INTERVIEW!! ‘‘मैं तो संकोची किस्म का युवक हूं…’’ – पुलकित सम्राट

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‘स्टार प्लस’ पर प्रसारित हो चुके सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में लक्ष्य विरानी का नेगेटिव किरदार निभा चुके अभिनेता पुलकित सम्राट ने इस सीरियल को बीच में ही बाय बाय कर फिल्मों की तरफ रूख कर लिया था। वह अब तक ‘बिट्टू बॉस’, ‘फुकरे’, ‘जय हो’, ‘ओ तेरी..’ जैसी फिल्मों के अलावा वैभवी मर्चेंट के साथ एक म्यूजिकल प्ले ‘ताज एक्सप्रेस’ भी कर चुके हैं। इन दिनों वह एक्सेल इंटरटेनमेंट की फिल्म ‘बंगिस्तान’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उनके साथ रितेश देशमुख और जैकलिन भी हैं।

आप अपने करियर को किस दिशा में जाते हुए देख रहे हैं?

मैं इतना सोचूँगा, तो फिर काम कैसे करूँगा।

फिल्मों के असफल होने पर..?

मेरे पास यह सब सोचने का समय ही नहीं होता। मैं लगातार काम कर रहा हूं। काफी व्यस्त रहता हूं। लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा है। मुझे इससे अधिक क्या चाहिए।

आप सोलो हीरो वाली फिल्में नहीं कर रहे हैं?

मैंने हमेशा सोलो हीरो वाली फिल्में ही की हैं। क्योंकि मेरी राय में फिल्म की कहानी ही हीरो होती है। मुझे अपने किरदार की लंबाई या दूसरे कलाकार के किरदार की लंबाई से फर्क नहीं पड़ता। जब मैं किसी किरदार को लेकर कंविंस हो जाता हूं, तो फिर मैं खुद को उस किरदार में ही देखता हँ। यदि हम सोलो हीरो फिल्मों की बात करेंगे, तो फिर ‘दिल धड़कने दो’, ‘दिल चाहता है’ जैसी अच्छी फिल्में नहीं बन सकेंगी। मेरी नजर में ‘बंगिस्तान’ भी सोलो हीरो वाली फिल्म है।

फिल्म ‘बंगिस्तान’ को लेकर क्या कहेंगे?

यह एक फनी फिल्म है। जिसकी कहानी ने मुझे उत्साहित किया। यह दो युवकों की कहानी है, जो कि बंगिस्तान से ही संबंध रखते हैं। एक उत्तरी बंगिस्तान से और दूसरा दक्षिणी बंगिस्तान से। यह एक फनी फिल्म है, पर मजाक मजाक में ही हमने काफी गहरी बात कहने की कोशिश की है। यह बात मुझे रोचक लगी। इसके अलावा मुझे रितेश देशमुख की कॉमिक टाइमिंग बहुत अच्छी लगती है और इस फिल्म में मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला, इसलिए मैं इस फिल्म से जुड़ा।

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फिल्म ‘बंगिस्तान’ के अपने किरदार पर रोशनी डालेंगे?

इस फिल्म में मैंने दक्षिण बंगिस्तान में रहने वाले एक हिंदू युवक प्रवीण चतुर्वेदी का किरदार निभाया है। वह वहां पर छोटी मोटी रामलीला में हनुमान का किरदार निभाता रहता है। वहीं पर एक फंडामेंटलिस्ट है, जो कि एक पार्टी चलाते हैं। वह धर्म के नाम पर प्रवीण का ‘ब्रेन वॉश कर देते हैं। उसे इस बात के लिए कंविंस कर लेते हैं कि उनकी पार्टी के साथ साथ पूरी दुनिया की शांति के लिए जरुरी है कि ‘विश्व शांति’ के मौके पर जहां पूरे विश्व के धर्मावलंबी इकट्ठा होकर हाथ मिलाने वाले हैं, वहां प्रवीण को जाकर आत्म घाती बम फोड़ना है। वह तैयार हो जाता है। और वह एक मुस्लिम बनकर वहां पर पहुंचता है, जहाँ उसकी मुलाकात उत्तरी बंगिस्तान से आए रितेश देशमुख से होती है। उसका भी वही मकसद है। उसका भी ब्रेनवाश किया जा चुका है। पर दोनों को नहीं पता है कि वह दोनों एक ही मकसद से वहां आए हैं। कैसे यह दोनों खुद को खोजते हैं, कैसे इन्हें समझ में आता है कि धर्म का दुरूपयोग किया जा रहा है। ब्रेनवाश कर उन्हें गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है। उन्हें यह भी समझ में आता है कि धर्म का यदि दुरूपयोग किया जा सकता है, तो उसका सही ढंग से कैसे उपयोग किया जा सकता है।

प्रवीण चतुर्वेदी का किरदार निभाने से पहले क्या आपकी मुलाकात किसी बरगलाए गए युवक से हुई या सब कुछ स्क्रिप्ट के आधार पर ही आपने निभाया है?

सब कुछ स्क्रिप्ट के आधार पर। मैं एसे किसी युवक से नहीं मिला। पर इस तरह की खबरें हम अक्सर टीवी चैनल पर सुनते या अखबारों में पढ़ते रहते हैं। धर्म का किस तरह से गलत उपयोग किया जाता है, यह तो हम सब देखते रहते हैं। निर्देशक करण अंशुमन से भी हमें काफी मदद मिली।

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कई कलाकारों को उनके द्वारा अभिनीत किरदारों से खुद को अलग करना काफी कठिन होता रहा है। आपके साथ किसी किरदार को लेकर कभी ऐसा कुछ हुआ?

हर किरदार से खुद को अलग करना कठिन होता है। इसलिए हर किरदार के साथ कलाकार का अपना कुछ न कुछ शेष रहता है। हम हर किरदार में अपनी जिंदगी का कुछ न कुछ हिस्सा जरुर पिरोते हैं। हमारे व्यक्तित्व का कोई न कोई हिस्सा किसी न किसी किरदार के साथ जाता ही है। इसी तरह से किरदार अलग होते हैं। हम किरदार को निभाते समय सोचते हैं कि उस किरदार में हमने गुस्से का ज्यादा उपयोग किया था, उसमें हंसी का उपयोग किया था, इसमें एरोगेंस, इसमें फन का उपयोग किया था। तो इसमें कुछ ऐसा कर लेते हैं।

भविष्य में फिल्म निर्देशक बनने की तमन्ना है?

नहीं! मुझे हमेशा अभिनय से ही प्यार रहा है। वैसे मैं योजना बनाकर कभी चला नहीं। पर हवा का झौंका किसे कहाँ ले जाए, उसका पता तो मुझे भी नहीं है।

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किस कलाकार के साथ आपकी ट्यूनिंग अच्छी बैठती है?

यदि सह कलाकार के साथ ट्यूनिंग न हो तो परफार्मेंस निखरकर आ ही नहीं सकती। मेरी तो हर कलाकार के साथ अच्छी ट्यूनिंग रही है। फिल्म ‘बंगिस्तान’ में रितेश देशमुख के साथ मेरी बहुत अच्छी ट्यूनिंग रही। मैंने उनसे कॉमिक टाइमिंग के अलावा फिल्म तकनीक के बारे में काफी कुछ सीखा। उन्होंने ही मेरे साथ दोस्ती की शुरूआत की। मैं तो संकोची किस्म का इंसान हूं। फिर डरा हुआ था कि वह मुझसे काफी सीनियर कलाकार हैं। निर्देशक भी कलाकारों का चयन इसी हिसाब से करते हैं कि कलाकारों के बीच ट्यूनिंग हो। जब फिल्मकार को लगता है कि इन कलाकारों के बीच ट्यूनिंग नहीं बनेगी, तो वह ऐसे कलाकारों को फिल्म का हिस्सा नहीं बनाते हैं। किसी भी फिल्म में ‘मिसमैच’ या एक दूसरे के साथ काम करते हुए असहज रहने वाले कलाकारों को नहीं जोड़ा जाता। दो कलाकारों के बीच ट्यूनिंग है या नहीं, यह बात दो दिन के अंदर ही समझ में आ जाती है। यदि कलाकारों के बीच अच्छी ट्यूनिंग न हो, तो फिल्म बन ही नहीं सकती।

‘बंगिस्तान’ के अलावा कोई फिल्म कर रहे हैं?

टी-सीरीज की दिव्या खोसला कुमार निर्देशित फिल्म ‘सनम रे’ है, जो कि 12 फरवरी 2016 को रिलीज होगी। इसमें मेरी हीरोईन यामी गौतम है। यह मेरे करियर की पहली प्रेम कहानी प्रधान फिल्म है। इसके बाद ‘जुनीनियत’ आएगी।

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Mayapuri

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