INTERVIEW!! फिल्म फिल्म होती है जी! – दिनेश ठाकुर

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मायापुरी अंक, 56, 1975

‘श्यामला’ की शूटिंग के दौरान दिनेश ठाकुर से भेंट हो गई। मैंने कहा। सुना है फिल्म लाइन से निराश होकर आपने टी.वी ज्वाइन कर लिया है?
नही भई, वह तो दोस्ताने में एक प्ले किया था हां, आर्ट फिल्मों से निराश हो गया हूं। पहले मैंने सिद्धांत बनाया था कि केवल कला फिल्मों में ही काम करूंगा क्योंकि अच्छी फिल्में और कम फिल्में करने का इरादा था। लेकिन अब मैंने इरादा बदल दिया है अब मैं कई व्यावसायिक फिल्में कर रहा हूं। दिनेश ठाकुर ने बताया।

आखिर ये निर्णय लेने का कुछ कारण तो होगा? मैंने पूछा।
बिल्कुल है। दिनेश ने कहा। आदमी काम करता है पैसों के लिए, क्योंकि सिद्धांतों से पेट नही भरता, और यह कला फिल्मों वाले पैसे कम देते है और कभी कभार तो जो मिलना होता है वह भी नही मिलता। साल में दस दिन शूटिंग कर ली फिर कुछ महीने हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए। फिर सोकर जागें तो शूटिंग कर ली। इस तरह गृहस्थी तो नही चल सकती दिनेश ठाकुर ने समझाते हुए कहा।
लेकिन जिस प्रकार के आप रोल करते रहे है, उनकी कला फिल्मों के अतिरिक्त गुंजाइश निकलनी मुश्किल है। मैंने कहा।
मैं स्वयं निराश प्रेमी की छाप को हटाना चाहता हूं। कमर्शियल फिल्मों में मैं विलेन का रोल कर रहा हूं। धरती की सौंगंध में डाकू बना हूं ऐसी ही चार-पांच फिल्में है जिनमें विभिन्न प्रकार की भूमिकाएं निभा रहा हूं। एक फिल्म चल गई तो छाप अपने आप मिट जाएगी। दिनेश ठाकुर ने अपनी बात स्पष्ट की।

इसका मतलब है आप फिल्मों को बॉक्स ऑफिस की खिड़की से मापते है? मैंने कहा।
नही, मैं फिल्म को सिर्फ फिल्म समझता हूं, हर फिल्म आर्ट फिल्म होती है। क्योंकि फिल्म स्वंय एक आर्ट है। पिछले दिनों कुछ लोगों ने स्टार-सिस्टम से घबराकर नई कास्ट और कम बजट की फिल्में बनाना शुरू की थी अखबार वालों ने उसका नाम समान्तर सिनेमा रख दिया। हालांकि ऐसी बात नही। उन्हें आप लो बजट की फिल्म कह सकते है किंतु नई लहर का लेबल नही लगा सकते। क्योंकि न्यू वेव तो वी, शांता राम, मेहबूब खान आदि के समय से चली आ रही है यह कोई नई चीज नही है। दिनेश ठाकुर ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा। और मैं मुंह देखता रह गया कि दिनेश में समय के साथ कितना परिवर्तन आया है। पता नही अन्य समान्तर सिनेमा वालों को भी अकल आई है या नही) फिल्म असल में ऐसी होनी चाहिये जो सब देख सकें, समझ सके। ‘उसकी रोटी’ ‘बदनाम’ बस्ती, आदि फिल्में बनाने से क्या लाभ जो डिब्बों में पड़े पड़े ही दम तोड़ दे, दिनेश ने कहा।


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Mayapuri

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