INTERVIEW!! ‘‘फिल्म इंडस्ट्री में प्रोजेक्ट मराठवाड़ा जैसी फिल्में भी बननी चाहिये’’ – ओमपुरी

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इन दिनों पूरे देश में पानी और सूखे को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। महाराष्ट्र में तो सूखे को लेकर अभी तक हजारों किसान आत्म हत्यायें भी कर चुके हैं। इन किसानों की दुर्दशा को आवाम तक पहुंचाने के लिये लेखक निर्देशक भविन वाडिया ने फिल्म ‘प्रोजेक्ट मराठवाड़ा’ बनाई है। इस फिल्म में इस विषय को प्रोत्साहन देते हुये ओमपुरी, दिलीप ताहिल, सीमा विश्वास तथा गोविंद नामदेव जैसे सरीखे अदाकारों ने काम किया है। तीन जून को रिलीज होने वाली इस फिल्म का ट्रेलर हाल ही में प्रेस को दिखाया गया। उसी अवसर पर ओमपुरी ने फिल्म, देश और प्रशासन को लेकर काफी भावुकता भरी बातें की, जो इस प्रकार हैं।

ओमपुरी कहते हैं सबसे पहले तो मैं इस फिल्म को बनाने वाले पटेल बंधूओं की तारीफ करना चाहूंगा जिन्होंने ऐसी फिल्म में पैसा लगाने की हिम्मत की। उसके बाद फिल्म के लेखक और निर्देशक भविन वाडिया की पीठ ठोकनी हैं क्योंकि उसने अपनी पहली फिल्म के लिये ऐसा सब्जेक्ट चुना। आज के आंकडे बता रहे हैं कि अभी तक मराठवाड़ा में 3,9446 लाख किसान आत्म हत्या कर चुके हैं। जबकि हमारे पुराणों में किसान को नाम दिया गया है धरतीपुत्र। आज हम जो अनाज, फल या मसाले खाते हैं वो किसान उगाता है। इन सारी चीजों को हम तक पहुंचाने में उसकी कितनी कड़ी मेहनत है इसका अनुमान हम चाहें तो आसानी से लगा सकते हैं।

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अब अगर प्रशासन की बात की जाये तो जो सब्जी हम एक सौ बीस रूपये किलो खरीदते हैं उसे किसान से महज पांच दस रूपये में खरीदा जाता है। मुझे याद है कि जिन दिनों मैं कॉलेज में था उस वक्त हमारे देश में अनाज की भारी कमी थी तो हम अमेरिका से गेंहू मंगाया करते थे जिसे पीएल 480 गेंहू कहा जाता था। उस गेंहू को अमेरिका में सुअरों को खिलाया जाता था। लेकिन चूंकि उन दिनों हम गरीब थे भिखारी थे और भिखारी की कोई च्वॉईस तो होती नहीं। उस गेंहू का आटा रबर की तरह होता था लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। आज हमारे यहां इतना अनाज पैदा होता है कि हम बाहर भी सप्लाई करते हैं। इसके बाद भी हजारों लाखों टन अनाज इसलिये सड़ जाता है क्योंकि हमारे पास उन्हें रखने के लिये बड़े और वातानाकूलित गोदाम नहीं हैं। करीब दो साल पहले पंजाब में इतनी भारी मात्रा में आलू पैदा हुआ था कि उसे पचास पैसे किलो भी खरीदने वाला नहीं था। हार कर उस वक्त किसानों ने आलूओं के ट्रक के ट्रक रोड़ पर उलट दिये क्योंकि मंडी तक ले जाने पर तो उनका और पैसा खर्च हो जाना था। ये हमारा प्रशासन है। अगर प्रशासन चाहता तो वो सारे आलू खरीद सकता था उनके वेफर या चिप्स बनाकर सप्लाई कर सकता था। क्योंकि आलू से इनके अलावा और भी न जाने कितनी चीजें बनती है लेकिन नहीं, क्योंकि मरना तो किसान को है।

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कुछ अरसा पहले मेरे दिमाग में एक बात आई थी कि हमारे जो छोटे किसान हैं जिनकी महज तीन या दो एकड़ जमीन है। सरकार को उनकी जमीनों में उगने वाली फसल की कीमत लगा कर उसका इंश्योरेंस कर देना चाहिये। अगर कल को सूखे से बाढ़ से फसल खराब हो जाती है तो किसान को तय किया हुआ मुआवजा मिल जाना चाहिये और अगर कुछ नहीं होता तो इंश्योरेंस का पैसा किसान सरकार को दे दे। इससे कम से कम वो भूखा तो नहीं मरेगा, उसे आत्म हत्या करने पर मजबूर तो नहीं होना पड़ेगा। ये कोई ज्यादा बड़ा काम तो नहीं इस पर हमारे  राज्य नेता सोच सकते हैं। दूसरे आज हम पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं लेकिन आज भी हमारे पास इतना पानी है कि हमारे इस्तेमाल के बाद भी उसमें कोई कमी नहीं हो पायेगी लेकिन पिछले साठ साल से इस पर सरकारों ने कोई काम ही नहीं किया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब के भाखड़ा नांगल बांध का दिया जा सकता है जिसे नेहरू जी ने बनवाया था। आज वहां कंकरीट की इतनी चौड़ी चौड़ी नहरे हैं जिनका पानी छोटी नहरों द्वारा हर गांव के खेतों में जाता है। सारे राज्य ऐसी स्कीम पर अमल क्यों नहीं करते। बाजपेयी जी ने एक बार कहा था कि जिस प्रकार हम सड़कों द्वारा राज्यों को जोड़ रहे हैं उसी प्रकार हम नदियों को भी एक दूसरे से जोड़ दे तो किसी भी राज्य में पानी की कोई कमी नहीं होगी। लेकिन क्या किसी ने उनकी बात पर ध्यान दिया ?

इस फिल्म को लेकर ओमपुरी का कहना है कि आज पूरी तरह कमर्शियल हो चुकी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी फिल्में भी बननी चाहिये। ऐसी फिल्मों के बारे में लिखने या दर्शको तक पहुंचाने में प्रैस का योगदान होना चाहिये जिसे प्रैस पूरी ईमानदारी से निभाती भी है। फिल्म मराठवाड़ा एक किसान पात्र के जरिये यहां के हजारों किसानों की स्थिति से अवगत करवाती है।

फिल्म के मुख्य कलाकार हैं ओमपुरी, दिलीप ताहिल, सीमा विश्वास, गोविंद नामदेव तथा कुछ नये चेहरे। फिल्म के निर्मातागण हैं प्रकाश प्रवीण पटेल, जिगना प्रकाश पटेल तथा जय प्रकाश पटेल। लेखक निर्देशक हैं भविन वाडिया ।

 


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Mayapuri

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