अभिनय कौशल की कामिनी – कामिनी कौशल

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मायापुरी अंक 48,1975

मैंने पूछा इस उम्र में भी ‘अपने रंग हजार’ में आपने मॉडल डांस करने में कोई झिझक नहीं दिखायी?

कामिनी कौशल ने मुस्कुराकर कहा एक्टिंग एक्टिंग है। उसमें झिझक किस बात की। कई बार ऐसा होता है कि हमें अपनी असल जिंदगी से हटकर फिल्मों में रोल अदा करना पड़ता है। किंही हालात में तो आयु और अनुभव भी साथ नहीं देते।

अपनी फिल्म कहानी की चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि मैं अध्यापिका बनना चाहती थी और घरवालें मुझे डॉक्टर बनना चाहते थे पर संयोग कुछ ऐसा बना कि मैं फिल्मों की हीरोइन बन गयी। यह सब अचानक इस तरह हुआ कि आज भी उन बातों को याद करती हूं तो सिहर उठती हूं। मैं उन दिनों रेडियो नाटक में भाग लेती थी। एक दिन मैं एक रेडियो नाटक में भाग ले रही थी कि वहां अचानक पहुंच गये निर्माता निर्देशक चेतन आनंद वह प्राय:हमारे घर भी आया करते थे पर दिन रेडियो नाटक में भाग लेते हुए मुझे उन्होंने गौर से देखा। नाटक समाप्त होते हुए मेरे पास आये और शाबाशी देते हुए पूछा क्या मेरी फिल्म की हीरोइन बनोगी? मैं उस सवाल का जवाब देती। मुझे पशोपेश में देखकर उन्होंने कहा तुम पर घरवालों की चिंता न करो। मैं तुम्हारे भाई को जानता हूं। उन्हें राजी करना मेरा काम है। मैं डर गयी, अब क्या होगा क्योंकि मेरे भाई साहब बड़े सख्त थे।

यह घटना सन् 1945 की है जब लड़कियों का फिल्मों में कार्य करना सांस्कारिक बात नहीं मानी जाती थी। पर चेतन आनंद ने किसी तरह उमा कश्यप (कामिनी कौशल का घरेलू नाम) के भाई को राजी कर लिया। इस तरह अनहोनी होनी हो गयी और (उमा कश्यप) कामिनी कौशल के नाम से चेतन आनंद की पहली फिल्म ‘नीचा नगर’ की हीरोइन बन गयी।

कामिनी कौशल अपनी पहली फिल्म के साथ ही चमक पड़ी। उसके बाद ‘आग’ नदिया के पार’‘शबनम’ ‘शहीद’’बिराज बहू’’आरजू’’गोदान’’आदि फिल्मों से यह सिद्ध’ हो गया कि कामिनी कौशल संवेदनशील अभिनेत्री हैं और चरित्रों को साकार करने की उनमें पूर्ण क्षमता है। ‘नदिया के पार’ का वह दृश्य जिसमें दिलीप कुमार और कामिनी कौशल भंवर में फंस कर अपने प्राण खा देते हॆ। आज भी दर्शकों को आत्मभूत किये हुए है। उस दृश्य को देखकर हजारों दर्शकों की आंख सजल हो उठी थी। न जाने कितने प्रेमी फूट-फूट कर रोये थे। इस फिल्म का समाज पर भी गहरा असर पड़ा और लोग यह महसूस करने लगे कि परिवारों और वर्गो के बीच वर्गो से चली आ रही दुश्मनी कितनी खतरनाक हो सकती है। इसी तरह‘शहीद’ फिल्म देश की शहीदों के प्रति भावभीनी श्रद्धांजलि है जिसके साथ कामिनी कौशल की भावुक भूमिका भी याद की जाती रहेगी।

कामिनी कौशल ने अपनी भूमिकाओं के प्रसंग में बताया यह संयोग की बात है कि विविध भारती के ‘हवामहल’ कार्यक्रम के अंतर्गत ‘गोदान’ नाटक में मैंने धनिया की भूमिका की थी और वही भूमिका मुझे फिल्म ‘गोदान’ में भी मिली। फिल्मिस्तान की ‘शहीद’ में मैंने दिलीप साहब के साथ हीरोइन का पार्ट अदा किया था पर मनोज कुमार की ‘शहीद’ में मैंने भगत सिंह की मां का रोल अदा किया और जब उस फिल्म की शूटिंग हुई तो में वस्तुत: मां बनने जा रही थी। मुझे सात मास का गर्भ था। वस्तुत: उस मेरी भूमिका के लिए मातृत्व मेरी रगों में उमड़ आया। शहीद भगतसिंह की मां ने जब मेरी वह भूमिका देखी तो मुझे सीने से लगा लिया और हम दोनों की आंख सजल हो उठी। फिल्म ‘आंसू’ में मैंने एक लड़की के बचपन से मृत्यु तक की भूमिका अभिनीत की तो लगा जैसे वह जिंदगी मैं खुद जी रही हूं। एक जीवन में व्यक्ति कितनी ही वस्तुओं को प्यार करता है। इसकी अभिव्यक्ति कुछ कठिन तो थी परंतु थी रोचक। इस फिल्म की नायिका चंचल थी, सुंदर थी, एक पतिव्रता पत्नी थी, एक ममतामयी मां थी और उसने प्रत्येक क्षण प्यार किया था। प्यार के लिए वह जी रही थी।

यह बात सही है कि ‘शहीद’ और उसके बाद ‘शबनम’ में कामिनी कौशल ने ऐसा प्यार भरा अभिनय किया कि उन दिनों दोनों की रोमांटिक जोड़ी विख्यात हो गई। और यह बात भी किसी हद तक सही है कि कामिनी कौशल के उस प्यार भरे अभिनय पर दिलीप कुमार फिदा हो गये और दिल से कामिनी को चाहने लगे। पर वह जीवन साथी कैसे बन सकते थे, कामिनी कौशल पहले से ही गृहस्थी के बंधनों में बंध गयी थी। उन्होंने अपनी बड़ी बहन की मृत्यु के बाद उनके बच्चों की देखभाल के लिए जिन्हें वह पहले से ही प्यार करने लगी थी। अपने जीजा सूद साहब से शादी कर ली। वह सब श्रीमती सूद थी। एक ओर उनकी अपनी गृहस्थी थी, दूसरी ओर फिल्मी दुनिया थी। दोनों के बीच टकराव भी था जिससे परेशान होकर कामिनी कौशल ने पहले तो फिल्मों से कुछ दिनों के लिए अलविदा ली, और जब वापस आयी तो इस फैसले के साथ कि वह भविष्य में दिलीप कुमार के साथ काम नहीं करेंगी। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।

भारत भर में कामिनी कौशल पहली अभिनेत्री है। जिन्होंने खोंसला कमेटी की चुंबन और आलिंगन संबंधी सिफारिशों का समर्थन किया है। उनका कहना है कि यदि फिल्म की कहानी को सजीव बनाने के लिए चुंबन आलिंगन आदि दृश्यों की जरूरत हो तो वे अवश्य लेने चाहिए। उन पर आपत्ति करना कला की सेवा से पीछे हटना है।

अपनी अभिनय कला के बारे में उन्होंने बताया कि रेडियो कलाकार के रूप में मुझे ट्रेनिंग मिली वह मेरे बहुत काम आई। रेडियो आपकी आवाज़ को जो ट्रेनिंग देता है। दूसरी चीज नहीं दे सकती। आपको अपनी आवाज के माध्यम से ही अपने सभी भावों और संवेदनाओं को व्यक्त करना होता है। आज की नवोदित हीरोइनों की मेरी यही सलाह है कि वे ठीक से संवाद बोलना सीखें। संवाद इस तरह बोलें जैसे सीधे उनके ह्रदय से निकले हों उन्हें प्रत्येक भाव की अभिव्यक्ति में ईमानदारी से कोशिश करनी चाहिए। अभिनय कला का यही सर्वाधिक महत्वपूर्ण रहस्य है। ‘बिराज बहू’ फिल्म में कार्य करने से पहले उसकी नायिका के चरित्र को सहजभाव से आत्मसात करने के लिए मैंने उस उपन्यास को बाईस बार पढ़ा था। इसी तरह ‘आंचल के फूल’ में ग्रामीण नारी की संवेदनाशील भूमिका साकार करने के लिए मैंने ग्राम्य जीवन की अनेक कथा कहानियां पढ़ डाली। आज भी रोल स्वीकार करने से पहले मैं रोल को एक बार नहीं कई बार सुनती हूं और सैट पर जाने से पहले संवादों को बार-बार दोहराती हूं ताकि कैरेक्टर को साकार कर सकूं।

कामिनी कौशल जब दुबारा फिल्मों में आयीं तो उन्होंने सहज ही महसूस कर लिया कि वह फिल्मों के नये दौर की हीरोइन नहीं बन सकती। इसलिए नई परिस्थिति में अपने को ढालते हुए उन्होंने चारित्रिक भूमिकाओं की ओर अपना ध्यान केन्द्रित किया। चारित्रिक भूमिकाओं में भी जो अधिक जटिल होती है, कामिनी कौशल ने अपनी अभिनय प्रतिभा का जादू दिखाया। ‘पूरब पश्चिम’‘शहीद’जैसीफिल्मों में उन्होंने मां का जो प्रभावशाली अभिनय किया है, उसे कौन भुला सकता है? इस तरह ‘दो रास्ते’‘विश्वास’’अनहोनी’’अपने रंग हजार’ में उनके अभिनय का नया रूप निखर कर सामने आया है वह इस वक्त करीब दस फिल्मों में चारित्रिक भूमिकाएं कर रही हैं और फिल्मी दुनिया के फबती बाज लोग कहने लगे हैं कि कामिनी कौशल के चेहरे पर अब नया शबाब आया है जिसने प्रेमनाथ को घायल कर दिया है। लोग यह भी कहने लगे हैं कि वह उनके साथ छाया की तरह रहने लगी हैं। जितने मुंह उतनी बातें इस बारे में प्रेमनाथ भी खामोश हैं और कामिनी कौशल भी, प्रेमनाथ का केवल इतना ही कहना है कि उनके साथ मेरी ट्यूनिंग है,ट्यूनिंग,


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Mayapuri

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