अलविदा कर गये सदा के लिए – जयंत

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मायापुरी अंक 41,1975

2 जून शाम को छ: बजे काली घटायें मंडरा रही थी, तूफान आने की शंका थी। अचानक वह तूफान तो आते आते टल गया पर तेज हवा के झोंके से टाटा मेमोरियल अस्पताल की खिड़कियां खड़खड़ा उठीं और उस तेज हवा के झोंके के साथा ही अपने समय के ओजेस्वी कलाकार जयंत ने सदा के लिए खुदा हाफिज़ कर आंखे बंद कर ली।

ऐसा लगा जैसे एक तूफान ने दूसरे तूफान को गले लगा लिया हो। ऐसा लगा जैसे एक तेज हवा का झोंका दूसरे झोंके के साथ मिल गया हो।

जयंत कुछ ही दिनों पहले अपने गले के कैंसर के इलाज के लिए टाटा मेमोरियल अस्पताल में भर्ती हुए थे। पहला ऑपरेशन हो चुका था पर कैंसर की जड़े साफ नही हुई। उनकी आवाज़ चली गयी थी। फिर भी वे सम्पूर्ण आत्मबल के साथ मृत्यु से लड़ रहे थे। जयंत जिंदादिल इंसान थे इसलिए आवाज़ खोने के बाद भी यह जानते हुए भी कि उनके गले का कैंसर उनकी मौत को निकट ला रहा है, वे सदा मुस्कुराते रहे और मुस्कुराते हुए हो उन्होनें अपने हाथों को ऊपर उठा कर अलविदा कहा।

जब मैंने जयंत की मृत्यु का सामाचार सुना तो लगा जैसे उदास खामोशी का ऐसा बवण्डर उठा है कि चारों ओर सिवाय खामोशी के कुछ भी न रहा। और फिर उस खामोशी के बवण्डर में धीरे-धीरे कुछ स्पन्दन हुआ और सामने दिखाई पड़े जयंत। पर वे आज के जयंत नही, कल जयंत थे क्या व्यक्तित्व था उनका। लम्बा, तगड़ा, पठानी जिस्म, आंखो में सुलगते अंगारे, हाथी जैसी चाल, शेर जैसी गरज, स्नायुओं में चीते की सी फुर्ती। जब वे आंखो से घूर कर देखते थे तो लगता था सामने खड़े व्यक्ति के लिए कयामत आ गयी है। जब वे अपने पठानी जिस्म के प्रभुत्व के साथ, अपने खास अंदाज मैं संवाद बोलते थे तो दर्शकों को लगता था जैसे उनके बोल के साथ निकलने वाली आग उनकी कुर्सी तक आ पहुंची। उनके भीतर अभिनय का दरिया था। इसी कारण वे सन 1933 से लेकर 1970 तक, 100 से भी अधिक फिल्मों में विभिन्न चरित्रों को सफलता के साथ पेश करते रहे और जब तक उनकी आवाद बंद नही हुई वे फिल्मों में अपनी विशिष्ट ओजोस्विता का झंडा फहराते रहे।

अभिनेता जयंत का उदय एक्स्ट्रा के रूप में हुआ था। तीन चार फिल्मों में एकस्ट्रा बनने के बाद ही वे अपनी मौलिक प्रतिभा के कारण फिल्मों में हीरो बन गये, हीरो से खलनायक बने। और बदलते हुए समय के साथ बदलते हुए वे चरित्र अभिनेता बने। जिस तरह अशोक कुमार और प्राण अपने ढंग के अकेले कलाकार हैं, उसी तरह जयंत भी अपने ढंग के अकेले कलाकार थे। इसी कारण जयंत हमेशा जयंत ही बने रहे। और अब तक उनका स्थान लेने के लिए दूसरा जयंत पैदा नही हुआ। इस वक्त उनके दो लड़के अमज़द और इम्तियाज भी अभिनय के मैदान में आ चुके हैं, पर क्या वे अपने पिता के रिक्त स्थान की पूर्ति कर सकेंगे? यह तो आगे आने वाला समय ही बतायेगा।

जयंत की सबसे पहली फिल्म थी “लेदरफेस उर्फ बदमाश का बेटा” जिसका निर्माण रॉयल फिल्म कंपनी के अंतर्गत शांति दवे के निर्देशन में सन 1933 में हुआ था। यह मूक फिल्म थी। इसके बाद फिल्म निर्माण संस्था प्रकाश पिक्चर्स के स्थायी कलाकार बने और वे इस निर्माण संस्था के साथ कई वर्षो तक संबधित रहे।

जयंत नये जमाने के अनुसार फ्री लांस भी हुए। फ्री लांस होते ही फिल्मी दुनिया में कुछ हड़बड़ी हुई और कुछ कलाकारों ने चुपके-चुपके उनका विरोध भी शुरू कर दिया। एक संक्षिप्त भेंट के दौरान पुराने और नये समय की चर्चा करते हुए जयंत ने बड़ी ईमानदारी से कहा था आज कल के कलाकार जानते हैं कि अधिक से अधिक धन कैसे कमाया जाय और किस तरह बचत की जाय ताकि काम न होने की स्थिति में और बुढ़ापे में या बीमारी में किसी तरह का अभाव न हो। पर हम लोग इस बारे में एक तरह से अनपढ़ ही रहे। उन दिनों आय कम थी पर ऐशो आराम आज की तुलना में ज्यादा था। उन दिनों कहा जाता था कि मोटरकार पेट्रोल से कम पर जवानी के जोश से ज्यादा चलती है।“

और आज जब जयंत नही रहे तो मुझें उन्हीं बातों की याद आ रही है। वे बड़ी ईमानदारी से बताते अगर उनके मन के भीतर जो कुछ होता और उसे साफ-साफ बता दिया करते थे और इसी वजह से कुछ लोगउनकी पीठ पीछे कहा करते थे “यार बड़ा मुंहफट है। सब कुछ कह डालता है।“

प्रकाश पिक्चर्स से संबधित होने के पहले जयंत ने सन 1934 में ‘नूर महल’ और ‘नूरे इस्लाम’ में महत्वपूर्ण भूमिकाएं की थी। प्रकाश पिक्चर्स कृत ‘मुंबई’ की सेठानी में वे गुलाब के साथ हीरो बने जिसके निर्देशक थे रसिक भट्ट यह फिल्म इतनी लोकप्रिय हुई कि जयंत की गणना उस समय के चोटी के कलाकारों में होने लगी। यह आश्चर्य की बात थी कि एक्स्ट्रा के रूप में कार्य करते हुए जयंत कुछ ही दिनो में प्रकाश पिक्चर्स जैसी निर्माण संस्था के हीरो बन गये। उस फिल्म कंपनी की प्राय: सभी रहस्य रोमांच से भरी थ्रीलिंग फिल्मों में जयंत ने रोमांचकारी भूमिकाएं कर आम दर्शकों का दिल जीत लिया था। ‘ख्वाब की दुनिया’‘स्टेट एक्सप्रेस’ आदि में जयंत ने लाजवाब भूमिकाएं कर दर्शकों का दिल जीत लिया था।

यदि जयंत की सभी उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण फिल्मों की तालिका बनायी जाय तो एक छोटी सी पुस्तिका तैयार हो जायेगी। कुछ उल्लेखनीय फिल्मे हैं ईगल फिल्म्स कृत ‘उजाला’ एस. बनर्जी की’’जिंदगी और ख्वाब’’ मुकुल पिक्चर्स कृत ‘शेरखान’ एल.वी प्रसाद की “बेटी बेटे” सुबोध मुखर्जी की “अप्रैल फूल” के. अमर नाथ का “इशारा” जैमिनी की ‘जैमिनी की जिंदगी’ ‘चांद को’ ‘शेर दिल’ आर. एम. आर्ट प्रोडक्शन्स की ‘ठाकुर जरनेल सिंह’ बाबू भाई मिस्त्री की ‘सरदार’ (महेश कौल की सपनों का सौदागर बिमल राय की मधुमती एच.एस. खेल की ‘संघर्ष’ राजखोसला की ‘दो रास्ते’ एस. मुखर्जी की ‘लीडर’ आज दर्शक इन फिल्मों को याद करते हैं कि तो उनके सामने जयंत की विभिन्न भूमिकाएं साकार हो उठती हैं।

जयंत स्वभाव में भी अपनी भूमिकाओं की तरह तेज थे। जो बात पसन्द नही आती तो फौरन ही उस बात को ठुकरा देते उन्हें इस बात की चिंता नही थी कि सामने कौन है?

हम तो अंत में नही कहेंगे कि जयंत को जीवन में कुछ गहरी चोटें लगी थी और वे मन ही मन इतने घायल हुए कि वह घाव भीतर भीतर रिसता रहा जिसके दर्द को भुलाने के लिए उन्होनें जिस नशीली जिंदगी का रास्ता अपनाया उससे वह दर्द और भी अधिक कसने लगा और जयंत की जिंदगी छटपटाने लगी। उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खूबसूरती उनकी आवाज़ थी और वही आवाज़ बंद हो गयी।

जयंत अपनी जिंदगी के कटु अनुभवों के बारे में दुनिया को बहुत कुछ बताना चाहते थे। पर जब आवाज़ ही चली गयी तो किसको क्या बताते?

उनका सारा दर्द मन ही मन घुटता रहा और वे शेष जिंदगी भर 2 जून शाम को छ:बजे तक अपने बिस्तर पर पड़े पड़े दर्द से जमी हुई खामोशी से दुनिया को देखते रहे और इसके बाद आखिरी अलविदा की।


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Mayapuri

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