भीड़ में अकेला आदमी

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बहुत से लोग जो नज़र आते हैं वो होते नहीं हैं और जो होते हैं वो नज़र नहीं आते।
अली पीटर जॉन का मामला भी कुछ ऐसा ही है। देखने में वो इस देश के करोड़ों आम आदमियों मे से एक मालूम होता है। उसमे ऐसी कोई अदा या ख़ास बात दिखाई नहीं देती जो उसे दूसरे आम आदमियों से अलग करती हो। सस्ते सूती कपड़ों में लिपटा हुआ एक शरीर जो समय की चोटें खाते खाते कमज़ोर हो गया है। आगे से उड़े से हुए बाल, एक झाड़ – झंकाड़ दाढ़ी, जिसे कैंची या कंघा देखे हुए महिने गुज़र जाते हैं और जिसमें सफ़ेद बाल काले बालों से ज़्यादा हो चुके हैं। अधखुली आंखें जिन्हे देख कर पता ही नहीं चलता कि वो क्या देख रही हैं और देख भी रही हैं या नहीं । सच्चाई इसके बिल्कुल ख़िलाफ़ है । उन आंखों में दिल का हाल पढ लेने की ताकत है और उन्हे वो सब कुछ नज़र आ जाता है जिस पर हमारी आपकी निगाहें नहीं पहुंचती। वो एक ही वक्त में स्टार्स के चमकते चेहरे देखता है और उस लाईटमैन के माथे पर पसीने की बून्दें भी देख लेता है जो अन्धा कर देने वाली लाईटस के पीछे खड़ा होता है। उसका दिमाग़ बेहद शार्प और याददाश्त इतनी तेज़ है कि हैरत होती है। अली ने सैकड़ों इंटर्व्यूज़ लिए हैं, हज़ारों प्रोग्रामों की रिपोर्टिंग की है। मगर मैने कभी उसे काग़ज़ पर नोट लेते या रिकॉर्ड करते नहीं देखा। वो जो कुछ देखता और सुनता है वो उसके दिमाग़ के कम्प्यूटर में एक फाईल बन जाता है और वो फाईल जब भी खुलती है तो उसका एक शब्द भी इधर से उधर नहीं होता। अली ख़ुद कम्प्यूटर का मोहताज नहीं है। वो आज भी लॉंग हैंड में लिखता है। अली उन लोगों में से है जो पास खड़ा होता है और लोग नहीं पहचानते मगर जब नाम सुनते हैं तो चौंक पड़ते हैं।
उसका नाम पहली बार मैने “ स्क्रीन ”  में पढा था। एक ज़माना था कि स्क्रीन हिन्दुस्तान का सबसे पोप्यूलर फिल्मी अखबार हुआ करता था। उसकी पोप्यूलैरीटी की दो वजहें थी। पहली वजह थी उसके आखरी पन्ने पर 20 बाई 15 साईज़ में छपने वाली किसी फिल्मी हसीना की ख़ूबसूरत तस्वीर, जिसे पान वाले और बाल काटने वाले बड़े शौक से अपनी दुकानों में सजाया करते थे और दूसरी वजह थी एक कॉलम “ राउंड एंड अबाउट ”। ये कॉलम अपने ढन्ग का एक ही था। कॉलम क्या था पूरी एक दुनिया थी जिसमें कभी ऐसे इश्यूज़ को छेड़ा जाता जो फिल्म इंडस्ट्री में चर्चा का विषय होते। कभी किसी व्यक्ति के बारे में लिखा जाता और कभी वो भी लिखा जाता जिसका सम्बन्ध फिल्मों से नहीं होता था। बल्कि आम आदमियों की उस ज़िन्दगी से होता था जो हर वक्त हमारे चारों तरफ़ बहती रहती है। इंसानों के दु:ख सु:ख, उम्मीदों और इरादों के किस्सों – कहानियां बड़ी सादा मगर दिल में उतर जाने वाली भाषा में लिखे जाते थी। अक्सर ऐसा होता था कि कोई कॉलम मुझे बहुत ज़्यादा पसन्द आता तो उसका अनुवाद करके अपने उर्दू अखबार में छाप दिया करता था और पढने वालों की तारीफ़ समेटा करता था। उस कॉलम के नीचे अली पीटर जॉन का नाम लिखा होता था। बरसों तक मै ये समझता रहा ये कॉलम लिखने वाले तीन आदमी हैं जिनके नाम एक साथ दिए जाते हैं। ये राज़, कि लिखने वाले तीन नहीं बल्कि एक ही है, बड़े ही रोमांचक ढंग से मुझ पर खुला था।
अब याद नहीं कब की बात है मगर है बहुत पूरानी बात कि होटल सन एन सैंड में कोई फिल्मी पार्टी थी और ऐसी पार्टियां जिनमें पीना पिलाना भी होता है हमेशा देर तक चलती हैं। वो पार्टी भी काफ़ी देर तक चलती रही। मै जब बाहर निकला तो चारों तरफ़ अन्धेरा फैल चुका था। और सड़क पर कुछ गाड़ियों और कुत्तों के सिवा कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक गाड़ी की हैडलाईटस में एक आदमी नज़र आया जो डगमगाता, लड्खडाता चला जा रहा था। उस आदमी को मैने पार्टी में भी देखा था। वो हाथ में गिलास लिए हॉल के दरवाज़े के पास खड़ा था और हर आने जाने वाले को इस तरह देख रहा था जैसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो। मैने सोचा रात बहुत हो चुकी है और इस इलाके मे आसानी से कोई सवारी भी नहीं मिलती है पता नहीं ये बेचारा कहां जाएगा मगर जहां भी जाएगा बहुत परेशान होकर जाएगा। मैने गाड़ी उसके पास रुकवाई और खिड़की से मुन्ह निकाल कर पूछा “ मै आपको कहीं छोड़ दूं ”
उस आदमी ने अपनी नशे से भरी अधखुली आंखों से मुझे देखा और गाड़ी का दरवाज़ा खोल कर ड्राईवर के पास बैठ गया।
“ कहां जाएंगे ? ” मैने पूछा
उसकी भर्रायी हुई आवाज़ सुनाई दी। “ वर्सोवा ! ”
मैने ड्राईवर से वर्सोवा चलने को कहा और उम्मीद करने लगा कि मेरा मुसाफ़िर कोई बात करेगा। मगर वो चुपचाप सर झुकाए बैठा रहा। पता नहीं सो रहा था कि सोच रहा था। यारी रोड़ के करीब अचानक उसने सर उठाया और कहा “बस ” गाड़ी रुकी वो उतरा और अन्धेरे मे गायब हो गया। मै हैरानी से सोचता रहा “ अजीब आदमी है आधे घंटे के सफ़र में सिर्फ दो लफ्ज़ बोले और उतरते वक्त शुक्रिया भी अदा नहीं किया।कुछ दिनों बाद वो रात मेरे ज़हन से उतर गई और वो आदमी भी । उसमे ऐसी कोई बात ही नहीं थी कि उसे याद रखा जाता।  कुछ महिने बाद वो आदमी फिर किसी पार्टी में दिखाई दिया। तो मैने अपने एक डायरेक्टर दोस्त् से पूछा “ भई ये साहब कौन हैं जो कोना और गिलास पकड़े खड़े हुए हैं ” मेरे दोस्त ने हैरत से मुझे देखा और बोला अरे तुम नहीं जानते ये तो मशहूर जर्नलिस्ट अली पीटर जॉन हैं।
अरे बाप रे ! ऐसे होते हैं अली पीटर जॉन ! मै बहुत देर तक दिल ही दिल में शर्मिन्दा होता रहा। फिर अली के पास गया और अपना इंट्रोडकश्न कराया और बताया कि मै उसका कितना बड़ा फैन हूं। मै बहुत देर तक बोलता रहा और अली बिना आंखें झपकाए इस तरह सुनता रहा जैसे मै उस से नहीं बल्कि उसके पीछे वाली दिवार से बातें कर रहा हूं । ये अलग बात है कि जब अली ने उस पार्टी के बारे में लिखा तो मेरा ज़िक्र भी किया और मेरी कुछ बातें भी quote की। मतलब ये कि उसे मै भी याद था और मेरी बातें भी थीं । एक मै ही अली की तहरीरों का दिवाना नहीं हूं और ना ही उसकी शोहरत सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के अन्दर है। उसके चाहने वाले हज़ारों हैं और वो जो भी लिखता है, जहां भी लिखता है बड़ी इज़्ज़त और शौक से पढ़ा जाता है।
अली ने ज़िन्दगी का सफ़र ख़्वाजा अहमद अब्बास से शुरू किया था जो अपने ज़माने के बेहतरीन कहानीकार, बेमिसाल columnist , लाजवाब फिल्ममेकर होने के साथ साथ एक अज़ीम इंसान भी थे। कच्ची मिट्टी अगर किसी माहिर कलाकार के हाथ मे आ जाए तो वो क्या से क्या बन जाती है उसकी ज़िन्दा मिसाल अली पीटर जॉन है। अब्बास साहब उसके गुरू और गॉडफादर ही नहीं थे बल्कि उस से बहुत ज़्यादा थे। अली का कहना है वो एक ख़ुश्बू थे जो उसकी रग रग में उतर चुकी है। जिन लोगों ने अब्बास साहब का कॉलम ‘लास्टपेज’ जो ‘Blitz’ में 42 साल तक छपता रहा, पढा है वो बता सकते हैं कि अब्बास की ख़ुश्बू अली के लफ़्ज़ों मे से भी आती है।
अब्बास साहब कहा करते थे “ मै वही लिखता हूं जो महसूस करता हूं ।” अली का भी यही हाल है। उसका कलम भी उतना ही धारदार है जितना उसके गुरू का था। वो भी उतना ही बेबाक और निडर है जितना अब्बास साहब थे। अली ने 33 बरस तक स्क्रीन में मुसलसल लिखते रहने का एक रिकॉर्ड कायम किया है। स्क्रीन में छपने वाले उसके आर्टिकल्स को गिना जाए तो दो हज़ार से ज़्यादा होते हैं। पिछले 8 बरस से वो “सुपर सिनेमा” से जुड़ा हुआ है और इस मैग्ज़ीन में भी उसके लिखे हुए आर्टीकल्स 2000 से ज़्यादा हो चुके हैं। वो “वैब मैग्ज़ीनस” के लिए भी लिखता है। मगर उन आर्टीकल्स की संख्या कितनी है मुझे नहीं मालूम। अली ने कई किताबें भी लिखी हैं। जिनमें उसकी बायोग्रैफी “ Life Bits and Pieces ” बहुत मशहूर है। कहने को ये उसकी बायोग्राफ़ी है मगर पढने से पता चलता है वो किसी एक आदमी की ज़िन्दगी की कहानी नहीं है। वो एक आईना है जिसमें पूरा एक युग अपनी सूरत देख सकता है।  Life Bits and Pieces  मेरी फेवरेट किताबों मे से एक है। मै उसे जब भी पढता हूं एक अजीब अहसाह होता है कि इस किताब की भाषा एक ही वक्त में prose भी है और poetry भी। जब ये किताब रीलीज़ हुई थी तो मैने अपनी तकरीर में कहा था “ मुझे इस बात की ख़ुशी नहीं है कि मै अली का दोस्त हूं, मुझे तो इस बात पर गर्व है कि वो मेरा दोस्त है।”  और मै आज भी अपने बयान पर कायम हूं।
अली बहुत अच्छा आदमी है उसमें ख़ूबियों की कमी नहीं है मगर हर अच्छे आदमी की तरह कुछ कमज़ोरियां भी हैं । उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी ये है कि वो शराब को हाथ तक नहीं लगाता। लेकिन जब पीता है तो पीता ही चला जाता है। मै कभी कभी सोचता हूं कि बहुत अच्छी बात है कि उसमें एक कमज़ोरी है वर्ना शक होता कि कहीं वो कोई फरिश्ता वगैरा तो नहीं है जो ग़लती से फिल्मों की दुनिया में आ गया है।
अली की नई किताब “Pilgrimage” उसके कुछ आर्टीकल्स का कलेक्शन है जिसमें हिन्दी फिल्म के लम्बे सफ़र की झलक दिखाई देती है। मुझे यकीन है ये किताब भी हाथों हाथ ली जाएगी क्योंकि इन लफ्ज़ों के पीछे जो कलम है वो अली का है, बेबाक, बेलाग और आज़ाद क़लम।
जावेद सिद्दीकी
पिछले कई सालों से अली पीटर जॉन मायापुरी साप्ताहिक पत्रिका के लिए लिख रहे हैं। मायापुरी के प्रकाशक पी.के बजाज और अमन बजाज हर साल  29 जून को अली साहब द्वारा लिखित किताबे छाप रहे हैं। आजकल उनके मैटर मायापुरी पत्रिका , mayapuri.com और bollyy. com पर आ रहे हैं।
भीड़ में अकेला 

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