सच्ची कला की खोज में ललिता पवार

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Lalita_Pawar_(1916—1998)

मायापुरी अंक 51,1975

मैं कई दिनों से यह सोच रहा था कि किसी ऐसे फिल्म कलाकार से मिला जाये, जिससे मिल कर आत्मीय सुख मिलें। पाठकों को पढ़ने की ऐसी सामग्री मिले, जो बिल्कुल ही अछूती हो।

इसी उधेड़बुन में एक दिन मैं आर.के. स्टूडियो जा पहुंचा। स्टूडियो में मेरी एन्ट्री के साथ ही मुझे ललिता पवार दिखायी दी। मैं तुरंत भागा भागा उनके पास पहुंचा। खिल खिला कर हंसते हुए ललिता पवार ने कहा,

‘वेड़ा रे वेड़ा, मेरा इंटरव्यू लेकर क्या करोगे? (वेड़ा का मतलब होता है पागल)

आज मैं आपको नहीं छोड़ूंगा। चाहे आप लाख बहाने करें।

मुस्कुराते हुए वे बोली।

आओ उधर लान में बैठते हैं।

हम दोनों आर.के. स्टूडियो के लान में जाकर बैठ गये, ललिता जी ने कुर्सियां मंगवा ली थी। ललिता पवार कुर्सी पर पसर कर बैठ गईं। तो मैंने पूछा,

आपको इस लाइन में कितने साल हुए होंगे?

लगभग पचास साल, शायद दो तीन साल कम हो।

अरे बाप रे बरबस मेरे मुंह से निकल गया, मैंने कहा, आज आपकी जो इच्छा हो, अपने मन के भेद खोल दीजिए?

हां, कभी-कभी मेरी भी यही इच्छा होती है कि अपने मन का भेद खोलू, लेकिन पत्रकार छोकरियों के पीछे भागते हैं, मुझ बुढ़िया में क्या रखा है?

मैंने कहा,

कैसी बातें करती हैं आप, आप में तो मैं अपनी मां का स्पष्ट रूप देख रहा हूं।

मुझे भावनाओं में बहाने की कोशिश मत करो। हम सब अपने कर्तव्य पर मर मिटते हैं, जिस तरह आपका साथी आपका कलम है, उसी तरह मेरा जीवन साथी मेरी कला है।

ललिता पवार ने आगे बताया,

जिस तरह लोग सारी दुनिया को भुलाकार अपने कर्तव्य पर निगाह रखते हैं और अपने कर्तव्य पर मर मिटने को तैयार रहते हैं, उसी तरह मैं भी अपनी कला के लिये जी रही हूं,

ये चर्चे, ये मोहब्बत, ये आलम कहां खुदा जाने कल तुम कहा, हम कहां?

जिन दिनों आपने फिल्मों में प्रवेश किया होगा, उन दिनों फिल्म-अभिनेत्रियों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था?

बिल्कुल सही कह रहे हैं आप, उन दिनों कुछ लोगों को फिल्मों में काम जैसे मेकअप करना और पाउडर लगाना तक बुरा लगता था। वे इसे अच्छा नहीं समझते थे और मुझे उस वक्त तो बहुत ही दुख होता था, जब कोई मुझसे पूछता कि मैंने मुंह पर चूना क्यों मला हुआ है? क्या जवाब देती?

मेरे लिये कला ही मेरा जीवन है, भगवान है मैं कभी भी किसी चीज को बुरी निगाह से नही देखती हूं और यही चाहती हूं कि यह दुनिया संसार की हर चीज को अच्छी निगाह से देखें क्योंकि किसी चीज या किसी के बारे में बुरा सोचना सबसे बुरी बात है इंसान संसार में रह कर संसारी बने, तभी भगवान को पा सकता है।

आप की उम्र क्या होगी?

अक्सर कई लोग यही सवाल पूछते हैं। इस सवाल का मेरे पास एक ही जवाब है और यह है कि मैं अलग-अलग रोल में अलग-अलग उम्र का मेकअप करती हूं यानि कभी पैंसठ साल की, तो दूसरे दिन घटकर तीस साल की और फिर कभी पचास साल में आ जाती हूं, जिस वक्त मैं जिस उम्र के मेकअप में रहती हूं, वही अपनी उम्र समझती हूं, क्योंकि उस दिन मेरी अपनी उम्र तो गिनी नहीं जाती। दरअसल कला के विस्तृत जगत में हम बच्चे ही तो हैं। बस न जाने किस खोज में लगे रहते हैं। कला की देवी से कलाकार सदा कुछ पाना चाहात है, उम्र में चारे छोटा हो या बड़ा, क्योंकि मेरे विचार से कलाकार बच्चा नहीं होता, जवान नहीं होता, बूढ़ा नहीं होता। कलाकार तो, सिर्फ कलाकार होता है यानि सदाबहार होता है और जीवन? तो एक यात्रा है, सफर है। जिसकी जहां पर मंजिल आ गई वही रूक गया और वही उसकी उम्र हो गई

इतने वर्षो में फिल्म जगत में आप ने क्या परिवर्तन पाया?

मैं जब आठ वर्ष की थी, तब से फिल्मों में काम कर रहा हूं। जैसे जैसे जमाना तरक्की करता गया, हमारी फिल्मी दुनिया ने भी तरक्की की। बड़े-बड़े सेट लगाये जाने लगे हैं। डायरेक्शन की नयी-नयी तरकीब सामने आई और आजकल तो रंगीन फिल्मों की बहारें आयी हुई है। उसमें भी नये-नये प्रयोग होते हैं। नयी-नयी टैकनिक अपनाई जाती हैं, लेकिन एक फर्क यह हुआ है कि अब हम कलाकारों को उतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती है जितनी पहले करनी पड़ती थी। इसीलिए मैं कहूंगी कि हमने तकनीक में तरक्की की है। ग्लैमर यानि दिखावा बहुत बढ़ गया है। कहानी पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना कि पहले दिया जाता था। हो सकता है यह आजकल की मशीनरी एज का असर हो बहरहाल फिल्मी दुनिया के अंधेरे-उजाले पक्ष ने अनगिनत रंग बदले।

आपको अपनी भूमिकाओं में से कौन-सी सर्वश्रेष्ठ लगती हैं?

अगर एक मां से दस बच्चे हों और कोई उससे पूछे कि तुम्हें अपने दस बच्चों में कौन-सा ज्यादा प्यारा है तो वब क्या जवाब देंगी? बस इसी तरह सैकड़ो फिल्मों में मैंने तरह तरह के रोल किये हैं और हर एक रोल को मैंने अपने बेटे की तरह प्यार किया है। और अगर उस मां के दस बेटों में कोई आवारा निकल जाये तो वह सबसे ज्यादा उसी के लिये रोयेगी। इसी तरह अगर कोई ऐसी फिल्म फेल हो जाती है, जिसमें मेरा रोल हो तो मेरा भी मन उस मां की तरह रोता है। फिल्मों में काम करने का शौक और लगन आज भी वही है।

मैंने इंटरव्यू को और अधिक रोचक बनाने के लिये ललिता पवार से पूछा,

अपने जीवन की दो-दो रोचक घटनाएं सुनाइये न?

ललिता पवार ने बताय,

काफी वर्षो पहले की बात है स्वर्गीय रामगणेश (महाराष्ट्र की महत्वपूर्ण हस्ती) की पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में एक समारोह मनाया जा रहा था। मैं भी उस प्रोग्राम में मौजूद थी। पहले एक डांस हुआ, फिर एक प्रसिद्ध गायिका ने कलाकारों को इनाम दिये। इसके बाद एक छोटी-सी लड़की गाने के लिये बैठी। उसकी आवाज ने लोगों के दिलों में घर कर लिया। मैं खुद अपने आपको भूल गई। मुझे सिर्फ वह लड़की और उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। सामने बैठे लोग मेरी आंखो से ओझल हो गये, तभी मुझे गुस्सा आया कि इस लड़की के इतना अच्छा गाने पर भी ईनाम क्यों नहीं दिया?

जब कि मामूली से डांस पर एक गायिका ने इनाम दिया। तुरंत जोश में उछल कर मैंने कहा, इस लड़की को मेरी तरफ से एक सोने का मैडल इनाम में दिया जाये, लेकिन तुरंत मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों से टकराई तो मुझे होश आया कि मैं यहां कहां मैडल लेकर आयी हूं लोग न जाने क्या सोचेंगे, और चुपचाप मैं अपनी जगह पर बैठ गई। बाद मैं मैंने सोने के कर्णसूत्र बनवाये और कोल्हापुर जाकर उस लड़की को दिये। जानते हैं वह लड़की कौन थी?

वह है आज की जनप्रिय गायिका लता मंगेशकर, और लता आज भी मेरे करीब हैं। मेरी दोस्त हैं और सिर्फ मेरी हैं।

ललिता पवार के पास फिल्मी अनुभवों की कमी नहीं है, इसलिए मैंने उनसे प्रार्थना की, एक किस्सा और सुनाइये।

ललिता पवार ने मेरी बात मानते हुए कहा,

बरसों पहले एक बार ऋषिकेश मुखर्जी मेरे पास आये और कहने लगे, मुझे आपसे एक फिल्म में काम लेना है, आप क्या लेंगी। मैंने कहा, एक पैसा, वे चौंके, अब यह भी बता दीजिए कि वह पैसा सोने का होगा या किसी और चीज का बनवाऊं? मैने कहा,

ऋषि दा, एक पैसे का मतलब है एक पैसा, वही अपना सरकारी पैसा बात खत्म हो गई और मैंने उस फिल्म में काम किया और मेरे उनसे बहुत अच्छे संबध हो गये। फिर एक दिन मैंने उनसे कहा, ऋषि दा, मैं एक फिल्म बना रही हूं, आपको डायरेक्शन करना होगा, आप क्या लेंगे? फौरन उन्होंने कहा, हमारा तो कॉन्ट्रैक्ट हो चुका है, वही एक पैसा और फिर हम दोनों को हंसी आ गई।

आपने अभी तक शादी नहीं की आखिरी दिनों के लिये कुछ….

ललिता पवार मेरी बात बीच में काटकर बोली इससे क्या होता है। आमतौर पर लोगों को अपने आखिरी दिनों की बड़ी फिक्र होती है, बाल बच्चों को पढ़ा कर उनका जीवन सजाते हैं, इसलिये कि आखिरी वक्त में काम आयेंगे। दोस्ती यारी बढ़ाते है कि आखिरी दिनों में काम आयेंगे बहुत से लोग मुझे भी सलाह देते हैं, ललिता जी, आप भी आखिरी वक्त के लिये कुछ करिये कि आपका नाम चले, लोग आपके काम आयें और ये ठीक भी है, मेरा कोई बेटे-बेटी तो है नहीं और न ही कभी चाहा कि ऐसा हो, क्योंकि अपना जीवन तो कला को समर्पित है। मेरा कहना है कि सब लोग अपना नाम छोड़ जाते हैं, लेकिन मैं अपना नाम अपने साथ ले जाऊंगी। मैंने बताया न कि बचपन से ही मेरा ध्यान फिल्मों में रहा है। इसी वजह से पढ़ाई हो न सकी, मेरे पास किसी भी स्कूल का सर्टिफिकेट नहीं है। लेकिन मैंने जो कुछ पढ़ा, सब फिल्मों फिल्मों में ही पढ़ा भाषा के हिसाब से मुझे हिंदी, उर्दू, गुजराती, मराठी पढ़ना-लिखना और बोलना आया। लेकिन इनके अलावा भी बहुत-सी भाषायें हैं, जिनमें मैं हंसी मजाक कर सकती हूं, जैसे बरसों पहले का किस्सा मुझे याद आ रहा है, मैं और सुचित्रा सेन शूटिंग कर रहे थे। मेरा कैरेक्टर एक पागल औरत का था। पंखे बहुत जोर से चल रहे थे। मेरे बालों में लगा हुआ सफेद पाउडर उड़ रहा था तो मैंने छतरी लगा ली। यह देखकर डांस डायरेक्टर हीरा लाल ने कहा, एनना गढ़ाई बरदू… मैंने खट से जवाब दिया, इल्ले कात बरदू तमिल जबान मे मेरा जवाब सुन कर हीरा लाल को बड़ा ताज्जुब हुआ तो मैंने कहा, भाई, ऐसे छोटे मोटे मज़ाक तो मैं और भी कई भाषाओं में कर सकती हूं।

ललिता जी, अब आखिर में आप जो कहना चाहती है कहिये?

एक बात में अवश्य बताऊंगी शुरू-शुरू में जब बोलने वाली फिल्में चली तो गाना या डायलॉग शूटिंग के साथ ही रिकॉर्ड होता था। आज की तरह प्लेबेक सिस्टम नहीं था। मुझे अच्छी तरह याद है कि मुंबई में जो पहला गाना रिकॉर्ड हुआ था, उसे मैंने गाया था। ललिता पवार ने आगे बताया, अवसर मुझे फिल्मों की आउटडोर शूटिंग के लिए मुझे अलग अलग शहरों में जाना पड़ता है, तो लोग मुझसे एक ही बात पूछते हैं कि आपको यह जगह कैसी लगी? तब मैं उनका जवाब नहीं दे पाती, क्योंकि फिल्मों में काम करते-करते इतने सीन और असली-नकली सेट सामने से गुज़र चुके हैं कि अब मुझे सभी जगह एक सेट-सी लगती है। एक बात यह भी है कि ये सारी दुनिया एक सेट ही तो है उसमें रहने वाले लोग अपना-अपना रोल अदा करके चले जाते हैं। आप खुद ही सोचिये एक तरफ यीशु मसीह, महात्मा बुद्ध, हजरत मोहम्मद, गुरू नानक और महात्मा गांधी ने भाईचारे का सबक सिखाया, तो दूसरी तरफ चंगेज खां और नादिर शाह जैसों ने अपने जुर्म के डंके बजवाये। सती अनसुइया ने नारी जीवन की महत्ता बतायी और मीरा बाई ने मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरा न कोय कह कर सच्चे प्रेम का प्रदर्शन किया ये। सब महान आत्मायें इस दुनिया के सेट पर अपना अपना रोल अदा करके चली गई। मुझे कबीर दास का कथन याद आता है कि ‘जस काशी तस मगहर ऊसर’ तो फिर मैं कैसे कह दूं यह जगह अच्छी है और वह जगह बुरी। और अब मैं जा रही हूं, नमस्ते।

और इस अनोखे इंटरव्यू के बाद आत्मीय सुख का अनुभव करते हैं मैं भी घर लौट आया।


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Mayapuri

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