मूवी रिव्यू: रिश्ता रिश्ता घायल है ‘कपूर एंड संस’

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रेटिंग***

करण जौहर द्धारा निर्मित फिल्म ‘कपूर एंड संस’ में निर्देशक शकुन बत्रा ने तीन पीढि़यों से घिरे कपूर परिवार के सदस्यों की अलग अलग परेशानियों को लेकर जो ताना बाना बुना हैं वो सराहनीय है।

कहानी

नब्बे वर्षीय रमेश कपूर (ऋषि कपूर) की एक ही अभिलाशा, कि मरने से पहले वो कपूर परिवार के साथ एक फैमिली फोटो खिंचवा कर एक सुबूत छोड़ जाये जिस पर लिखा हो कपूर एंड संस सिंस 1921 । उसके परिवार में दो बेटे हैं जिनमें से वे बडे़ बेटे हर्श कपूर (रजत कपूर) के साथ रहते हैं। इस परिवार में हर्ष की पत्नि रत्ना पाठक तथा दो बेटे राहुल कपूर ( फवाद खान) तथा अर्जुन कपूर(सिद्धार्थ मल्हौत्रा) हैं। जिनमें लंदन में रहता राहुल एक सफल उपन्यासकार है जबकि अर्जुन सफल नावल लिखने के लिये अमेरिका में संघर्ष कर रहा है। दादू को हार्टअटैक होने के बाद सारा परिवार जमा होता है डाक्टर दादू को बैंगलौर के अच्छी अस्पताल में दिखाने के लिये कहते हैं लेकिन हर्ष आर्थिक रूप से परेशान है। इस बात के अलावा छोटी छोटी बातों को लेकर घर में हमेशा झगड़ा फसाद रहता है। यही नहीं इस परिवार के सदस्य किसी न किसी बात को लेकर एक दूसरे से झगड़ते रहते हैं। जबकि दादू एक मस्त किस्म के जीव हैं। टीया मलिक (आलिया भट्ट) एक ऐसी लड़की हैं जिसके मां बाप उसकी तेरह साल की उम्र में ही उसका साथ छोड़ चुके हैं। इसलिये वो तब से अकेली है। अर्जुन और राहुल से उसकी मुलाकात होती है दरअसल वो मुबंई से यहां अपना बंगला किराये पर देने आई है। वो कपूर परिवार से मिलती है । दादू अपने दूसरे लड़के के परिवार को बुलाकर पूरे परिवार के साथ एक फोटो खिंचवाना चाहते है लेकिन दोनो ही इवेंट दादू के जन्म दिन पर इस परिवार का झगड़ा पार्टी का सत्यानाश कर देता है। इसके बाद एक एक करके सबकी परेशानियां बाहर निकल कर आती हैं ।

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निर्देशन

लेखक निर्देशक शकुन बत्रा ने इस बार एक ऐसे परिवार की संरचना की है जिसके हर सदस्य की अपनी समस्या है। बाहरी किरदार टीया भी समस्याग्रस्त है । यानि रिश्ता रिश्ता घायल है। इन सभी की समस्याओं को निर्देशक ने पूरी शाइस्तगी से सेल्यूलाइड पर कुछ इस तरह से उतारा है कि हर किरदार की सारी बातें पूरी तरह से उभर कर आती हैं। चाहे इमोशन हो या और कुछ, हर चीज को खबसूरती से उभारा है। फिल्म की फोटोग्राफी अच्छी है। कन्नूर की खूबसूरत वादियां कैमरे की आंखे से सुंदर दिखती हैं यानि शकुन एक बार फिर एक बेहतर फिल्म बनाने में पूरी तरह कामयाब हैं ।

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अभिनय

कास्टिंग फिल्म की जान है। सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपने किरदार की सारी भाव भंगिमाओं को प्रभावशाली ढंग से दर्शाया है। इसी प्रकार फवाद खान ने भी अपनी भूमिका को बहुत ही सहजता से निभा कर दिखाया है। रजत कपूर और रत्ना पाठक हर बार की तरह यहां भी अपनी भूमिकाओं में प्रभावी हैं। ऋषि कपूर को गौर से देखा जाये तो वे अपने भारी भरकम मेकअप में अभिनय करते हुये दबे दबे से दिखाई दिये हैं लेकिन उन्होंने अपनी भूमिका को बेहतरीन अभिव्यक्ति दी है। आलिया भट्ट ने एक बार फिर अपनी उम्र से बड़ी भूमिका को शानदार तरीके से जीकर दिखाया है ।

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संगीत

फिल्म में कई संगीतकार हैं। बोलना, बुद्धू सा मन, ओ साथी मेरे, लैट्स नाचों ठीक ठाक रहे लेकिन इनमें कर गई चिल, चार्ट पर सबसे ऊपर है ।

क्यों देखें

परिवार के साथ फिल्म देखने वाले दर्शकों को फिल्म काफी कुछ सिखाकर जाती है ।


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Mayapuri

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