INTERVIEW: हिन्दी हमारी फिल्मों का एक महत्वपूर्ण अंग है – इरफान खान

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आज हमारी राष्ट्रीय भाषा हिन्दी पर अंग्रेजी लगभग पूरी तरह से हॉवी हो चुकी है। आज कोई कितना भी इंटेलीजेनट या विद्वान हो,अगर वो अंग्रेजी नहीं जानता तो उसकी कोई औकात नहीं। एक वक्त था जब हम अंग्रेजी बोलते हुये शर्म महसूस करते थे इसीलिये उसे बोलते हुये हकलाते थक, लेकिन पिदर्श उल्टा हो चुका है क्योंकि आज खासकर युवावर्ग हिन्दी बोलते हुये शर्म महसूस करता है। इस गंभीर मुद्दे को निर्देशक साकेत चौधरी की फिल्म ‘ हिन्दी मीडियम’ में इरफान खान जौर शौर से उठाते नजर आ रहे हैं। फिल्म  और हिन्दी को लेकर इरफान से एक बातचीत ।

आपको लगता है कि फिल्म हिन्दी को लेकर माहौल पैदा करने में कामयाब होगी ?

फिल्म सिर्फ फिल्म होती है, वो बस अपनी बात प्रभावशाली  ढंग से कह सकती है। बेशक उसका प्रभाव तो पड़ता है लेकिन ऐसा भी नहीं कि फिल्म देखते ही लोग अंग्रेजी छोड़ हिन्दी बोलना शुरू कर देगें। समाज में  जब भी कुछ बदलाव होते हैं तो उनके लिये काफी कुछ करना पड़ता है। जैसे सरकार को उसके लिये अलग से पॉलिसी बनानी पड़ती है, जिसके द्धारा लोगों में अवयरनेंस पैदा होती है। हिन्दी को बढ़ावा देने के लिये सरकार को ऐसे हिन्दी स्कूल बनाने पडेंगे जिनका स्टेटस अंग्रेजी स्कूलों की तरह ही हो, इसके अलावा लोगों में विश्वास पैदा करना होगा कि उनके बच्चे हिन्दी स्कूल में भी अच्छी शिक्षा पा सकते हैं।  तब कहीं जाकर लोगों में हिन्दी का लेकर एक विश्वास पैदा होगा।

बॉलीवुड भी अंग्रेजी को बढ़ावा देने में अग्रणी माना जाता  है ?

बावजूद इसके हिन्दी हमेशा हमारी फिल्मों का महत्वपूर्ण अंग बनी रहेगी। अगर  आप पीछे मुड़कर देखें तो आपको पता चलेगा कि बॉलीवुड के जितने भी नामचीन अभिनेता रहे हैं उनका हिन्दी और उर्दू पर हमेशा बेहतरीन कमांड बनी रही जैसे दिलीप कुमार, राज कपूर, देवानंद, राजेश खन्ना या अमिताभ आदि। इनके अलावा मनोज बाजपेयी, रोनित रॉय और आशुतोष राणा बढि़या हिन्दी बोलते हैं। हिन्दी की बदौलत ही इन स्टार्स का इन्डस्ट्री में एक अलग मुकाम है।  हम कह सकते हैं कि हिन्दी सिनेमा को हिन्दी की जरूरत रहेगी तब तक हिन्दी बनी रहेगी।

फिल्म के बारे में आप क्या सोचते हैं ?

हम एक  से एक मुद्दों को अपनी फिल्मों का विषय बना रहे हैं लेकिन अभी तक किसी का भी इस इशू की तरफ ध्यान नहीं गया । जिस प्रकार हम धीरे धीरे अपनी भाषा को अपने से दूर करते जा रहे है, इसकी वजह  विदेशी भाषा अंग्रेजी को माना जा रहा है। आपने देखा होगा कि आजकल अंग्रेजी स्कूलों  में अगर कोई बच्चा हिन्दी बोलता हुआ पकड़ा जाये तो उस पर बाकायदा फाइन लगा दिया जाता है । फिल्म में ऐसी बहुत सारी बातें कहने के अलावा ये बताया गया है कि अंग्रेजी को लेकर हमारी जो मानसिकता बन चुकी है कि हम अंग्रेजी के बिना कुछ नहीं । यानि  हम मान चुके हैं कि अगर अंग्रेजी नहीं तो कोई भविष्य नहीं।

फिल्म करने की क्या यही वजह रही ?

मैं हमेशा उन्हीं कहानियों के बारे मैं सोचता हूं जो यूनिक होने के अलावा कुछ कहती नजर आती हो। रही बात इस फिल्म की तो अभी तक किसी हिन्दी फिल्म में ऐसा सब्जेक्ट नहीं आया।  मैं भी एक अरसे से कुछ अलग सा करना चाहता था, इसीलिये काफी दिनों से मैं एक ऐसा सब्जेक्ट ढूंढ रहा था, जो फिल्म के माध्यम से हल्के फुल्के हास्य द्धारा  अपनी बात कुछ इस ढंग से कहे, जिसे हर उम्र का दर्शक देखे और सुने।

भूमिका को लेकर क्या कहना  है ?

मैं दिल्ली के चांदनी चौंक  में एक बुटिक शॉप का मालिक हूं जहां नामचीन ड्रैस डिजाइनर्स की लेडीज डुप्लीकेट ड्रैसिस सेल की जाती हैं। मेरा मानना है कि लेडीज ड्रैस बेचने का आनंद कुछ और ही होता है । अगर मेरी लव स्टोरी की बात की जाये तो जिन दिनों  यह एक छोटी सी दुकान हुआ करती थी जिसे मैं अपने पिता के साथ चलाता था। उन्हीं दिनों ग्राहक के रूप में आई एक लड़की पर मैं बुरी तरह से मर मिटा और उसके साथ शादी के सपने देखने लगा। यहां मेरे पिता ने मुझको समझाया भी, कि लड़की दूसरे तबके की है, लिहाजा उसके साथ तेरी पटरी नहीं बैठ पायेगी । लेकिन मैने अपने पिता की बात को नजर अंदाज करते हुये उसी लड़की से शादी की। एक वक्त ऐसा भी आया जब मेरी दुकान  तीन मंजिले शोरूम में तब्दील हो गई । अब अगर चॉदनी चौक की बात की जाये तो वह आज भी वैसा ही है जैसा बरसों पहले हुआ करता था था यानि वही भीड़ भाड़ ,छोटी छोटी तंग गलियां, इसीलिये मुझे अपनी कार दो किलोमीटर दूर खड़ी कर रिक्क्षा से घर आना पड़ता है।

चांदनी चौंक के कल्चर में ढलने के लिये कितना रिसर्च किया?

ऐसा कुछ नहीं करना पड़ा क्योंकि मेरे लिये कुछ भी नया नहीं  था। मैं ये सब बहुत पहले से देखता आया हूं। वहां का कल्चर, वहां की भाषा  अन्य शहरों से कतई अलग है। मुझै आज भी याद है कि चांदनी चौंक की सुबह  छौले कुलचे, छौले पठूरे, परांठे  लस्सी या जलेबी  जैसे नाश्ते से शुरू होती है। हमारी फिल्मों में अभी तक इस प्रकार की भाषा और सेंस ऑफ ह्यूमर  का इस्तेमाल बहुत कम किया गया है।

 


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Mayapuri

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