असरानी की मेहनत और लगन की सच्ची कहानी!

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Asrani

फिल्मउद्योग में भाग्यवाद का स्थान सर्वोपरि माना जाता है, हर आदमी यहां किस्मत के खेल में विश्वास करता है, हर आदमी यहां ग्रह और नक्षत्रों के चक्कर में पड़ा है।

और यही कारण है कि साधूओं और सन्यासियों के लिए फिल्मी उद्योग ऐसी भूमि है जहां वे बड़े मजे से दूसरों को बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं

जानकीदास

यह लेख दिनांक 4-12-1977 मायापुरी के पुराने अंक 168 से लिया गया है!

असरानी ने पांच वर्ष की मासूम उम्र में ही अपने एक पड़ोसी के घर नौकरी कर ली

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फिल्म उद्योग में इस भाग्यवाद ने कर्मवाद को पछाड़ रखा है लेकिन वास्तविकता यह है कि संसार में भाग्य से बड़ी चीज कर्म है, कर्म करने के बाद फल प्राप्त होंगे।

जो लोग भाग्यवादी हैं वे बहुत लंबे समय तक सफल नहीं होते लेकिन कर्मवाद में विश्वास करने वाले लोग सही मायने में सफलता की सर्वोच्च ऊंचाई प्राप्त करते हैं।

कर्मवाद के दर्शन में विश्वास करने के कारण फिल् अभिनेता असरानी को जो सफलता प्राप्त हुई है, वह दूसरों के सामने उदाहरण के रुप में पेश किया जा सकता है।

असरानी ने अपने फिल्म करियर की शुरुआत छोटीछोटी भूमिकाओं से की और आज वह (फिल्मउद्योग में केवल प्रथम श्रेणी का हास्यअभिनेता हैं बल्कि अब वहचला मुरारी हीरो बननेके प्रदर्शन के साथ ही निर्देशको की जमायत में भी खड़ा हो जाएगा।

सफलता की इस ऊंचाई को प्राप्त करने के लिए असरानी ने कितने पापड़ बेले हैं, इसे बहुत कम लोग जानते हैं, असरानी आज जहां पहुंचा है वहां तक आने के लिए वह किन मुश्किल राहों से गुजरा है, इसकी कहानी सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

असरानी का जन्म जयपुर में एक समृद्ध घर में हुआ था, और उसके पिता सिल्क के व्यवसायी थे, अचानक एक दिन दुकान में आग लग गई और इससे लाखों का घाटा हुआ, इस विपत्ति के आने से असरानी के घर की हालत बहुत नाजुक हो गई।

असरानी के पिता स्वभाव से आत्म अभिमानी थे और इसीलिए इस संकट में भी दूसरों के सामने दया के लिए हाथ नहीं फैलाया, घर का हर सदस्य अपनेअपने तरीके से इस संकट से लड़ने के लिए तैयार हो गया।

असरानी ने पांच वर्ष की मासूम उम्र में ही अपने एक पड़ोसी के घर नौकरी कर ली! कहते हैंबचपन खाने खेलने और लोरियां सुनकर सोने के लिए होता है, लेकिन असरानी को इनसे दूर ही रहना पड़ा।

एक दिन की बात है असरानी जिस घर में काम करता था, वहां एक घड़ी चोरी हो गई, अक्सर यही होता है कि चोरी का इल्जाम घर में काम करने वाले नौकर पर लगाया जाता है।

यह इल्जाम भी असरानी पर लगा था, वह बेकसूर था फिर भी उसके मातापिता ने उस पर यकीन नहीं किया और असरानी को बहुत मार पड़ी।

अक्सर जब भी कोई चीज इधरउधर हो जाती उसका इल्जाम झट से असरानी के जिम्मे मढ़ दिया जाता

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बाद में पता चला कि घड़ी घर की मालकिन के पास ही थी, असरानी निर्दोष सिद्ध हुआ था, और इनाम में घर के मालिक ने वह घड़ी असरानी को दे दी। 

बारह वर्ष की उम्र में असरानी अपने चाचा की दुकान पर काम करने लगा, उसका काम रेजगारी गिनने का था, अक्सर जब भी कोई चीज इधरउधर हो जाती उसका इल्जाम झट से असरानी के जिम्मे मढ़ दिया जाता, हर बार वह बेकसूर सिद्ध हो जाता और हर बार लोग उसे कसूरवार ठहराते!

असरानी को इस बात से बड़ी तकलीफ हुई और उसने सोचा कसूरवार नहीं होने पर भी अगर लोग उस पर आरोप लगाते हैं, तो इससे बेहतर तो यही है कि वह सही तरीके से अपराध करके आरोप कबूल करे।

असरानी ने अब रेजगारी गिनने के क्रम में हर एक रुपये पर एक आने की चोरी शुरु कर दी और उसने लगभग तेइस रूपये जमा कर लिए

लेकिन असरानी इतनी बड़ी चोरी पचा नहीं सका और पकड़े जाने पर फिर पिता के द्वारा बुरी तरह मार खानी पड़ी इतना कि सारा शरीर लहूलुहान हो गया।

उसके बाद असरानी ने कसम खाई कि वह कभी गलत काम नहीं करेगा. चाहे मौत भी क्यों कबूल करनी पड़े

असरानी ने मेहनत से कभी जी नहीं चुराया, उसके लिए कोई भी काम छोटाबड़ा नहीं था. काम सिर्फ काम होता है, अपनी सामर्थय के बूते पर ही असरानी ने अपनी पढ़ाई पूरी की और फिर वह पूना में अभिनय का कोर्स पूरा करने के बाद बंबई आया। 

असरानी को प्रारंभ में छोटीछोटी भूमिकाएं ही मिली, लेकिन इन्हीं छोटी भूमिकाओं के द्वारा वह बड़ी भूमिकाओं तक पहुंचा

असरानी को फिल्में देखने का बेहद शौक रहा है वह अपने शहर में आई हर फिल्म देखता था, और स्वयं फिल्म बनाने का सपना देखता थाचला मुरारी हीरो बननेके साथ असरानी का सपना भी पूरा हुआ।

इस तरह यह साफ जाहिर है कि, आदमी में सच्ची लगन हो तो उसके सपने जरुर पूरे होते हैं, असरानी ने अपने संदर्भ में यह सिद्ध किया


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Mayapuri

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