मूवी रिव्यू: काम वासना का नया अध्याय ‘लवगेम्स’ – लव डेंजरसली

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रेटिंग 1/2

थ्रिलर और इरोटिक फिल्मों के लिये जाने जाते लेखक निर्देशक विक्रम भट्ट अपनी फिल्म ‘लवगेम्स’ से समाज में पनप रहे एक नये लेकिन वर्जित खेल का दावा कर रहे हैं और वो दावा है खासकर मध्यम समाज में सेक्स या काम वासना को बढ़ावा देता लवगेम। जबकि फिल्म में इस खेल के खिलाड़ी हैं कथित ऊंची सोसाईटी के यंग लोग।

कहानी

रमोना यानि पत्रलेखा एक ऐसी धनाढ्य औरत है जो प्यार में विश्वास न करते हुये सिर्फ वासना के प्रति जागरुक है। उसकी तरह ही एक अमीर बाप का बेटा सैम उर्फ समीर सक्सेना यानि गौरव अरोड़ा जिसकी मां बचपन में ही उसे छोड़ कर चली गई थी। उस खालीपन को भरने के लिये वो भी रमोना के साथ एक ऐसे लव गेम में साथ है जो पेज थ्री पार्टियों में एक खुशहाल कपल को अपना शिकार बनाते हुये उसके साथ अपनी काम पिपासा शांत करते हैं। सैम तो उससे भी एक कदम आगे जाकर अपने अकेलेपन से घबराकर अपने हाथ की नसें काट दर्द का एहसास करने की कोशिशें करता रहता है। एक बार वो एक पार्टी में डा.अलीशा अस्थाना यानि तारा अलीशा बेरी को देखता है और उसे देखते ही उसे प्यार करने लगता है। लेकिन अलीशा अपने नामी वकील गौरव अस्थाना के जद्दो जमाल से इतना डरती है कि उसके द्वारा किये गये जुल्म और मारपीट चुपचाप सहती रहती है। रमोना को जब ये बात पता चलती है तो वो बाकायदा सैम को ब्लैकमेल करते हुये अपने साथ रहने और पहले की तरह सोने के लिये मजबूर करती है। इसके बाद शुरू होता है दोनों के बीच शह और मात का खेल।

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निर्देशन

इसमें कोई दो राय नहीं कि विक्रम भट्ट ऐसे थ्रिलर विषयों के मास्टर हैं। यहां भी उन्होंने कसी हुई स्क्रिप्ट के तहत दर्शक को बांधे रखने की पूरी कोशिश की है लेकिन मध्यांतर से पहले कहानी के सीमित पात्रों की ख्वाहिशें उनकी काम वासना दिखाई देती है यानि सेक्स के नये अध्याय को दर्शाती ये फिल्म पूरी तरह से रोमांचक हो जाती है। हालांकि दर्शक कहानी में आने वाले टर्न एन ट्विस्ट से वाकिफ हैं बावजूद इसके वह पात्रों के माध्यम से सब कुछ देखना चाहता है। लेकिन पढ़ी लिखी डा. अलीशा का अपने पति द्वारा जुल्म सहना बेहद अखरता है जो हज्म होने लायक वाक्या नहीं है। निर्देशक ने लगभग नये कलाकारों से एक हद तक अच्छा काम लिया है। फिल्म की फोटोग्राफी शानदार है और लोकेशनें भी पात्रों की वैभवता को दर्शाती हैं।

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अभिनय

पत्रलेखा ने अपनी पहली फिल्म ‘सिटीलाइट’ के विपरीत एक बोल्ड और ग्लैमरस रोल निभाकर अभिनय के प्रति अपनी आस्था का परिचय दिया है लेकिन उसे अपनी हिन्दी पर काम करने की जरूरत है। तारा अलीशा बेरी भी अपनी भूमिका में अच्छी लगी, उसने अपनी भूमिका को बढि़या तरह से निभाया है। गौरव अरोड़ा की ये पहली फिल्म है इस हिसाब से उसका आत्मविश्वास बेहतर था। अपनी छोटी सी साइको टाइप भूमिका को हिरेन तेजवानी ने बढि़या अंजाम दिया।

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संगीत

भट्ट कैंप की फिल्मों में संगीत हमेशा अच्छा होता है लेकिन इस बार सिद्धार्थ का संगीत कमजोर रहा। बैकग्राउंड म्यूजिक एक हद तक ठीक रहा।

क्यों देखें

विक्रम भट्ट द्वारा निर्देशित थ्रिलर व ग्लैमरस फिल्मों के दीवाने दर्शकों के लिये फिल्म में सब कुछ है।


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Mayapuri

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