अकेले काम किया। जंहा तक म्यूजिक सीखने की बात हैं तो क्लासिकल मैंने अपने मम्मी डैडी से सीखा बस वैस्टर्न म्यूजिक में मैने पियानो बाहर से सीखा करीब आठ साल तक । इसके बाद एड और जिंगल्स करते करते फिल्मों तक पहुंचा। जैसा कि मैने बताया कि एयरपोर्ट पर गुलजार साहब से मिलने के बाद मैने जो गलती वो आज नहीं करता। गलती ये कि मैने उन्हें अपनी कंपोजिंग दे दी थी। उस वक्त मैं शायद चौदह पंदरह साल का था। मेरी खुशकिस्मती थी कि मुझे उन्होंने सीरियस लिया और मेरी कंपोजिंग सुनी और मुझे अपने पास आने का न्यौता दिया ।

ABHISHEK RAY---2015-09-01 09.32.13

अभिषेक का कहना है कि पान सिंह तोमर के बाद मेरे पास इसी तरह की फिल्मों के ऑफर आने लगे तो मैने कुछ दिन चुप रहना ठीक समझा। दरअसल मेरे पास हार्डकोर कमर्शियल फिल्मों की कंपोजिंग का संग्रह बहुत सारा जमा हो चुका था, दूसरे मैं कब तक एक ही तरह की फिल्में करता रहता। क्योंकि एक ही तरह की फिल्में करते हुये मुझे दूसरे रंग दिखाने का मौका नहीं मिल पा रहा था। इसलिये पिछले दो सालों के दौरान मैने काफी फिल्में मना की। दरअसल मैं कोई बड़ी कमर्शियल फिल्म का इंतजार कर रहा था। अनीस अज्मी भी बहुत ही मेहनती और सुलझे हुये लेखक निर्देशक हैं तभी वे नौ बडे स्टार्स को लेकर एक बड़ी फिल्म बना पाये। जबकि एक हीरो को लाने में एक डायरेक्टर को सालों लग जाते हैं। उनके लिये मेरे इस गाने को इतनी बड़ी फिल्म का थीम सांग बनाना कम से कम मेरे लिये तो बहुत बड़ी बात रही। उन्होंने मेरे काफी गाने भविष्य के लिये रख भी लिये लेकिन इस गाने के लिये उन्होंने मुझे कहा कि अभिशेक ये फिल्म थोड़ी कांप्लिकेटिड हैं क्योंकि इसमें रोमांस भी हैं माफिया भी है और कॉमेडी भी है। मुझे ऐसा गाना चाहिये जिसमें पूरी फिल्म का निचौड़ हो। मैंने ऐसा ही गाना उन्हें दिया। जिसमें सारे किरदार आ जाते हैं। इस गाने को मैने ही गाया है। आज या कल इस गाने को रिलीज किया जा रहा है। अभिषेक साउथ की भी कुछ फिल्मों में संगीत दे चुके हैं उनकी तमिल में एक फिल्म सुपर हिट साबित हुई थी ।

अभिषेक को बंजारो की तरह भटकना पसंद हैं वो कभी भी पहाड़ों या बियाबान जंगलों में निकल जाते हैं और वहां महीनों रहते हुये खामोश जिन्दंगी का आनंद लेते हैं। उत्तराखंड में उनकी जमीन हैं जिसके चारों और जंगल है। वहां वे शांत वातावरण में संगीत की रचना करते हैं।

 


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Mayapuri

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