INTERVIEW!! ‘‘अब सुकून वाली फिल्में कर रहा हूं…’’ – राजपाल यादव

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पिछले पंद्रह साल से बतौर कॉमेडियन बॉलीवुड में सक्रिय अभिनेता राजपाल यादव का दावा है कि वह कॉमेडी के नए नए आयाम को जीने का प्रयास करते आए हैं। इन दिनों वह फिल्म ‘बांके की क्रेजी बारात’ को लेकर चर्चा में हैं।

फिल्म ‘बांके की क्रेजी बारात’ को लेकर क्या कहना चाहेंगे?

प्रॉक्सी शादी पर बनी पहली फिल्म है। अब तक प्रॉक्सी शादी को लेकर कोई भी फिल्म नहीं बनी है। मेरे करियर की भी यह एक पहली ऐसी शादी वाली फिल्म है, जिसमें डेढ़ माह तक मुझे बांके की शादी को जीने का मौका मिला, तो कुछ भी गलत नहीं होगा। यह बहुत ही अलग तरह की क्रेजी शादी है जिसमें क्रेजी बाराती हैं। दूल्हे के साथ साथ उसके मां बाप भी क्रेजी हैं। बांके तो अपने आप में क्रेजी है। सभी लोग दिमाग से थोड़ा सा खिसके हुए हैं।

शादी पर बनी दूसरी फिल्मों से आप इसे किस तरह से अलग मानते हैं?

जैसा कि मैने पहले ही कहा कि यह ‘प्रॉक्सी वेडिंग’ है, जिसको लेकर अब तक कोई फिल्म नहीं बनी। जबकि हमारे देश के अंदर साल में दो तीन प्रॉक्सी शादी के होने की खबरें सुनते रहते हैं। हम अक्सर सुनते हैं कि दूल्हे को जो लड़की दिखायी गयी थी, उससे इतर लड़की से उसकी शादी हुई। कई बार शादी के मंडप तक पहुंचते पहुंचते दूल्हा बदल जाता है। यह कोई नयी बात नहीं है। हमारे देश में साल में दो चार किस्से इस ढंग के हमें सुनायी देते हैं। हम सुनते हैं कि शादी अजय की होनी थी, लेकिन ऐन वक्त पर वहां मौजूद किसी श्याम की उसी लड़की से शादी कर दी गयी, तो ये कहानी कि शादी करने कौन गया और किससे शादी हुई, हमें काफी रोचक लगी। दूसरी बात हर इंसान को ये मान लेना चाहिए कि शादी उसके करने से नहीं होती है, बल्कि ऊपर वाले की शक्ति जिस तरह की शादी चाहती है, वही होती है।

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दूसरी अहम बात यह है कि यह पूरी तरह से एक पारिवारिक फिल्म है। जब किसी पारिवारिक फिल्म को बच्चे बूढ़े सभी एक साथ मिलकर देखते हैं, तो मुझे सुकून मिलता है। क्योंकि मुझे पता है कि बचपन में हम कुछ फिल्में अपने माता पिता के साथ देखने के लिए सहज नहीं होते थे। तो अब मैं जब खुद पिता हूं तो मैं उन सारी चीजों का ध्यान रखता हूं और उसी तरह की फिल्में करने की कोशिश करता हूं। फिर चाहें उस फिल्म में मेरा लीड रोल हो या सपोर्टिंग किरदार हो।

पर अब तो ‘लिव इन रिलेशनशिप’ का जमाना आ गया?

देखिए, यदि ऊपर वाले ने उनकी पूरी तरह से शादी नहीं लिखी है, तो इसका मतलब यह हुआ कि उन दो इंसानों के बीच सिर्फ चंद वर्षों का ही एक रिश्ता लिखा हुआ है। यही वजह है कि कुछ शादियां भी दो दिन में या दो साल में या दस साल में टूट जाती हैं। कुछ लोग कई बार ऊपर वाले की मर्जी के खिलाफ जाकर जब शादी करते हैं या लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो उनका यह रिश्ता अस्थायी होता है। देखिए, भाई बहन हों या भाई भाई हों या बहने हों, सभी के रिश्ते लिखे होते हैं कि वह किस परिवार में जाएंगे। आज की युवा पीढ़ी को यह याद रखना चाहिए कि जब आपको अपने माता पिता को चुनने का अधिकार नहीं है, तो जीवन के निर्णय लेने का अधिकार कैसे हो सकता है? आप अपने कर्मों के आधार पर अपने जीवन के जो निर्णय लेंते हैं, वह क्षणिक हो सकते हैं। हो सकता है कि आपके उस क्षणिक निर्णय के पीछे आपके पूर्व जन्म का कोई प्रारब्ध लिखा हो। हर इंसान की जन्म कुंडली के अनुसार ही वह किसी इंसान के साथ दो दिन या दस साल रहता है। सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि आपकी जेब में दस हजार रूपए हों, फिर भी यदि दिन में खाना नहीं लिखा है, तो आप पूरे दिन काम या किसी अन्य वजह से व्यस्त रहेंगे, पर जेब में पैसा होते हुए भी खाना नही खा पाएंगे। मेरे साथ तो कई बार ऐसा हो चुका है। जबकि मैं कई बार हॉटेल के सामने से निकला हूं, जेब में पैसा होते हुए भी होटल के अंदर नहीं घुसा। इसलिए हर इंसान को मानकर चलना चाहिए कि कुछ चीजें उसके बस में नहीं होती हैं, तकदीर में होती हैं। यही बात हमारी फिल्म बताती हैं।

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आपका बांके का किरदार किस तरह का है?

हमारी फिल्म की कहानी हिमाचल प्रदेश के कस्बे परागपुर की है। हिमाचल की खूबसूरत वादियों में एक अलग तरह का गांव है। जहां बांके अपने माता पिता के साथ रहता है। अब शादी को लेकर बांके की अपनी ख्वाहिशें हैं, पर उसकी शादी नहीं हो पा रही है। तो उसकी शादी के लिए किस तरह से उसके माता पिता जुगाड़ करते हैं और फिर क्या क्या होता है, वह सब फिल्म में हैं।

अब तो आप क्षेत्रीय फिल्मों में भी अपना प्रभुत्व जमा रहे हैं?

जी हां! मैंने हॉलीवुड फिल्म की। हिंदी के अलावा मराठी, पंजाबी, तेलुगु, कन्नड़ सहित दूसरी भाषाओं की फिल्में कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि संवाद यानी कि लोगों से जुड़ने के लिए या सिनेमा के लिए भाषा की बंदिश नहीं होती है। कन्नड़ या तेलुगु जैसी फिल्मों के संवादों को हम हिंदी में लिखकर रटते हैं, फिर निर्देशक के साथ उसके भाव को समझकर प्रैक्टिस करते हैं और फिर अभिनय करते हैं।

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क्या अब आपका फिल्में चुनने का तरीका बदल गया है?

अब मैं किरदार की लंबाई की बनिस्बत किरदार कितना सशक्त है, इस पर गौर करता हूं। यदि किरदार ताकतवर नहीं है, तो ऐसा मेन रोल करने से भी मुझे परहेज है। यदि किरदार सशक्त है, तो मुझे गेस्ट अपियरेंस करने से भी परहेज नहीं है।

सिनेमा के बदलाव को आप किस रूप में देखते हैं?

बहुत खुश हूँ। मैं तो इसी तरह के सिनेमा की चाह लिए 15 साल से संघर्ष कर रहा था। यदि यह सिनेमा ना बनना शुरू होता, तो हम जैसे कलाकार कुछ न कर पाते। हीरो हीरोइन प्रधान सिनेमा में हमारे लिए करने को कुछ होता ही नहीं है। हॉलीवुड सिनेमा में चालीस साल की उम्र में कलाकार जवान होता है। अब आप मानकर चलें कि राजपाल यादव का कलाकार के रूप में अंकुर फूटा है। अब अच्छा सिनेमा करने का सही वक्त है।

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कलाकार के तौर पर आपको सुकून कहां ज्यादा मिल रहा है?

सच कहूं तो थिएटर करने में ज्यादा सुकून मिलता है। थिएटर करने से मेरे अंदर की बैटरी रिचार्ज होती है। मैं ऐसी हर भाषा के सिनेमा में काम कर रहा हूं जहां मुझे सकून मिल रहा है। मैं बुरी हिंदी फिल्में करने के बजाए क्षेत्रीय सिनेमा करना पसंद करता हूं। क्षेत्रीय सिनेमा में काम करने से हमारे काम करने का अर्थ निकलता है। हमारे अंदर की प्रतिभा विकसित होती है। मैं अच्छे फिल्मकारों के साथ ही काम कर रहा हूं।

‘भोपालःअ प्रेअर फॉर रेन’ के बाद हॉलीवुड की कोई दूसरी फिल्म कर रहे हैं?

तीन फिल्मों के ऑफर मिले हैं। पर इनको लेकर चर्चा करना ठीक नहीं होगा। हॉलीवुड के फिल्मकार हर चीज प्रैक्टिकली देखते हैं। भारत की तरह व्यवहार पर कुछ भी काम नहीं मिलता। मेरा मानना है कि पूरी दुनिया में काम करो, पर अपने देश से दूर मत रहो। अपने देश में रहकर काम करने का जो मजा है, उसका आनंद ही अलग होता है।

हिंदी फिल्में कौन सी हैं?

इतना मानकर चलें कि अगले तीन साल तक मैं लीड फिल्मों में ही नजर आने वाला हूं। सुकून वाली फिल्में कर रहा हूँ। हम पर जो किरदार फिट है, वह और अर्थपूर्ण सिनेमा ही कर रहा हूँ। मनोरंजन वाला सिनेमा ही करुंगा।


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Mayapuri

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