INTERVIEW!! ‘‘पता नहीं बॉलीवुड में बच्चों की फिल्मों को अनसेफ क्यों माना जाता है’’ – जिमी शेरगिल

1 min


जिमी शेरगिल अपने अभी तक के काम से बता चुके हैं कि वे कितने उम्दा एक्टर हैं। अभी तक सौ के करीब हिन्दी और पंजाबी फिल्मों में अपने अभिनय का जौहर दिखा चुके जिमी शेरगिल इन दिनों बाल फिल्म ‘शॉर्टकट सफारी’ के लिये चर्चित हैं। फिल्म को लेकर उनसे एक बातचीत ।

इस फिल्म में बच्चे ही नायक हैं या ….?

बेशक इस फिल्म में बच्चे ही हीरोज हैं। मैं बस बच्चों को सर्पोट कर रहा हूं। दरअसल फिल्म के डायरेक्टर अमिताभ सिंह बेसिकली सिनेमैटोग्राफर हैं, उनके साथ मैने फिल्म ‘यंहा’ की थी, बाद में सुजीत सरकार के साथ एड फिल्में करते हुये इनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। इस फिल्म के लिये ये मेरे पास आये और इन्होंने मुझे इस फिल्म के बारे में बताते हुये कहा कि इसमें आपके लिये एक रोल है हम चाहते हैं कि उसके लिये आप हमें चार पांच दिने दें। मैंने उन्हे अपनी स्वीकृति दे दी।

फिल्म की शूटिंग कब की ?

मेरे पास जब कुछ डेट्स फ्री हुई तो मैं फिल्म की शूटिंग के लिये जहां गया, वह कमाल का फॉरेस्ट था। पांच सौ किलोमीटर के क्षेत्र में फैला ऐसा घना जंगल इससे पहले मैंने कभी नहीं देखा था। फिल्म के तकनीशियन कमाल के थे। सबसे बड़ी बात कि फिल्म ग्लोबल वार्मिंग तथा नेचर को लेकर एक मैसेज भी देती है।

Energetic-Jimmy-Shergill

इस तरह की फिल्में ज्यादातर डॉक्यूमेंट्री बन कर रह जाती हैं ?

इस बात का पूरा ख्याल रखा गया कि बच्चों की फिल्म है तो इसे दिलचस्प बनाने के लिये थोड़ा एडवेंचर डाल दिया जाये। कहानी के अनुसार एक नेशनल स्कूल के बच्चों को पिकनिक के तौर एक जंगल के पास ले जाया जाता है। वह सब भटक कर रीयल जंगल में आ जाते हैं और जब यह सब रीयल जंगल में चले जाते हैं तो वहां इनका डायरेक्ट इन्काउंटर है नैचर के साथ। इसके अलावा हम किस प्रकार नैचर के साथ खेल रहे हैं इसका खमियाजा हमें कितने खतरनाक तरीके से भुगतना पड़ सकता है। वह सारी चीजें यह फिल्म कहती है ।

आपकी क्या भूमिका है ?

एक ऐसा इंसान जो इन बच्चों को जंगल में मिलता है और फिर इन सब की जिन्दगी और थोड़ी मुश्किल करता है या आसान करता हैं। शायद वह ऐसा करके इन्हें जिन्दगी में लड़ने के लिये प्रेरित करता है, इन्हें हिम्मती बनाता है। मुझे जो जो ड्रेस दी गई है वह भी दिलचस्प है। आप कह सकते हैं कि ये कुछ मिस्टीरियस टाइप रोल है।

jimmy sheygil 3

बच्चों की फिल्में न के बराबर आने की क्या वजह हो सकती है ?

काश इसकी वजह मुझे पता होती। जहां तक मेरी बात है तो मैं हमेशा ऐसी फिल्मों को सपोर्ट करने की कोशिश करता हूं। जिसमें बच्चे पांच छह साल के हो सकते हैं या दस बारह साल के भी हो सकते हैं। हाल ही में मैंने ऐसी ही एक फिल्म ‘वर्तक नगर’ की है। वह अस्सी के दशक की एक पीरियड फिल्म है और उसमें भी सारे बच्चे ही हीरोज हैं।

बच्चों के साथ काम करने से पहले क्या कुछ तैयारियां करनी पड़ती हैं ?

देखिये वह भी होती तो एक फिल्म ही है न इसलिये वहां भी अपने जहन में अपना किरदार लेकर ही जाया जाता है। दरअसल बच्चों को पहले दोस्त बनाना होता है, उनके साथ बच्चा बनना पड़ता है। मैं जब इस फिल्म के लिये जंगल में गया तो ऑलरेडी बच्चे अपने किरदारों में घुसे हुये थे इसलिये उनके साथ काम करने में कोई ज्यादा अलग से कुछ नहीं करना पड़ा।

Shotcut-safari]

क्या बच्चों की फिल्में देखते हैं ?

हां हां क्यों नहीं। बाहर बच्चों की फिल्में काफी तादाद में बनती ही रहती है। यहां भी कुछ अच्छी फिल्में बनी हैं जैसे मकड़ी, स्टेनली का डब्बा आदि। पता नहीं बॉलीवुड में बच्चों की फिल्मों को क्यों अनसेफ माना जाता है ।


Like it? Share with your friends!

Mayapuri

अपने दोस्तों के साथ शेयर कीजिये