मुझे किसी माध्यम से एलर्जी नहीं हैं.’’ अरूणा इरानी

1 min


3

अरूणा इरानी उन चंद कलाकारों में से हैं,जो कि पिछले 12-15 वर्षों से लगातार छोटे परदे पर अपनी मौजूदगी को बरकरार रखे हुए हैं। इतना ही नहीं वह शुरू से ही छोटे परदे पर निर्माता व अभिनेत्री दोनो ही रूपों में मौजूद हैं। उनका दावा है कि उन्होंने कभी भी छोटे परदे को छोटा नहीं माना। बहरहाल, इन दिनों वह सोनी पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘देखा एक ख्वाब’ में राजमाता मृणालिनी के किरदार में नजर आ रही हैं।
॰ सीरियल ‘देखा एक ख्वाब’ से जुड़कर कैसा महसूस कर रही हैं ?
– ‘देखा एक ख्वाब’ मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इस किरदार को निभाना मेरे लिए एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी हैं। जब पहली बार ‘कौन बनेगा करोड़पति’ प्रसारित हुआ था, तो इसके बंद होने के बाद उसी टाइम स्लॉट पर मेरे द्वारा निर्मित सीरियल ‘देश में निकला होगा चाँद’ प्रसारित होना शुरू हुआ था। उस वक्त मेरे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ने चैनल को जो टीआरपी दिलायी हैं, कम से कम उसके समकक्ष मुझे अपने सीरियल ‘देष में निकला होगा चाँद’ को भी ले जाना है। आज लगभग 12-13 साल बाद एक बार फिर मेरे सामने वही चुनौती है। इस बार फिर ‘केबीसी सीजन पांच’ के खत्म होने के बाद उसी टाइम स्लॉट पर सीरियल ‘देखा एक ख्वाब’ प्रसारित हो रहा है, जिसमें मैं राजमाता का एक अहम किरदार निभा रही हूँ। तो इस बार भी चुनौती है। पर मुझे उम्मीद है कि मैं दर्शकों की पसंद पर खरी उतरूंगी।
॰ अपने किरदार पर कुछ विस्तार से रोशनी डालेंगी?
– मैं अपने किरदार को लेकर बहुत उत्साहित हूँ। यह एक राजघराने की राज माता है, जिसका नाम मृणालनी हैं। यह बहुत ही ष्रूड हैं। पर खलनायिका नहीं है। वह डिग्निटी को बनाए रखा चाहती हैं। परिवार व राज घराने की मर्यादा को बरकरार रखने के लिए वह कुछ कठोर कदम तो उठाती हैं, पर बहुत ही ज्यादा इमोशनल हैं।
यूँ तो लोग धीरे-धीरे राजमाता मृणालिनी से परिचित हो ही रहे हैं। राजघराने में जन्मी तथा राजकुमारी से राजमाता बनने वाली मृणालिनी देवी अपने देश की पहली औरत हैं, जिन्हें लंदन के इटैन में पढ़ने का मौका मिला। कम समय में वह एक बेहतरीन पर्सनलटी बन गयी। बाद में उसकी मुलाकात एक युवा महाराजा से हुई, जिससे उन्होंने शादी की और उनके राज देवगढ़ की महारानी बन गयी, जिससे उन्हें दो बच्चे हुए ब्रजराज और मेनका। बचपन में ही घुड़सवारी के दौरान मेनका का एक एक्सीडेंट में एक पैर अपाहिज हो जाता है और आगे की जिंदगी उसे ऐसे ही बितानी पड़ती हैं। मेनका की शादी भोपाल के एक राजपूत से हो जाती है। कुछ समय बाद पोती विश्वनंदिनी का अपहरण हो जाने पर राजमाता बुरी तरह से टूट जाती है। पर अपने परिवार को टूटने, डगमगाने व युद्ध से भी बचाने के लिए वह दिल पर पत्थर रख लेती है। राजमाता पूरी तरह से अपने राज्य का ध्यान रखने लगती है। उनके नाम से तमाम चैरिटी खुली। तमाम डिजाइनर व ज्वैलर उससे बहुत ही ज़्यादा प्रभावित हुए और 50 साल की उम्र में वह एक फैशन आयकॉन बन गयी। राजघराना लोगों के लिए एक प्रेरणास्रोत बन गया। राजमाता को पूरा यकीन है कि एक दिन वह अपनी बिछड़ी हुई पोती को वापस पा सकेंगी और उसे अपनी राजकुमारी बना पाएंगी।
॰ लगता हैं आपके लिए अंग्रेजी का अक्षर ‘डी’ कुछ ज़्यादा ही लक्की हैं?
– लगता है आपका इषारा सीरियलों के नामों को लेकर हैं। पहले वाले सीरियल का नाम ‘देश में निकला होगा चांद’ था, तो अब इस सीरियल का नाम ‘देखा एक ख्वाब’ है। मैं तो चाहती हूं कि आपकी बात सच निकले। ‘देखा एक ख्वाब’ भी सफलता की बुलंदियों पर पहुंच जाए।
॰ पिछले बारह सालों में आपने टीवी पर काफी बदलाव देखे होंगे। क्या कहना चाहेंगी?
– यह सच है कि जब टीवी माध्यम की शुरूआत हुई थी, लगभग तभी से मैं इसके साथ जुड़ी हुई हूँ। मुझे इससे जुड़े हुए लगभग 15 साल हो गए हैं। इस दौरान कई तरह के बदलाव आए। लोगों ने अलग-अलग दौर में अलग-अलग नाम भी दे दिए। कभी कहा गया कि यह कॉमेडी सीरियलों का दौर है, तो कभी कहा गया कि अब ‘सास बहू’ सीरियलों का दौर है। टीवी पर चाहे जो बदलाव आए हों, पर मैंने टीवी को बढ़ते हुए ही देखा है। एक जमाने में सिर्फ मनोरंजन प्रधान कार्यक्रम ही प्रसारित होते थे, बाद में गेम शो व रियालिटी शो भी प्रसारित होने लगे। यह सच है कि रियालिटी शो का फंडा आज भी मेरी समझ से बाहर है। सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि टीवी के रियालिटी षो में कभी भी मुझे वास्तविकता नजर ही नहीं आयी। इसलिए मैं हमेशा सीरियलों में अभिनय करना ज़्यादा पसंद करती हूँ।
॰ आपको लगता है कि अब टीवी का माध्यम इतना बड़ा हो गया है कि वह फिल्मों के लिए चुनौती बन चुका हैं?
– टीवी कभी भी छोटा था ही नहीं। फिल्मों की टीवी लोगों तक बड़ी आसानी से पहुंचता है। आप गाँवों या कस्बों में चले जाएं, तो वहां भी आपको दूरदर्शन देखते हुए लोग नजर आ जाएंगे। इसके अलावा टीवी पर पैसा भी फिल्मों की कहीं ज़्यादा मिल रहा हैं। तभी तो फिल्मों के ‘ए’ ग्रेड कलाकार भी टीवी पर किसी न किसी रूप में नजर आने लगे हैं। यदि यही हालात रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब टीवी फिल्मों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा। इसके बावजूद पता नहीं क्यों लोग टीवी को छोटा परदा कहते हैं? मैंने तो कभी भी इसे छोटा माना ही नहीं और जब दूसरे फिल्म कलाकार इससे दूर भागना चाहते थे, तब भी मैंने टीवी के कार्यक्रमों में अभिनय किया व कार्यक्रम बनाए।
॰ तो क्या आप फिल्में नहीं करना चाहती?
– मुझे किसी माध्यम से एलर्जी नहीं हैं। लेकिन किसी फिल्म में महज तीन चार सीन करने की बनिस्बत सीरियल में महत्वपूर्ण किरदार निभाना ज़्यादा अहमियत रखता हैं। वैसे मैं देख रही हूँ कि तमाम अभिनेत्रियां फिल्मों में तीन चार सीन व आइटम साँग करके ही खुश हैं। पर यह उनका काम करने का नजरिया हो सकता हैं, मेरा नहीं।

SHARE

Mayapuri