आरती के अलफ़ाज़ – कल ने कल से कहा

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Aarti Mishra

आरती के अलफ़ाज़ – कल ने कल से कहा

Aarti Mishra

कल की ही यादें होती हैं…

कल की ही बातें होती है…

यह कल है क्या…

जो ना कभी आया था और ना कभी आएगा…

फिर भी आज के पलों में इन्ही की बातें क्यों होती है…

जो है ही नहीं उसकी चर्चा क्यों…

जो दिखता ही नहीं उसका ज़िक्र क्यों…

मालूम होता है की प्यार ‘कल’ से नहीं बल्कि नफ़रत ‘आज’ से है…

तयारी ‘कल’ की नहीं बल्कि छुट्टी ‘आज’ से है…

यह आज ही तो है मेरे पास, तुम्हारे पास, सबके पास मगर इसमें जीना न आया हमें…

चार लोगों की महफ़िल में बैठे और बातें कुछ यूँ हुई की एक साल बाद यहाँ जाएंगे, तीन महीने बाद यह काम करेगे, कल से यह नियम का पालन करेंगे।

यह साल, महिना, दिन है भी या बस दिल का वेहम है?

दोस्तों की महफ़िल में पुरानी यादें ताज़ा की जा रही थी… एक साल पहले हम इस कॉलेज में यह कर रहे थे, चार महीने पहले उसकी पार्टी में यह किया था, दो दिन पहले मुझे यह हुआ था… अब यह जो वक़्त है क्या वो कभी था भी?

नहीं…

इस ‘कल’ के दो चेहरे हैं… एक बीता हुआ ‘कल’ और एक आने वाला ‘कल’… और ताजुब की बात यह है की दोनों ही ना कभी थे न होंगे, मगर ज़िन्दगी की सारी परेशानीओं का कारण ही यह दोनों हैं।

एक से हम बाहर निकल नहीं पाते और एक में बिना पड़े हम रह नहीं पाते. और इन सब में यह ‘आज’ पिस जाता है. जो बीत गया उसकी खुशियाँ और गम याद करके क्या मिलेगा?

और जो आने वाला है उसकी चिंता में भी पड़े रहकर क्या ही हासिल होगा? कुछ भी नहीं, यह सिर्फ इस पल से यानी ‘आज’ से भागने का एक ज़रिया है।

इस पल से सब भागना चाहते हैं, कोई इसका सामना नहीं करना चाहता, जिस पल इस ‘आज’ से जंग जीत ली, उसी पाल मान लो बाज़ी तुम्हारी।

एक दफ़ा तो दोनों ‘कल’ के बीच में बहस भी कुछ इस तरह हो गई थी…

कल ने कल से कहा…

जा ही रहा है तो अपने सरे क़र्ज़ लेता जा.

इस से पहले तेरी स्याही मेरे पन्नो पर गिरे,

वाही थम जा…

तेरा दरिया मेरे समंदर में मिले,

वहीँ जम जा…

तेरे साए के कफन में घुट कर नहीं जीना मुझे बल्कि

तेरी चिता की आग में हाथ सेंकना है.

क्यों?

क्यूंकि मैं आने वाला कल हूँ,

तु गुज़रा हुआ कल है…

तेरी मौत होगी तो ही मैं सांस लूँगा.

तो बस यही दुआ है…

की इस पल में जीना आ जाए, काश इस ‘आज’ में जीना आ जाए.


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Mayapuri

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