प्राण साहब के साथ कुछ लम्हे जो मैं कभी भुला नहीं सकता – अली पीटर जॉन

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जैसा कि मुझे लगता है कि, मैं उन सभी सर्वश्रेष्ठ लोगों के बारे में किताबें लिख सकता हूं, जिनसे मैं मिला हूं और महान समय बिताया है, मैं प्राण साहब के लिए वही कह सकता हूं, जो स्क्रीन पर सबसे ज्यादा नफरत किए जाने वाले खलनायक थे, लेकिन वास्तविक जीवन में सबसे विनम्र और प्यारे आदमी थे। अली पीटर जॉन

बच्चों का नाम प्राण रखने से डरते थे लोग

praanलाखों लोगों की तरह, मैंने भी उन्हें शाप दिया जब उन्होंने एक के बाद एक बड़ी और लोकप्रिय फिल्मों में उन सभी जंगली दृश्यों (वाइल्ड सीन्स) को किया, यह वह समय था, जब मैंने और मेरे दोस्तों ने फिल्मों को आधे में छोड़ दिया क्योंकि हम प्राण नामक इस व्यक्ति के जंगली व्यवहार को बर्दाश्त नहीं कर सकते थे, और उनके बारे में मेरी भावनाएं उस समय की कसौटी पर खरी-उतरीं जब महाराष्ट्र में एक सर्वे के अनुसार कहा गया कि 40 से अधिक वर्षों में किसी भी पुरुष या बच्चे का नाम प्राण नहीं था।

हालांकि मेरा उनसे मिलना किस्मत में ही था, वह अंधेरी में स्थित सेठ स्टूडियो में शूटिंग कर रहे थे, और मेरे सीनियर मुझे पहली बार अपने साथ ले गए थे, और उन्होंने मुझे सचमुच उस बुरे आदमी ‘प्राण’ के कमरे में धकेल दिया था, और अगले एक घंटे तक हमने बात की और जब तक हमने बात करना समाप्त किया, तब तक हम दोस्त बन गए थे, और मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह आदमी वही आदमी था जिससे मैं नफरत करता था।

आज कौन बनकर आए हो, अली या पीटर या जॉन’

वह मुझसे प्यार करते थे (उन्होंने मुझे यह साबित करने के लिए सभी तरीके दिखाए कि वह वास्तव में मुझसे प्यार करते थे), लेकिन मुझसे ज्यादा, वह मेरा नाम पसंद करते थे और हर बार जब हम मिलते थे, तो वह मुझसे पूछते थे, ‘आज कौन बनकर आए हो, अली या पीटर या जॉन’।

हम अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग शूटिंग पर एक साथ थे, लेकिन जब भी उन्हें पता चलता था, कि मैं आ रहा हूं, तो उन्होंने निर्माताओं से कहा कि वह मुझे उनके पास ही एक-एक कमरा दें, जहा हम सबसे अच्छी स्कॉच व्हिस्की पीकर अपना अच्छा समय बिताते थे, और अपने स्वयं के कर्मचारियों द्वारा तैयार किए गए सबसे स्वादिष्ट स्नैक्स खाते थे, यह उन्ही शामों में से एक के दौरान था, जब उन्होंने मुझे बताया था कि कैसे पचास साल से उन्होंने हर शाम व्हिस्की की आधी बोतल बिना किसी ब्रेक के ली थी, वह व्हिस्की पीना और अच्छा खाना पसंद करते थे।

 घर तक छोड़ना भी हो तो भी मुस्कुराते हुए छोड़ने आते थे

praanजब भी वह शूटिंग से फ्री होते थे, मुझे बुलाते थे और मुझे बांद्रा में यूनियन पार्क में स्थित अपने बंगले में साथ शाम बिताने के लिए कहते थे, मैंने देखा कि जब हम एक साथ होते थे तो उन्होंने कोई अन्य अतिथि न होने पर भी मुझे सम्मानित महसूस कराया था, हमारे यह सेशन आधी रात को समाप्त हो जाते थे और वह मुझे बाहर तक छोड़ने और यहां तक कि मुझे कई बार घर तक छुडवाने के लिए भी मेरे साथ आते थे।

उन्होंने अपने कुछ बेहतरीन सीक्रेट्स भी मेरे साथ शेयर किए थे, जिनमें महिलाओं के साथ उनके अफेयर्स तक शामिल थे, लेकिन उन्होंने मुझे यह सब इसलिए बताया कि उन्होंने मुझे अपना एक दोस्त माना और मैंने उनके युवा दोस्त ने उनसे वादा किया था, कि मैं उनके किसी भी राज को कभी नहीं खोलूँगा और मैंने अपनी इस लंबी दोस्ती के दौरान उनके विश्वास को कभी नहीं तोड़ा।

जब कुछ भी याद रखना मुश्किल हो गया

praan2003 के उत्तरार्ध के कुछ समय में मैंने पहली बार महसूस किया कि वह अपनी याददाश्त खो रहे थे, और जैसे-जैसे समय बीतता गया, यह स्पष्ट हो गया कि वह अल्जाइमर का शिकार हो गए थे, और हमारी मुलाकातें कम होती गईं और धीरे-धीरे वह वही प्राण साहब नहीं रहे जिन्हें मैं कभी जानता था।..

वह अब काम नहीं कर रहे थे, और वह ऐसी किसी सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल नहीं थे, जिनका वह कभी एक महत्वपूर्ण हिस्सा थे। लेकिन, वह मुझे अपने घर पर आमंत्रित करते रहे, लेकिन यह मुलाकाते हमारी केवल सुबह और दोपहर के भोजन से पहले होती थी।

वह टीवी ऐसे देख रहे होते थे कि पता नहीं चलता था की उन्हें यह पसंद है या नहीं, वह केवल क्रिकेट मैच देखते समय जीवित नजर आते थे, लेकिन दोपहर का भोजन करने से पहले उन्होंने अपनी बीयर की बोतल जरुर ली थी।

वह शख्स जो बुराई का बहुत बड़ा प्रतिक था, वह अब घर में सत्संग के दौरान महिलाओं की एक छोटी सी भीड़ में चुपचाप बैठा देखा जाता था, जिसमें उनका वफादार कुत्ता भी उनकी बगल में बैठा रहता था।

वह बूढ़े हो रहे थे, और बीमारी उन पर हावी होती जा रही थी और वह जल्द ही लोगों को भूलने लगे थे और वह अपने आसपास क्या हो रहा था, उसे पहचान तक भी नहीं पा रहे थे।

जब अरुण जेटली के जाने के बाद पूछा “ये कौन लोग आये थे हमारे घर?”

praan   सबसे दर्दनाक दृश्य तब था, जब केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली उन्हें भारत सरकार द्वारा दिए गए दादासाहेब फाल्के पुरस्कार प्रदान करने के लिए उनके घर आए। वहां मेहमान थे, मीडिया थी और सभी जगह उत्साह का माहौल था। लेकिन जिस आदमी ने अपना जीवन (प्राण) खलनायक के रूप में समर्पित किया, जिसने मनुष्य की गुड साइड से जोड़ने के लिए मनुष्य की ईविल साइड को निभाने के लिए अपना जीवन समर्पित किया था, वह इन्सान आज अपनी ही दुनिया में खो गया था और इस फंक्शन के समाप्त होने के काफी समय बाद, उन्होंने अपने उस आदमी जो उनकी देखभाल कर रहा था, से एक सवाल पूछा, “ये कौन लोग आए थे हमारे घर?”

ऐसी भी एक जिंदगी थी, जो फिर कभी हो नहीं सकती, खुदा ने चाहा भी तो नहीं।

अनु-छवि शर्मा


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