INTERVIEW!! “सेंसर के साथ मेरा हमेशा से लव हेट रिलेशनशिप ही रहा है” – प्रकाश झा

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लिपिका वर्मा 

निर्देशक प्रकाश झा  अपनी तरह की हार्ड हिटिंग सब्जेक्ट्स पर फिल्में बनाने में माहिर हैं। रियल मसले से जुडी ड्रामा और कहानी  बखूबी पेश करते हैं झा  साहब। चाहे फिर ‘गंगाजल’ हो और अब ‘जय गंगाजल’ हो या फिर उनकी फिल्म राजनीति हो सबकी सब जनता पर अच्छी खासी छाप छोड़ जाती हैं। झा साहब का सेंसर से भी हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है – उनकी सारी फिल्मों को यू  ए सर्टिफिकेट ही मिलते आएं है, “जी हाँ मेरी इस फिल्म,”जय गंगाजल को भी यू ए सर्टिफिकेट ही मिला है। उन्होंने मुझे 11 कट्स करने को कहा – सेंसर के साथ मेरा हमेशा से लव हेट रिलेशनशिप ही रहा है। कुछ बोल चाल  के शब्दों को काटने  को कहा – जैसे रंडी खाना, साला और घंटा  – वगैरह वगैरह, खैर पहलाज को इन शब्दों को काटना था सो हम फिर ट्रिब्यूनल गए और वहां  से हमें यू ए सर्टिफिकेशन मिल गया है। सेंसर बोर्ड को यह समझ लेना चाहिए  कि जनता बहुत समझदार है और हमें जो कुछ रियल में होता है क्रिएटिव तौर से उसे जस्टिफिकेशन के लिए दिखाना  ही पड़ता है। खैर यह कुछ चुनिन्दा  लोग जो सेंसर बोर्ड को रिप्रेजेंट करते हैं उनके हिसाब से यह नहीं चाहिए या फिर वह नहीं चाहिए। इन सब को तो हमे झेलना ही होता है।”

लिपिका वर्मा के लिए ढ़ेर सारे सवालों के जवाब दिए निर्देशक प्रकाश झा  ने – तो पेश है एक सुंदर सी गुफ्तुगू

Priyanka Chopra with Prakash Jha
Priyanka Chopra with Prakash Jha

कहानी के बारे में थोड़ा बहुत बताएं ?

इस डिस्ट्रिक्ट की एक जरूरत थी कि यहाँ पर जैसी  स्थिति है उस में कुछ फेर बदल ना  हो। तो उन्होंने सोचा एक लेडी पुलिस ऑफिसर को वहां भेज  दिया जाये। ऐसा मानना  है सबका कि लेडी कुछ कमजोर होती है और उसे यही  बोलकर भेजा भी गया है इस डिस्ट्रिक्ट में कि तुम्हे  कुछ नहीं करना है बस वहां जाकर शांति से बैठे रहना है। किन्तु उनका यह सोचना  कि एक लेडी पुलिस ऑफिसर कमजोर होती है उन पर भारी  पड़ा। ठीक  उनकी सोच  के विपरीत प्रियंका एक बहुत ही ताक़तवर लेडी पुलिस निकली जो सही करने में विश्वास  रखती है।

आप हमेशा से हार्ड हिटिंग कहानियां ही बनाते आये  हैं ? 

मेरे दिमाग  में कोई कहानी नहीं रहती है। पर हाँ जो कुछ भी  रियेलिटी में चल रहा होता है वह मेरे दिमाग में बतौर ऑडियंस चल रहा होता है और क्यूंकि मैं उस मुद्दे से जुड़ कर कुछ सोच पाता हूँ इसलिए ऐसी फिल्में बना लेता हूँ। राजनीति और प्रशासन से जुड़े मुद्दों में ड्रामा तो दिख पड़ता है सो ऐसी फिल्में बनाने में मुझे ऐसा लगता है कि लोगों को कुछ मैसेज मिल पायेगा। किसी भी कहानी को बुनने में मुझे 4/5 साल लग जाते हैं। कितनी भी जटिल कहानी  हो कथा सार्थक होनी चाहिए। मेरा ऐसा मानना है कि  जो कुछ मैं कहूं उस कथा में, वह कथा  एक बच्चे को भी समझ आनी चाहिए।

Manav kaul with Prakash Jha
Manav kaul with Prakash Jha

आपकी पृष्ठभूमि बतौर कहानी नार्थ बेल्ट की ही होती है क्यों ?

देखिये सीधी  सी बात है हिंदी बेल्ट जो यु पी, एम पी और बिहार है और मैं इस संरचना और बनावट को अच्छी तरह से जानता हूँ, वही पर  पला बड़ा हुआ हूँ और भाषा से भी इत्तेफाक रखता हूँ तो जाहिर सी बात है वहीं का सब्जेक्ट  लेकर बनाने में बेहद संतुष्टि होती है। अब बैंग्लोर जाकर फिल्म तो नहीं बना सकता हूँ क्यूंकि वहां  की भाषा से और बनावट से बिल्कुल  इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता हूँ। वही कुछ करता है एक फिल्ममेकर जिसे करने में उसे अच्छा लगे और बखूबी उसे कर पाये। अपने ज्ञान को सच्चाई  और ईमानदारी से पेश करना चाहता हूँ और वही करता हूँ।

प्रियंका चोपड़ा  आपकी पहली च्वॉइस थी ?

बिल्कुल जैसे ही हमने यह तय किया कि एक  महिला पुलिस कर्मी को लीड रोल में दिखाना है सो हमारे जहन में सबसे पहले प्रियंका का नाम ही आया। वह बरेली से हैं और यू पी से भी इत्तेफाक रखती हैं, उसका डील डॉल भी पुलिस कर्मी जैसा लगता है सो हमने केवल १५ मिनट में उसे कहानी सुनाई और वह राजी भी हो गयी। दरअसल में मुझे सिर्फ इस बात का डर  था कि प्रियंका बहुत बिजी हैं और समय  नहीं दे पायेगी। लेकिन  उसने मुझ से कहा  यह किरदार मैं ही करुँगी।

Prakash Jha
Prakash Jha

‘जय गंगाजल’ की प्रियंका और ‘गंगाजल’ के अजय में क्या फर्क देखते हैं आप ?

अजय एक स्वाभाविक  रूप से परफॉर्म करता है किन्तु प्रियंका ढ़ेर सारे सवाल पूछती है और फिर जो कुछ करती है वो किरदार से इतना मेल खाता  है कि चरित्र को हूबहू आप पर्दे पर देख पाते  हैं।  हालाँकि  वह भी स्वाभाविक  तौर की परफॉर्मेंस देती है। दोनों ही एक्टर्स बेहद चैलेंजिंग  किरदारों को अपना बेस्ट देते हैं।

‘क्वांटिको’ की एलेक्स और ‘जय गंगाजल’ की आभा माथुर में क्या फर्क देखते हैं आप ?

हमने जब प्रियंका को साइन  किया था वह 2014 फरवरी था और उसके बाद वहाँ जाकर प्रियंका वापस लौटी। हमारी फिल्म पूरी करने के बाद ही ‘क्वांटिको’ गई वह। हमें एलेक्स के बारे में कुछ नहीं मालूम था। प्रियंका हमारी फिल्म में एक पुलिस ऑफिसर का किरदार कर रही थी और हमें अपनी आभा माथुर के बारे में सब कुछ मालूम था। हम ने किसी  से प्रेरित होकर यह किरदार में प्रियंका को नहीं लिया। वह एक अच्छी अभिनेत्री है प्रोफेशनल है और उसे लेने में हमें क्या दिक्क्त  है ? हमें कुछ फेर बदल नहीं करना पड़ा। जैसा हमारा किरदार लिखा गया था वैसा  ही पर्दे पर दिखायी देगा।

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जे एन  यू का जो मसला चल रहा है अभी  उस पर आप फिल्म बनाएंगे  कभी ?

अभी तक कुछ सोचा नहीं है। पर हाँ यदि एक बच्चा किसी  प्रेशर से आत्महत्या करता है तो मेरे  जेहन में यह जानने की उत्सुकता होती है कि उसके मन -मस्तिष्क में क्या चल रहा होगा ? बस सोचते सोचते  ही में कहानी  के परिवेश में  चला जाता हूँ। जहां तक जे एन यू  का मुद्दा देखने को मिल रहा है ड्रामा और कॉमेडी तो दिखाई पड़ती है। बच्चों का  वकील उनके सरेंडर होने की शर्त  रख रहा है। ब्यूरोक्रेसी, पॉलीटिक्स इत्यादि पर मेरी आँख और कान दोनों ही खुले रहते हैं। अपनी ऑब्जर्वेशन के हिसाब से चीज़ों को देखता हूँ, यह कह सकता हूँ कि जो कुछ आस पास चल रहा होता है उसे लेकर मैं कुछ ज्यादा अवेयर  रहता हूँ और जे एन  यू  के मामले में भी ड्रामा तो दिख ही रहा है और जो कुछ भी मेरे दिमाग में जमा हो जाता है तो कहानी तो बनती है। किसी  कहानी को अंजाम देना होता है तो इस सोच से ही कहानी बनाता  हूँ फिलहाल मैंने जे एन यू मसले पर फिल्म बनाने पर विचार ही नहीं किया है।”

 


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Mayapuri

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