‘लव नोज नो जेंडर’ प्यार की रूढ़िवादी सोच पर सवाल

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Love knows no gender

सुप्रीम कोर्ट ने काफी समय पहले धारा 377 पर ऐतिहासिक फैसला देते हुए इसे अपराध मुक्त कर दिया और समलैंगिक प्यार को कानूनी मान्यता दे दी थी।

मगर अभी भी समलैंगिक संबंधों और समलैंगिक इंसानों को लेकर लोगों की सोच में बदलाव नहीं आया है।
इसी सोच को बदलने व समलैंगिक विवाह की वकालत करने वाली लघु फिल्म ‘लव नोज नो जेंडर’ लेकर शिप्रा अरोरा और शिवांकर अरोरा लेकर आए है।
इसे शिप्रा और शिवांकर के यूट्यूब चैनल ‘कंटेंट का कीड़ा’ पर देखा जा सकता है।

शान्तिस्वरुप त्रिपाठी

शार्ट फिल्म “लव नोज नो जेंडर” का रिव्यु

निर्माता व लेखक: शिप्रा अरोरा

निर्देषक: शिवांकर अरोरा

कलाकार: अंकिता दुबे, रिनी दास, प्रकृति भार्गव, पुरू छिब्बर, बेबी आर्या चौधरी व बेबी जन्नत

अवधि: बीस मिनट

कहानी:
यह दो लड़कियों पल्लवी और अंकिता की कहानी है, जो कि बचपन से ही गहरी सहेली हैं पांच छह वर्ष की उम्र में ही अंकिता ने पल्लवी की माँ से सवाल पूछा था  कि दो रानियों की शादी क्यों नहीं हो सकती?
जिसका जवाब उनके पास नहीं था। लेकिन पल्लवी (अंकिता दुबे) और अंकिता ( रिनी दास ) के बड़े होने पर इनके बीच समलैंगिक संबंध प्रगाढ़ हो जाते हैं।
पर पल्लवी को उसकी मां (प्रकृति भार्गव ) ने पिता का भी प्यार देकर पाला है, इसलिए वह अपनी मां से अपने मन की बात नहीं कह पाती और एक दिन पल्लवी की मां पल्लवी की शादी अमित (पुरू छिब्बर) नामक युवक से कर देती है।
अमित व पल्लवी की सगाई भी हो जाती है. तब अंकिता व पल्लवी के सामने समस्या खड़ी होती है कि वह क्या करें? उसके बाद जो कुछ होता है, उसे इस लघु फिल्म को देखने में ही आनंद आएगा।
लेखन:
षिप्रा अरोरा ने बड़ी समझदारी सेे इस संजीदा विषय को अपनी कहानी व पटकथा का हिस्सा बनाया है यह लघु फिल्म अब तक समलैंगिक/गे संबंधों पर बनी सभी फिल्मों से बहुत ही अलग है।
इस फिल्म में प्यार की रूढ़िवादी धारणा व सोच पर कुठाराघाट किया गया है पूरी फिल्म में इंसानी भावनाओं को बेहतर तरीके से उकेरा गया है, पर कहीं भी बेवजह की नाटकीयता या भाषणबाजी नहीं है।
फिल्म यह संदेष देेने में कामयाब रहती है कि प्यार लिंग भेद से परे है.तो वहीं सवाल भी उठाती है कि हम ऐसी दुनिया में क्यों रहते हैं, जहां सामाजिक मानदंडों के दायरे में रहने के लिए प्यार किया जाता है।
फिल्म में पल्लवी की मां का एक संवाद-‘‘अब कानून के अनुसार दो रानियाँ प्यार कर सकती हैं, पर षादी नहीं’’अपने आप में बहुत बड़ा सवाल खड़ा करता है।
निर्देेशन:
निर्देशक व कैमरामैन शिवांकर अरोरा इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होने इसमें कहीं भी सेक्स या अश्लील दृश्य नहीं डाले है।
फिल्म में सेक्स की भावनाओं की बनिस्बत इंसानी प्रेम की भावना ही उभरती है।
अभिनय:
दो सहेलियां, जिनके बीच समलैंगिक प्यार व संबंध है, जो समलैंगिक शादी की पक्षधर हैं, ऐसी पल्लवी और अंकिता के किरदार में क्रमषः  अंकिता दुबे व रिनी दास ने अपने किरदारों को न्याय संगत तरीके से निभाते हुए शानदार अभिनय किया है।
समलैंगिक विवाह को लेकर जो सामाजिक मानदंड हैं, उनके कारण गमगीन होने व प्यार के लिए त्याग  के दृश्यों में दोनों का अभिनय दर्शकों के दिलों तक अपनी बात पहुॅचाने में सफल रहती हैं।
अमित के छोटे किरदार में भी पुरू छिब्बर अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं।

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Mayapuri

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