मूवी रिव्यू: ‘साहसिक विषय पर बनी एक साधारण फिल्म’ फिल्म ‘खानदानी शफाखाना’

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फिल्मों के साथ साथ यहां दिखाई जाने वाली कॉमेडी का स्वरूप भी बदला है। इन दिनों अलग प्रकार की कहानियों में अलग तरह का हास्य दिखाया जाने लगा है, जिसे नैचुरल कॉमेडी भी कहा जा सकता है। ऐसे विषयों पर बनी विक्की डॉनर, पीकू, बधाई हो या लुका छुप्पी आदि फिल्में अपने विषय और हास्य के लिए खूब सराही जा चुकी हैं। इसी श्रृंखला में अब निर्देशिका शिल्पीदास गुप्ता ने  ‘खानदानी शफ़ाख़ाना’ जैसे बोल्ड विषय पर हास्य दिखाने की साधारण कोशिश की है।

कहानी

कुलभूषण खरबंदा बतौर होम्योपैथिक  हकीम, होशियारपुर जैसे एक छोटे से शहर में सेक्स खानदानी शफ़ाख़ाना चलाते हैं, जहां वे गुप्त रोगों का ईलाज करते हैं। मरने के बाद वे अपना क्लीनिक और जायदाद अपनी भांजी बॉबी बेदी यानि सोनाक्षी सिन्हा के नाम कर जाते हैं लेकिन साथ ही एक शर्त भी जोड़ जाते हैं। उनके वकील अनु कपूर के अनुसार अगर बॅाबी छः महीने तक सफलता पूर्वक क्लीनिक चलाते हुए, उनके मरीजां का इलाज करती है, तो इसके बाद चाहे तो वो सब कुछ बेच सकती है। बॉबी ये चेलेंज स्वीकार कर लेती है। दरअसल बॉबी पर उसकी मां यानि नादिरा जहीर बब्बर और निकक्मे भाई भूशित बेदी यानि वरूण शर्मा की जिम्मेदारी है। दूसरे उसकी मां ने उसके चाचा से उसकी शादी के लिए एक मोटी रकम उधार ली थी और जिसे चुकाने में वो परिवार असमर्थ है, लिहाजा चाचा उनका पुश्तैनी घर हड़पना चाहता है। अपने चाचा की रकम चुकाने के लिये वो सेक्स क्लीनिक चलाने का फैसला करती है,लेकिन छोटे शहर में एक लड़की द्धारा सेक्स पर इतने खुले शब्दों का प्रयोग जैसे शीघ्रपतन,स्तभंन तथा स्खलन जैसे गुप्त रोगों पर बोलते सुनते हैं तो उसे हेय् दृष्टी  से देखने लगते हैं, यहां तक उसकी मां भी उसे बदचलन समझने लगती है । यहां उसकी मदद करने वाला सिर्फ एक शख्स प्रियांश जोरा है जो उसके क्लीनिक के नीचे लेमन ब्वाय के नाम से सोडा वाटर का धंधा करता है। जब भी बॉबी हिम्मत हारने लगती है तो प्रियांश उसमें दोबारा से जोश भर देता है। क्या अंत में बॉबी अपने मिशन में सफल हो पाती है? ये फिल्म देखने के बाद पता चलेगा।

अवलोकन

हालांकि वूमन होते हुए और अपनी डेब्यू फिल्म में ही निर्देशिका के तौर पर शिल्पीदास गुप्ता ने सेक्स पर आधारित एक जटिल विषय चुना और उसे हास्य के तौर पर बनाने का बीड़ा उठाया। जहां वे एक हद तक ही सफल हो पाती हैं। दरअसल विषय इतना धीमा है कि बीच में कहानी के तार टूटते जुड़ते रहते हैं जिसकी वजह से किरदार भी धीमें लगने लगते हैं। दर्शक पूरी समय फिल्म से नहीं जुड़ पाता। पटकथा कितनी ही जगह लूज है, हां सिनेमाटोग्राफी के तहत एक छोटे से शहर को वास्तविकता प्रदान की है। संगीत की बात की जाये तो एक दो गाने ही ठीक ठाक बने हैं जैसे कोका, शहर की लड़की तथा सांस तो ले लें।

अभिनय

पूरी फिल्म सोनाक्षी सिन्हा के कंधों पर टिकी है जिसका वेट उसने सफलता पूर्वक उठाया, यानि उसने एक बेहद जटिल भूमिका को सहजता से निभाया, जो उसे एक परिपक्व अदाकारा के तौर पर स्थापित करती है। फिल्म से डेब्यू करने वाला प्रियांश जोरा काफी क्यूट लगा है, वो अपनी छोटी सी भूमिका में प्रभावित करता है। वरूण शर्मा अपने जाने पहचाने अंदाज में हंसाता नजर आता है, उसे अब कुछ नया करना चाहिए। रैप सिंगर बादशाह उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा काम कर गये। इनके अलावा कुलभूषण खरबंदा, नादिरा जहीर बब्बर, अनु कपूर और राजेश शर्मा की फिल्म में सशक्त उपस्थिति दिखाई दी।

क्यों देखें

हमारे यहां सेक्स  जैसे बोल्ड विषय पर कम ही फिल्में बनती हैं लिहाजा इस साहसिक विषय पर बनी लेकिन साधारण सी फिल्म एक बार देखी जा सकती है।

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