स्टेज मेरा मंदिर है – नरेन्द्र चंचल

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मायापुरी अंक, 55, 1975

राजधानी की एक सांस्कृतिक संस्था द्वारा आयोजित रंगारंग कार्यक्रम में जब फिल्म ‘बॉबी’ के सुप्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र चंचल के आने का समाचार मिला तो इच्छा जागृत हुई कि इस कलाकार से मिला जाये। वैसे भी मेरे मन में उत्सुकता थी कि सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक राजकपूर ने इस कलाकार में उस वक्त ऐसा क्या कुछ देखा था जो अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म ‘बॉबी’ में गाने का अवसर दिया।

टेलीफोन पर गायक चंचल जी से अपाइंटमेंट लेने के उपरांत जब मैं होटल पहुंचा तो पाया कि चंचल कुछ कला पारखियों के बीच घिरे है। मैंने उचित यही समझा कि क्यों न मौके का फायदा उठाकर श्री आनंद (चंचल के मैनेजर) से ही बातचीत की जाये। उन्होंने चंचल जी के प्रोग्राम और उनकी आनेवाली फिल्मों के बारे में जानकारी देते हुए एक महत्वपूर्ण बात यह बताई कि चंचल भाई फिल्मी माहौल में होते हुए भी शुद्ध रूप से शाकाहारी है, मांस मदिरा के सेवन से बहुत रहते है साथ ही मां भगवती के पुजारी है।

जब में श्री चंचल के कमरे में घुसा तो वास्तव में मुझे ऐसा लगा कि मैं किसी धार्मिक प्रकृति वाले व्यक्ति के पास पहुंचा गया हूं। बड़ा प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं सौम्य चेहरा देखने के बाद प्रभावित हुए बिना न रह सका। बड़ी आत्मीयता से मुझे अपने पास बैठाया और कहा कि श्रीमान जी, आपको कुछ इंतजार करना पड़ा मेरी मजबूरी थी, कोई बैठा हुआ था, उससे कह भी नही सकता था कि आप जाइये, लेकिन अब मैं फ्री हूं दिल खोल कर बातें करेंगे। और सोचा कि जीवन में कम ही लोग मिलते है जो इतने प्रेम से किसी अपरिचित से मिलते हो।

मन में मचलते हुए प्रश्न को मैंने सर्वप्रथम श्री चंचल से पूछ ही डाला कि निर्माता राजकपूर ने अपनी फिल्म ‘बॉबी’ मैं आपको कैसे चांस दे डाला? उन्होंने बड़ी सादगी से बताया कि वैसे तो राज साहब से दो-तीन साल पुरानी पहचान थी और उन्होंने मुझे मुंबई से अमृतसर संदेशा भी भिजवाया था लेकिन उस वक्त बात नही बनी थी। लेकिन 1971 में सास्कृतिक रंगारंग प्रोग्राम “बैसाखी की शाम” का मुंबई में आयोजन किया था जिसके अध्यक्ष राज साहब थे और मुख्य अतिथि थे श्री अली यावर जंग जिन्होंने प्रोग्राम में मुझे गोल्ड मैडल से सम्मानित किया था, उस समय एक बार फिर राज जी ने मुझे उनसे मिलने को कहा, उस वक्त वे बॉबी के निर्माण में व्यस्त थे। बॉबी के एक दर्द भरे गीत को वह मुझसे गवाना चाहते थे जिससे गाने में लोक गीतों की वार विकता की तरह जान डाली जा सके चूंकि मेरा गाने का अपना स्टाइल है इसी वजह से उन्होंने मुझे इतना बड़ा अवसर दिया। मैंने तो कभी सपने में भी नही सोचा था कि फिल्म लाइन में इतने बड़े कलाकार के माध्यम से मुझे ब्रेक मिलेगा यह मेरी जिंदगी की एक खूबसुरत घटना है जिसे मैं जीवन भर नही भूल सकता।

मैंने अगला प्रश्न किया कि जिंदगी का पहला फिल्मी गाना गाते हुए क्या आप घबराये थे?

उन्होंने तुरंत उत्तर दिया और कहा कि गाने को रिकॉर्ड कराते वक्त मैं नर्वस बिल्कुल नही हुआ था मैं तो इस प्रकार से गा रहा कि जैसे मैं स्टेज पर खड़ा होकर गाता हूं। वैसे राज जी ने मुझे गाने की रिहर्सल के लिए बुलाया था और यह भी सुनिश्चित नही था कि वह गाना फिल्म में रखना है या नही लेकिन मामूली रिहर्सल कराने के आधे घण्टे के बाद ही उस गाने की रिकॉर्डिंग बहुत ही उपयुक्त हुई थी जिसकी समाप्ति पर राज जी ने मुझे बाहों में भर लिया था। जब मैंने वही गाना दोबारा सुना तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि मैं इतना अच्छा गा पाया हूं हकीकत मैं तो मुझे पता ही नहीं लगा कि मैंने ही वह गाना गाया था। चंचल ने विनम्र स्वर में कहा कि यह तो सब माता के पुण्य प्रताप का फल है। मैं तो धर्मी कर्मी आदमी हूं माता में अटूट विश्वास रखता हूं। मुझे नहीं पता कि मैंने वह गाना कैसे गाया? श्री चंचल ने आगे बताया कि जब मैं फेमस सेंटर में रिकॉर्डिंग के लिए गया तो मेरे सामने सरस्वती की मूर्ति दिखाई दे रही थी जिसके चरणों में मेरा ध्यान केन्द्रित हो चुका था और गाना रिकॉर्ड होता जा रहा था बाकी मुझे कुछ पता नही वह सब कैसे हो गया माता में विश्वास के साथ मेहनत करना अपना कर्तव्य समझता हूं।

मेरे एक अन्य प्रश्न के उत्तर में कहा कि वक्त से पहले और मुकद्दर से ज्यादा कभी किसी को नही मिलता। यह तो जब भगवती की कृपा होती है तब ही कुछ बन जाता है। आज फिल्म इंडस्ट्री में एक से एक अच्छा गाने वाला मौजूद है और कभी-कभी तो मैं भी महसूस करता हूं कि कोई व्यक्ति मेरे से भी अच्छा गा रहा है लेकिन आज उस का वक्त नही है, न जाने कब उसका भाग्य चमक जाए? श्री चंचल ने गंभीरता से अपने आप कहा कि मुझे तो फिल्म लाइन में आने के लिए संघर्ष नही करना पड़ा है और यह मेरे लिए सौभाग्य की बात रही है कि बड़े निर्माता, बड़ा बैनर और बड़ी फिल्म के माध्यम से मेरा फिल्मी जीवन प्रारम्भ हुआ। जिस फिल्म की प्राथमिकता सफलता ने ही मुझे सफलता के उच्चतम शिखर पर लाकर बैठा दिया। यह सब भाग्य और भगवती की कृपा से ही संभव हुआ है।

फिल्मों में आऩे से पहले आपने स्टेज़ कार्यक्रमों से काफी शौहरत हासिल कर ली थी। भगवती जागरणों में तो आपका होना विशेष आकर्षण का कारण रहता था। क्या भविष्य में आप स्टेज को फिल्मों में गाने की वजह से त्याग देंगे?  नहीं, कभी नहीं, मैं स्टेज की जिंदगी कभी नही छोड़ सकता और न ही छोड़ने का इरादा है स्टेज़ मेरा मंदिर है जिसने मुझे लाइफ दी है और यही मेरी जिंदगी है। स्टेज का आदमी हूं और वही बना रहना चाहता हूं जहां तक भगवती जागरणों का सवाल है वह मेरे लिए इबादत का समान है आजकल व्यस्त बहुत रहता हूं इसलिए इतना समय नही निकाल पाता। लेकिन जब कभी भी अवसर मिलता है मैं भगवती जागरणों में जरूर जाता हूं माता की भेंट अभी भी गाता हूं और गाता रंहूगा मां को मैं नही भूल सकता, उन्हीं का तो यह सब कुछ दिया हुआ है चंचल जी, आपने यह गाने की कला किस प्रकार हासिल की है ? शायराना अंदाज में उन्होंने कहा कि जनाब मुझे तो फकीरों की  दुआंए मिली है उन्हीं के बल पर कुछ गा लेता हूं मैं क्या गा रहा हूं मुझे कुछ पता नही होता, किसी से मैंने यह सीखा नही है। गाना गाने का मेरा शौक था। यह शौक दीवानगी की इस हद तक पहुंच जायेगा इसकी खुद उम्मीद नही थी।

कृपा कर अपनी जिंदगी के बारे में कुछ बताइये? आपने मुस्कुराते हुए कहा कि मैं शादी शुदा हूं और दो बच्चों का बाप हूं जिसमें एक लड़का और एक लड़की है ज्यादातर परिवार के लोग अमृतसर में रहते है मुंबई में फैमिली को ले जाना कोई जरूरी नहीं है क्योंकि हमें पंजाब की लाइफ ज्यादा पसंद है बनिस्पत मुंबई की व्यस्त लाइफ से मुझे तो मुंबई व्यवसाय के कारण रहना पड़ता है लेकिन जब कभी भी अवसर मिलता है मैं वहां से भाग आता हूं।

क्या आप अपने बच्चों को भी इसी लाइन में डालना चाहते हैं? सोचते हुए उन्होंने कहा कि अगर मेरे बच्चे फिल्मी गायक बनना चाहेंगे तो मैं उन्हें पूरी मदद करूंगा और टेक्नीकली उन्हें पढाऊंगा मेरी बात और है कि मैं चल आया हूं लेकिन कला के वास्तविक ज्ञान का हर प्रकार से ज्ञान होना बड़ा जरूरी है। हालांकि मैं तो स्टेज़ के गाने में और रिकॉर्डिंग के वक्त गाये जाने वाले गानों में कोई फर्क नही समझता लेकिन मेरी बात और है।

आप किस शायर को गाना ज्यादा पसंद करते है? इसके जवाब में चंचल ने फरमाया कि यह तो निर्माता की ही इच्छा होती है कि शायर या गीतकार के फिल्मी नग्मे रखने है। हम तो अपनी आवाज से उन गीतों में जान डालने की कोशिश करते है। वैसे मेरी हार्दिक इच्छा है कि साहिर लुधयानवी की गजल ‘परछाइयां’ को स्टेज पर बैले के रूप में पेश करूं मेरी नज़र मे साहिर साहब ‘शायरी’ को फिल्मों में एक स्थान दिलवाने में सबसे अग्रणी रहे है।

एक और प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि फिल्मी गायकों में मैं लता जी क्यों सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। वह तो साक्षात शारदा का अवतार है जिनके चरणों में अपने आप शीश झुक जाता है फिल्म दो शत्रु में लता जी के साथ जीवन का प्रथम गीत गाया थी और उम्मीद करता हूं कि फिल्म ‘बॉबी’ के गाने के बाद इस फिल्म का यह गाना जबरदस्त हिट होगा। गाने के बोल है नीतू प्यार करके चली जायेंगी जिस का संगीत दिया है कल्याण जी आनंद जी ने। यह गाना मुझे पसंद है और इससे हर प्रकार से संतुष्ट हूं। अच्छा तो बताइये आपने अब तक कितनी फिल्मों में गाने गाये है?  तत्काल आपने बताया कि अभी तक तीस फिल्में कर चुका हूं जिनमें छ: फिल्में प्रदर्शित हो चुकी है बॉबी, रोटी कपड़ा और मकान, बेगाम, उम्र कैद और जग्गू इसके साथ ही आगे श्री चंचल ने कहा कि फिल्म ‘फौजी’ में दो गाने दिये है जो प्रदर्शित होने ही वाली है। आप किस संगीतकार के साथ गाना पसंद करते है?  किन-किन संगीतकारों के साथ आपने काम किया है?  यह प्रश्न सुनकर श्री चंचल गंभीर हो गये और सोचते हुए कहा कि हर संगीतकार के साथ काम करने का अलग लुत्फ होता है। यह जरूरी नहीं है कि प्रसिद्ध संगीतकार ही अच्छी धुनें बना सकता है। फिल्म क्षेत्र में आया नया संगीतकार भी हो सकता है पुरानों की अपेक्षा अच्छी धुने बनाने में सफल हो जाए। वैसे मैंने कल्याण जी आनंद जी, आर.डी बर्मन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, हंसराज बहल, श्याम जी घनश्याम जी, एंव सोनिक ओमी इत्यादि संगीतकारों के साथ अलग-अलग फिल्मों में समय-समय पर गाया है। मेरे दिल में बड़ी हसरत थी कि गज़लों के बेताज बादशाह मदन मोहन जी के साथ गाऊं लेकिन यह अरमान दिल में ही रह गया। क्योंकि एक बार लखनऊ में एक प्रोग्राम में मुलाकात हुई थी तब से मैं उऩके संगीत को साथ गाने का इच्छुक था मगर अफसोस है कि यह अच्छा मन में ही मर गई।

इतनी शौहरत पाने के बाद में अब आपकी क्या इच्छा है? फिल्म में आने से पहले ही स्टेज के माध्यम से मैं बहुत मशहूर था लेकिन मैंने उस प्रसिद्धि के दायरे को काफी बढ़ा दिया है। अब लाखों द्वारा सुना जाता हूं वैसे भी धीरे चलने वाला आदमी हूं किसी अन्य से मुकाबला नही हैं मैं तो अपनी ही जगह बनाये रखना चाहता हूं।

अपने फिल्मी जीवन की कोई महत्वपूर्ण घटना बताईये?  हंसते हुए श्री चंचल ने कहा कि एक बार एक फिल्म निर्माता मेरे पास आए और अपनी फिल्म में यह कहकर गाना गवाने आए कि आपके साथ रफ़ी साहब गायेंगे। मैं बहुत खुश हुआ और सोचा कि मेरे जीवन की एक और आकांक्षा पूरी होने जा रही है क्योंकि रफी साहब का तो मैं शुरू से ही फैन रहा हूं वह मेरे साथ गायेंगे इससे बड़ा और क्या सौभाग्य हो सकता था। लेकिन जब रिकॉर्डिंग पर पहुंचा तो रफी साहब की जगह किसी और को पाया। मन बड़ा दुखी हुआ हालांकि वह गायक मेरे से जूनियर था। लेकिन मैंने गाना गाया। कुछ समय बाद फिल्म ‘सोनू और मोनू’ में रफी साहब के साथ गाने का पहला अवसर मिला जिसमें मन्ना डे साहब ने भी साथ में गाया कि जिस फिल्म का निर्माण सावन कुमार कर रहे थे।

तो क्या आप फिल्म बनाने का फिलहाल विचार रखते है? जनाब इस बारे में सोचा जरूर था लेकिन निर्माण से संबधित परेशानियों को देखकर घबरा गया और फिल्म निर्माण का विचार त्याग दिया।

अंत में, चंचल जी के बारे में इतना जरूर कहना चाहूंगा कि स्टेज़ कार्यक्रमों में बिना डायरी के पन्नों को देखे लगातार पांच छ: घंटे तक नगमे गाना संभवत: देवी मां का ही प्रताप है।


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Mayapuri

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