मूवी रिव्यू: पति पत्नी के पारंपरिक रिश्तों को बदलने की असफल कोशिश है फिल्म ‘की एंड का’

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रेटिंग**

सोचिये सदियों से पारंपरिक तरीके से चला आ रहा औरत और मर्द का रिश्ता बदल जाये तो क्या होगा, यानि औरत बाहर का काम संभाले और मर्द घर चलाये। इस बार आर बाल्कि ने अपनी फिल्म की एंड काके तहत ये सोच दिखाने की कोशिश की है लेकिन क्या ये सोच दर्शकों को हजम हो पाती है ?

कहानी

की यानि कीया यानि करीना कपूर और का यानि कबीर यानि अर्जुन कपूर एक फ्लाइट में मिलते हैं। बहुत जल्दी वे दोस्त बन जाते हैं और फिर पति पत्नी, लेकिन ये अन्य पति पत्नी के तरह नहीं हैं। यहां पत्नी बाहर काम करती है और मर्द घर का चूल्हा चक्की संभालता है। यहां तक कीया की मां स्वरूप संपत जो सोशल वर्कर हैं इतनी आधुनिक हैं कि वो भी इन संबन्धों को स्वीकार कर लेती हैं लेकिन कबीर के पिता रंजित कपूर जो दिल्ली के बहुत बड़े बिल्डर हैं भड़क उठते हैं और कबीर की मर्दानगी तक को ललकार जाते हैं। खैर दोनों के संबन्ध अच्छे चल रहे हैं इसी बीच कबीर की चर्चा टीवी चैनलों से होती हुई पत्र पत्रिकाओं तक पहुंच जाती है यहां तक अमिताभ बच्चन और जया बच्चन तक उससे प्रभावित हो उसे अपने यहां खाने पर बुलाते हैं। यानि कबीर घर बैठे सेलेब्रेटी बन जाता है लेकिन ये बात कीया को हजम नहीं हो पाती यानि उसे कबीर की लोकप्रियता से कहीं न कहीं जलन पैदा होने लगती है। इसके बाद वहीं पति का रूठ कर घर से निकल जाना और पत्नी को अपनी गलती का एहसास होते ही पति से माफी मांग कर उसे दोबारा घर ले आना।

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निर्देशन

चीनी कम, पा या शमिताभ जैसी फिल्मों के रचयिता बाल्की की फिल्मों में एक अलग सोच होती है जिसे वे बहुत साधारण तरीके से कह जाते हैं। इस बार उनकी सोच रही कि जो अब तक औरत मर्द के संबन्धों में होता आया है अगर उसे उलट दिया जाये तो क्या वो संबन्ध नहीं चल सकते। अभी तक पत्नी को गृह लक्ष्मी, गृहणी या हाउस वाइफ कहा जाता रहा है लेकिन उस भूमिका में अगर मर्द आ जाये तो उसे क्या नाम दिया जाये, क्योंकि अभी तक ऐसा कोई शब्द बना ही नहीं। लेकिन फिल्म में उसे हाउस हसबैंड कहा गया जो गले से नीचे नहीं उतरता। बाल्की ने इस बार ऐसा विषय उठाया है जो बरसों बरस से चली आ रही मान्यता को धत्ता बताने की कोशिश करता है। शायद इसीलिये दर्शक शुरू से अंत तक फिल्म से नहीं जुड़ पाता। फिल्म अपनी एक रफ्तार से चलती रहती है उसमें न तो गंभीरता है और न ही हास्य। फिल्म में पति का मंगलसूत्र पहनना अटपटा लगता है तथा पति पत्नी के बीच इतने ज्यादा अंतरंग दृश्य हैं जो अपनी हद पार कर देते हैं एक जगह तो करीना अपनी मां के सामने ही अर्जुन की गोद में बैठ चुम्मा चाटी करने लगती है। अब ऐसे पति पत्नी और उनके बीच ऐसी रिलेशनशिप देखकर दर्शक अपनी सीट से उठने से पहले तथा फिल्म में कुछ और भी कही गई बातों को नकारता हुआ सिनेमाघर से बाहर निकल जाता है। फिल्म की लोकेशन दिल्ली की है जिनमें सबसे ज्यादा ट्रेन और उसके आसपास की लोकेशंस का इस्तेमाल किया गया हैं जिनमें नवीनता है। फिल्म की फोटाग्राफी शानदार है।

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अभिनय

फिल्म में पहले दृश्य से ही करीना कपूर और अर्जुन कपूर की जोड़ी को नकार दिया जाता है। बेशक करीना एक परिपक्व अभिनेत्री हैं और उन्होंने एक कामकाजी महिला और बाद में उसके दंभ तथा फिर हताशा को भली भांती जीया है तथा फिल्म में बताया है कि वो अर्जुन से बड़ी है बावजूद इसके वो अर्जुन के साथ नहीं जम पाई। अर्जुन की तारीफ करनी पड़ेगी कि उसने एक अलग के रोल को सहजता से निभा दिया। करीना ने पूरी तन्मयता से किसिंग और अन्य अंतरंग सीन किये हैं। बेशक उन दृश्यों पर सैफ अली खान तक को एतराज हो सकता है। एक अरसे बाद स्वरूप संपत को देखना भला लगता है। रंजित कपूर ने भी अपनी भूमिका को बढ़िया तरह से निभाया है। अमिताभ बच्चन और जया बच्चन अपने ही रोल में थोड़े वक्त के लिये दिखाई देते हैं।

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संगीत

फिल्म में मीत ब्रदर्स, इलिया राजा तथा मिथुन का संगीत है, लेकिन हनी सिंह द्वारा गाया गीत हाई हिल तथा मिथुन का जी हुजूरी ठीक ठाक है वरना फिल्म का संगीत भी साधारण ही है।

क्यों देखें

पति पत्नी के पारंपरिक रिश्तों के बदले हुये रूप में देखना चाहते हैं तो फिल्म जरूर देखें ।

 


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Mayapuri

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