जगजीत सिंह

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ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी को श्रद्धांजलि

भारत के महान ग़ज़लों के समर्थ जगजीत जी जिन्होंने उर्दू के कम जानकारों के बीच न सिर्फ शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी हमारा परिचय कराया। उस जगजीत सिंह का जन्म 8 फ़रवरी, 1941 को राजस्थान के गंगानगर में हुआ था।जगजीत सिंह के पिता सरदार अमर सिंह धमानी भारत सरकार के कर्मचारी थे और माँ बच्चन कौर था । जगजीत जी की शुरुआती शिक्षा गंगानगर के खालसा स्कूल में हुई और बाद पढ़ने के लिए जालंधर आ गए जहाँ उन्होंने डीएवी कॉलेज से ग्रेजुएशन की डिग्री ली और इसके बाद कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से इतिहास में पोस्ट ग्रेजुएशन भी की।1967 में जगजीत जी की मुलाक़ात चित्रा जी से हुई और मुलाकात के ठीक दो साल बाद दोनों 1969 में शादी कर ली।

 जगजीत जी को बचपन में अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंड़ित छगन लाल शर्मा के सान्निध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरुआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत     सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे 1965 में मुंबई आ गए।

 मुम्बई आकर जगजीत सिंह ने बहुत स्ट्रगल किया और मुम्बई में पेइंग गेस्ट के तौर पर रहते हुए विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। लेकिन ये तो सिर्फ उनके संघर्षों के दौर का शुरूआत भर था। इसके बाद फ़िल्मों में हिट संगीत देने के सारे प्रयास बुरी तरह नाकामयाब रहे। कुछ साल पहले डिंपल कापड़िया और विनोद खन्ना अभिनीत फ़िल्म ‘लीला’ का संगीत औसत दर्ज़े का रहा। 1994 में ख़ुदाई, 1989 में बिल्लू बादशाह, 1989 में क़ानून की आवाज़, 1987 में राही, 1986 में ज्वाला, 1986 में लौंग दा लश्कारा, 1984 में रावण और 1982 में सितम के न गीत चले और न ही फ़िल्में। जगजीत सिंह की किस्मत बदलने वाला साल था 1975 जिसमे उन्होंने एचएमवी में अपनी पत्नी चित्रा के साथ पहला एलबम द अनफॉरगेटेबल्स निकाला और 1980 दशक में एलबम और कंसर्ट का आयोजन बढ़ा और फ़िल्मों में भी सफलता मिलने लगी और इस कदर छाए की 1987  डिजिटल सीडी एलबम ‘बियोंड टाइम’ करने वाले पहले भारतीय संगीतकार बने। लेकिन जगजीत सिंह का दुखों से नाता कभी नहीं टुटा और 1990 में उनके इकलौते बेटे विवेक (18 वर्ष) की एक सड़क हादसे में हुई मौत हो गई जसने ने जगजीत जी के जीवन में दर्द भर दिया और फिर 2009 में चित्रा सिंह की पहली शादी से हुई बेटी मोनिका चौधरी (49 वर्ष) की आयु में आत्महत्या कर ली इस तरह इनके जीवन में ओल्ड का सुख ही नहीं रहा।

इस महान गायक ने ग़ज़लों के संसार में तो अपना नाम बनाया लेकिन दुखों और संघर्ष ने कभी भी इनका पीछा नहीं छोड़ा उनकी कुछ ग़ज़ल आज भी लोगों के ज़ुबान और उनकी ज़िन्दगी के खालीपन को भर्ती रहती हैं जैसे 1981 में रमन कुमार निर्देशित ‘प्रेमगीत’ और 1982 में महेश भट्ट निर्देशित अर्थ को भला कौन भूल सकता है। अर्थ में जगजीत जी ने ही संगीत दिया था। फ़िल्म का हर गाना लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया था।[3] ये सारी फ़िल्में उन दिनों औसत से कम दर्ज़े की फ़िल्में मानी गईं। ज़ाहिर है कि जगजीत सिंह ने बतौर कमज़ोर बहुत पापड़ बेले लेकिन वे अच्छे फ़िल्मी गाने रचने में असफल ही रहे। कुछ हिट फ़िल्मी गीत ये रहे-

‘प्रेमगीत’ का ‘होठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो’

‘खलनायक’ का ‘ओ मां तुझे सलाम’‘दुश्मन’ का ‘चिट्ठी ना कोई संदेश’,‘जॉगर्स पार्क’ का ‘बड़ी नाज़ुक है ये मंज़िल’,‘साथ-साथ’ का ‘ये तेरा घर, ये मेरा घर’ और ‘प्यार मुझसे जो किया तुमने’,‘सरफ़रोश’ का ‘होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है’,ट्रैफ़िक सिगनल का ‘हाथ छुटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते’ ,‘तुम बिन’ का ‘कोई फ़रयाद तेरे दिल में दबी हो जैसे’,‘वीर ज़ारा’ का ‘तुम पास आ रहे हो’,‘तरक़ीब’ का ‘मेरी आंखों ने चुना है ,तुझको दुनिया देखकर’ आदि।

मगर 23 सितम्बर को अचानक हुए ब्रेन हैमरेज के कारण जगजीत सिंह जी को मुम्बई के लीलावती अस्पताल में भर्ती करवाया गया जगजीत सिंह 25 सितम्बर को कोमा में चले गए थे। जिन्दगी और मौत के बीच उन्होंने लगभग 15 दिन गुजारे और मौत से संघर्ष करते हुए उन्होंने सोमवार 10 अक्टूबर, 2011 को सुबह आठ बजे मुम्बई के लीलावती अस्पताल के उस कमरे में अन्तिम सांस ली, जो शायद उन्हीं के दिए हुए गुप्त दान से बना था।


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Mayapuri

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