INTERVIEW!! ‘‘शूटिंग के दौरान हमने काफी मस्ती की..’’ – रितेश देशमुख

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एक पॉलिटिशियन के बेटे और आर्किटेक्ट की पढ़ाई करने के बाद 2003 में फिल्म ‘तुझे मेरी कसम’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखने वाले रितेष देषमुख ने 12 साल के अभिनय करियर में कई नई उंचाइयां छू ली हैं। उन्हे फिल्म ‘एक विलेन’  में विलेन के किरदार में देखकर हर किसी ने उनकी अभिनय क्षमता का लोहा मान लिया। अब वह ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ की फिल्म ‘बैंगीस्तान’ को लेकर चर्चा में है, जिसमें उन्होंने पहली बार एक मुस्लिम युवक का किरदार निभाया है।

फिल्म ‘एक विलेन’ को मिली सफलता के बाद लोग आपकी अभिनय क्षमता की तारीफ करने लगे हैं। इससे आपकी तरफ से फिल्मों की चयन प्रक्रिया को लेकर कोई बदलाव आया ?

माना कि ‘एक विलेन’ ने मुझे एक मंझे हुए कलाकार की तरह एक नई दिशा दी। मगर इससे पहले मैंने जो फिल्में की, वह फिल्में करना भी मेरे लिए जरुरी था, पर पिछले कुछ समय से मैं कम्फर्ट जोन में काम कर रहा था। ‘एक विलेन’ ने मुझे उस कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का अवसर दिया।

फिल्म ‘बैंगीस्तान’ से जुड़ने की क्या वजह रही?

यह गंभीर विषय पर बनी एक व्यंगात्मक फनी फिल्म है। इसकी कहानी व मेरे किरदार ने मुझे इस फिल्म से जुड़ने के लिए उत्साहित किया।

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 ‘बैंगीस्तान’ किस तरह की फिल्म है ?

यह फिल्म नॉर्थ और साउथ दो भागों में बंटे देश बैंगीस्तान की कहानी हैं। उत्तर बैंगीस्तान पहाड़ी इलाका हैं, वहां एक अलग धर्म का प्रभुत्व है। दक्षिण बैंगीस्तान मैदानी क्षेत्र हैं, जहां अलग धर्म का प्रभुत्व है, हर देश में धर्म या मजहब का कुछ छोटे लोग अपने हिसाब से दुरूपयोग करने की कोशिश करते हैं। हमारी इस फिल्म में कुछ लोग दो युवकों का ब्रेन वॉश कर उन्हें मजहब के नाम पर आत्मघाती बम बनाकर धार्मिक शांति मिशन को ध्वस्त करने के लिए भेजते हैं। इसमें दो युवक जिस धर्म से संबंध रखते हैं, उससे अलग धर्म का रूप धारण कर उस नए धर्म के बारे में सीखते हैं, यानि कि मुस्लिम युवक गीता पढ़ता है, तो दूसरा हिंदू युवक कुरान पढ़ता है। धीरे धीरे इन दोनों को पता चलता है कि दोनों किताबों में कुछ भी अलग नही है, दोनों को समझ में आता है कि हर धर्म अमन, शांति सद्भावना और प्यार की बात करता है, कमजोरों की मदद करने की बात करता है, यह अहसास ही तो प्यार है। हास्य के साथ ये फिल्म इन दो युवकों की यात्रा है। अंत में फिल्म बहुत गहरा संदेश देती है। इस फिल्म की शूटिंग हमने पोलैड में 600 फुट नीचे गुफा में की है। जमीन में 600 फुट नीचे यानी कि 60 मंजिल नीचे।

फिल्म के अपने चरित्र को लेकर क्या कहना चाहेंगे ?

इसमें मैंने हाफिज बिन अली नामक मुस्लिम पात्र निभाया है, जो कि पहाड़ी इलाके यानि कि उत्तरी बैंगीस्तान का है। वहां पर यह युवक बीपीओ कंपनी में काम कर रहा है। यह लोग अमरिकन लोगों के खिलाफ हैं, मुझे लगता है कि हर इंसान को अपने धर्म को लेकर गर्व होना चाहिए। हर इंसान को अपने धर्म के साथ साथ दूसरे धर्म की भी इज्जत करनी चाहिए। अब इतनी बड़ी सोच रखने वाले युवक का ब्रेन वॉश नेगेटिव काम के लिए किया जाता है, तो सोचिए सामने वाले ने कितना व किस तरह से उसका ब्रेन वॉश किया होगा। यह मुस्लिम युवक हाफिज बिन अली, हिंदू बनकर अपना नाम ईश्वरचंद्र रखता है। इस नए नाम से उसका पासपोर्ट बन जाता है. यह उस जगह पहुंच जाता है, जहां धार्मिक शांति मिशन चल रहा है। बम ब्लास्ट की तैयारी में लग जाता है। वहीं उसकी मुलाकात दूसरे युवक से होती है, जो मूलतः प्रवीण चतुर्वेदी नामक हिंदू है, पर मुस्लिम बनकर वहाँ आया है। दोनों को एक दूसरे का मकसद पता नहीं हैं, दोनों को अंदर से लगता है कि यह तो अपना आदमी है, इस फिल्म में तमाम हास्यप्रद घटनाक्रम हैं. तो वहीं कई जगह व्यंग्य भी जबर्दस्त है।

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फिल्म को पोलैंड की गुफा में फिल्माने की कोई खास वजह?

पोलैंड की यह जो गुफा हैं, वहां पहले नमक की खान थी, जिसकी 700 साल तक खुदायी की गयी. फिर उसे बंद किया गया। हम इस गुफा के अंदर जब नीचे गए, तो इतनी ठंड की थी कि आप सोच नहीं सकते। बहुत अच्छी लोकेशन थी. हमने इसे लद्दाख के लिए चीट किया है।

क्या इस फिल्म में आतंकवाद और हथियारों के व्यापार पर भी बात की गयी है ?

पहली बात तो यह फिल्म एक मनोरंजक फनी फिल्म है। यह फिल्म किसी एक खास मुद्दे को लेकर नहीं बनायी गयी है। मगर हमारे देश व समाज में जो कुछ हो रहा है, उसको लेकर कुछ गंभीर बातें की गयी हैं। अब जिन्हें जो समझना है, वह समझ जाएंगे। कहीं किसी बात को लेकर भाषणबाजी नहीं है। फिल्म में एक नहीं कई लेयर हैं।

आपने ‘बैंगीस्तान’ में दूसरी बार जैकलिन के साथ अभिनय किया है. क्या अनुभव रहे?

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान हमने काफी मस्ती की। जैकलिन के साथ दूसरी बार अभिनय करना मेरे लिए वास्तव में बहुत अच्छा अनुभव रहा।

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पुलकित सम्राट के साथ आपकी यह पहली फिल्म है। उनको लेकर क्या कहेंगे ?

वंडरफुल एक्टर है। कॉमेडी में मुझसे ज्यादा बेहतर है। वह कहता है कि उसने मुझसे सीखा। सच यह है कि मैं गुरू द्रोणाचार्य बन कर रह गया और वह अर्जुन हो गया.

कहा जा रहा है कि ‘बैंगीस्तान’ और ‘वेलकम 2 कराची’ में समानता है ?

बिलकुल नहीं, दोनों बहुत अलग तरह की फिल्में हैं, समानता इतनी है कि दो इंसान अलग अलग परिस्थितियों में फंस जाते हैं।

आप मराठी भाषा में ‘बालक पालक’,  ‘येलो’,  ‘लय भारी’ जैसी फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं। क्या आप ‘एक विलेन’ जैसी किसी फिल्म का निर्माण करना चाहेंगे ?

मैं अपने आपको दोहराने में यकीन नहीं रखता। दूसरी बात फिल्म का निर्माण करना हो या किसी फिल्म में अभिनय करना हो,  इसका निर्णय तो कहानी व स्क्रिप्ट के आधार पर ही करता हूं। कहानी दिल को छूने वाली होनी चाहिए। फिल्म की कहानी सुनने के बाद मैं सबसे पहले अपने आपसे सवाल करता हूं कि क्या लोग इस कहानी को सुनना पसंद करेंगे? फिर सवाल करता हूं कि क्या मैं खुद इस कहानी को सिनेमा के पर्दे पर देखना चाहूंगा? उसके बाद स्क्रीन प्ले पर गौर करता हूं कि जो कहानी है, क्या वह सही ढंग से कही जा रही है या नहीं। उसके बाद ‘गट्स’ फीलिंग के साथ फिल्म को बनाते हैं।

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मराठी भाषा की फिल्म में अभिनय करते समय आपने भाषा के अलावा क्या फर्क महसूस किया ?

हिंदी सिनेमा में लंबे समय से अभिनय करता आ रहा हूँ, इसलिए संवाद अदायगी की एक अलग सी आदत बन चुकी है। हिंदी फिल्मों में संवाद अदायगी का एक अलग ही मीटर होता है, पर जब आप मराठी भाषा की फिल्म करते हैं, तो वहां मीटर बदल जाता है। मराठी मेरी मातृभाषा है और मराठी भाषा में बात करना अलग होता है, पर अभिनय करना एकदम अलग होता है। अभिनय करते समय मीटर चेंज करना जरूरी हो जाता है। तो ‘लय भारी’  में जब मैंने अभिनय करना शुरू किया था, तो मीटर को बदलने में मुझे दो दिन का समय लगा था।

आपकी आने वाली दूसरी फिल्म कौन सी है?

‘यशराज फिल्म्स’ की फिल्म ‘बैंक चोर’ कर रहा हूँ। इसके अलावा ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ और ‘हाउसफुल 3’  भी करने वाला हूँ।

बैंक चोर’ में तो पहले कपिल शर्मा ?

मैंने पहले ही कहा कि मैं फिल्म की कहानी, स्क्रिप्ट व किरदार को देखकर फिल्म चुनता हूं। मेरे पास जब इस फिल्म का ऑफर आया,  तो मैंने कहानी व किरदार सुना जो मुझे रोचक लगा, मैंने काम कर लिया। इससे अधिक मुझे पता नहीं।


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Mayapuri

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