INTERVIEW!! भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान आपके भरोसे बैठे हो – नवाजुद्दीन सिद्दीकी

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फिल्मों स्टार बहुत दिखते हैं पर कलाकार बहुत कम नजर आते हैं। कला में गहरी पैठ लगाने वाले कला के मर्म को समझकर अपने चरित्र को जीवंत कर देने वाले और बेहद प्रतिभाशाली और अजीवन कलाकार सिद्दीकी से प्रसिद्ध लेखक हरविन्द्र मांकड़ की एक अतरंग बातचीत हुई।

नवाजुद्दीन जी.. आपने एक से बढ़कर एक चरित्र फिल्मों में निभाएं है। माउंटेनमैन में ऐसा क्या नजर आया जो सिर्फ नाम सुनते ही आपने फिल्म के लिए हां बोल दिया?

हरविन्द्र जी, ऐसा मौका जिंदगी में बहुत कम आता है जब कोई ऐसा चरित्र आपको निभाने को मिले तो आपका आइडियल रहा हो। केतन मेहता जी ने जब यह कहानी मुझे सुनाई.. मैंने सिर्फ एक लाइन सुनकर हां बोल दिया.. क्योंकि केतन जी हमेशा ऐसा सब्जेक्ट चुनते हैं जो जमीनी हकीकत से जुड़ा होता है। और दशरथ मांझी तो ऐसा व्यक्तित्व थे जो हर एक के प्रेरणा स्रोत बने। एक इंसान जो सिर्फ छैनी हथौड़े से पहाड़ काट सकता है। शीरी फरहाद लैला मजनू की तरह प्रेम कहानी है यह। प्यार के लिए अपनी जिंदगी के 22 साल पहाड़ो की मिट्टी में लगा देने वाले दशरथ का चरित्र निभाना मेरा सौभाग्य कहा जायेगा।

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आपने जब फिल्म साइन कर ली तो दशरथ मांझी के बारे में कितना रिसर्च किया?

मैनें वो तमाम वीडियो देखे जिनमें उनकी चाल ढाल बोलने का तरीका सब अपने जहन में उतारा। उनके गांव गया। गांव वालों से उनके बारे में बारिकियां सीखी। उनके पुत्र व बहु ने भी मेरी बड़ी सहायता की। उन सबने मुझे नवाजुद्दीन से दशरथ मांझी बना दिया। जिसके लिए मैं हमेशा उनका कृतज्ञ रहूंगा।

कई बार आप कोई चरित्र फिल्म में निभाते है तो उससे काफी कुछ सीखने को मिलता है। दशरथ मांझी के चरित्र से आपने क्या सीखा?

बहुत कुछ.. क्योंकि मैंने खुद 14-15 साल स्ट्रगल किया है। वो दर्द और मुसीबत सही है। मैं जानता हूं कि अपनी मंजिल को पाना कितना मुश्किल होता है। यही दशरथ जी के साथ हुआ। 22 साल वो आदमी अपनी प्यार की खातिर पहाड़ो का सीना चीरता रहा। अकेला चला और वो कर दिखाया जो अंसभव था। वो अक्सर कहा करते थे कि भगवान के भरोसे मत बैठो, क्या पता भगवान तुम्हारे भरोसे बैठा हो। यानि कर्म करो.. फल जरूर मिलेगा। मैनें यही बात अब जिंदगी भऱ के लिए अपनी ली है। पूरी शिद्दत से अपना काम करो फिर पूरी कायनात आपकी मंजिल पर ले जाने के लिए मदद को आ जाती है।

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आपको ऐसा क्यों लगता है कि हर मां बाप को अपने बच्चों को माउंटेनमैनफिल्म दिखानी चाहिए?

बिल्कुल दिखानी चाहिए हरविन्द्र जी, क्योंकि नई पीढ़ी सहुलियतों में पली बड़ी है। सो ज्यादा लाड़ प्यार ने उन्हें थोड़ा लेजी (सुस्त) बना दिया है। जरा सी प्रोब्लम आते ही घबरा जाते हैं। पर जब वो यह फिल्म देखेंगे तो जानेंगे कि दशरथ मांझी कितनी मुश्किलों से लड़कर अपना लक्ष्य प्राप्त किया। यह फिल्म बच्चों की मोरल ऊंचा उठाती है। उन्हें आगे बढ़ने व हालात से लड़ने का जज्बा देती है। इसलिए मेरी हर मां बाप से प्रार्थना है कि बच्चों को मजबूत बनाना है। तो उन्हें ऐसी फिल्में दिखाओ ताकि वो जान सकें कि मेहनत करना कितना जरूरी है।

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आपने घायल होकर भी शूटिंग के वक्त शिद्दत से काम क्या, वर्ना स्टार लोग तो ऐसी हालत में घर पर आराम करते है?

मैं दिल्ली में था तो मेरे पांव में चोट लग गई। पांव पूरी तरह सूज गय। पर अगले ही दिन ‘माउंटमैन’ की शूटिंग के लिए बिहार में पहाड़ो पर जाना था। पर मैंने यही सोचा कि जिस आदमी का मैं रोल करने जा रहा हूं जब उसने अपने दर्द की परवाह नही की तो मुझे तो हिम्मत दिखानी चाहिए। बस यही जज्बा मेरी ताकत बन गया।

यही है एक सच्चे कलाकार की पहचान। नवाजुद्दीन जैसे अदाकर बरसों तक अपनी पहचान दिलों में बसा देते है। वो चरित्र जीते है। वो चरित्र को साकार करना जानते है। हमारी ‘माउंटेनमैन’ व उसकी सारी टीम को शुभकामनाएं है। ऐसी फिल्में बनती रहनी चाहिए।

 


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Mayapuri

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