जानीवाकर की कहानी –जैड.ए.जौहर

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mainbombaikababu

मायापुरी अंक 7.1974
जानीवाकर अपने वक्त का वह पहला कलाकार है जिसने कॉमेडियन होने के बावजूद हीरो की भूमिका निभाई। मुसाफिर खाना’ मिस्टर कार्टून एम ए’ आदि फिल्मों में वह हीरो बना था। जानीवाकर ने रजत पट पर अपनी दिलचस्प हरकतों से फिल्म दर्शक का मन जीत रखा था लेकिन मजे की बात यह है कि उसकी शादी भी किसी हास्य फिल्म की दिलचस्प सिच्युएशन से कम नही है।
शकीला की बहन नूर ने फिल्मों में नाम तो कमा लिया था किन्तु अपना कोई स्थान न बना पाई थी। हां इस बीच वह जानीवाकार के दिल में स्थान पाने में जरूर सफल हो गई जानीवाकार भी अकेला था-कुंवारा था। दिल से दिल टकरा चुके थे और बात शादी तक जा पहुंची थी। लेकिन समस्या यह थी की नूर की मां को किस तरह मनाया जाए ? वह शकीला और नूर पर बड़ा सख्त पहरा लगाकर रखती थी। उन्हें घर के से स्टूडियो और स्टूडियो से घर के सिवा कही जाने की आज्ञा न थी। (सोने का अण्डा देने वाली मुर्गियों की ऐसी ही देखरेख की जाती है)
जानीवाकर सच्चे दिल से चाहता था कि किसी तरह से भी नूर शादी के लिए तैयार हो जाए तो फिर वहां से मुक्ति का रास्ता ढूंढ निकाला जाए। इसी चक्कर में एक दिन जानीवाकार ने नूर के पीछे-पीछे कोई सात हजार मील का सफर कार में तय कर डाला। लेकिन नूर ने शादी की हामी न भरी क्योंकि वह मां से बहुत डरती थी। लेकिन एक दिन सच्ची मुहब्बत रंग लाई और इश्क का जादू सिर चढ़ कर बोला। नूर को जानीवाकर शादी के लिए राजी करने में सफल हो गया और मंगलवार ‘मुक्ति’ का दिन निश्चित हुआ। किन्तु प्रश्न यह था कि वहां से निकाला जाए तो किस तरह ? नूर पर बड़ा क़डा रूख पहरा लगा दिया था। जानीवाकर अगर अपनी कार से गोविन्द महल से नूर को लेने जाए तो मामला बिग़डने की संभावना थी। इसलिए तो किया गया कि जानीवाकार किराये की टैक्सी में वहां आएगा। नूर गोविन्द महल के नीचे आएगी और फिर तो जानीवाकार मोर्चा संभाल लेगा। लेकिन दुर्भाग्य से मंगलवार को ‘गोवा सत्याग्रह’ दिवस था।यह देखकर जानीवाकार ने यह सारा हाल एक टैक्सी में तीन-चार लड़के बिठा कर नारे लगाने शुरू कर दिये। ‘चले’ गोवा’ चलो गोवा!
जानवीकार टैक्सी में नारे लगाता हुआ गोविन्द महल जा पहुंचा। लेकिन नूर बाहर न आ सकी।
मंगलवार को असफल होने पर दूसरे दिन बुध को निश्चित समय पर जानीवाकार फिर गोविन्द महल पहुंचा और एक चक्कर लगा डाला। नूर किसी तरह आंख बचाकर नीचे आई जानीवाकार उसे कार में बिठाकर इस तरह नौ दो ग्यारह हुआ जैसे किसी फिल्मी की शूटिंग कर रहा हो और फिर तैशुदा कार्यक्रम के मुताबिक एक काजी के यहां जाकर दोंनो ने शादी कर ली।
बात उस वक्त की है जब राजेन्द्र कुमार जुबिली कुमार नही बना था।
हां, आज के राकेश पांडे की तरह नकली दिलीप कुमार के रूप में उसकी चार पांच फिल्में आ चुकी थी और इसीलिए लोग उसे पहचानने लगे थे। एक बार वह अपने माता पिता से मिलने दिल्ली गया। उसका नाम सुनकर बहुत से लोग मिलने गए। उनमें कुछ लड़कियां भी थी। उनमें एक बड़ी भोली और शर्मीली सी लड़की थी। वह राजेन्द्र कुमार की सहेली बन गई थी, उसका नाम शशि था। एक बार वह झेपंती हुई, शर्माती हुई राजेन्द्र कुमार के पास आई और बोली, ”भाई साहब, मेरे मंगेतर भी बम्बई गए है फिल्म स्टार बनने अभी तक तो कुछ हुआ नही! सिफारिश कर सकें तो कह दें।
“क्या नाम है तुम्हारे मंगेतर का?” राजेन्द्र कुमार ने पूछा।
“हरीकिशन गोसाई” उसने शर्माते हुए कहा।
राजेन्द्र कुमार ने इस नाम के लड़के का तलाश करवायी और लोगों से कहा कि यदि वह मिले तो उनसे आकर मिलने के लिए कह देना।
एक दिन राजेन्द्र कुमार शूटिंग कर रहा था कि एक शर्मीला-सा लड़का् उसके पास गया और बोला “जी मैं हरीकिशन गोसाई हूं“ शशि से ने मुझे पत्र लिखा था कि उसने आपसे मेरे बारे में बात की हैं”
“अभी तक कुछ काम बना क्या”
“जी अभी नही बना उसने कहा
“खैर कोई बात नही जब तक काम नही बनता मेरे साथ रहो, राजेन्द्र कुमार ने कहा और फिर उसने फिल्मीस्तान में निर्देशक शाहिद लतीफ से कहकर उसे ‘पिकनिक’ में आज हीरो का रोल दिलवा दिया। ‘पिकनिक’ आज तक रिलीज न हो सकी किन्तु हरिकिशन गोसाई भी राजेन्द्र कुमार की तरह दिलीप कुमार की नकल करके अपना स्थान बनाने में सफल हो गया आज केवल हीरो ही नही, एक माना हुआ शोमैन, निर्माता, निर्देशक और लेखक भी है। जी, वही लड़का आपके लिए ‘रोटी कपड़ा और मकान’ लेकर आया हैं आज उसे आप लोग मनो़ज कुमार के नाम से जानते है।


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Mayapuri

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