मक़बूल फ़िदा हुसैन

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इंडियन पिकासो उर्फ़ एम एफ़ हुसैन को उनके जन्मदिन पर श्रद्धांजलि

पद्म श्री, पद्म भूषण व पद्म विभूषण जैसे सम्मानो से सम्मानित मक़बूल फ़िदा हुसैन उर्फ़ एम एफ़ हुसैन का जन्म 17 सितम्बर 1915 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में एक सुलेमानी बोहरा परिवार में हुआ था। जब हुसैन बहुत छोटे थे तब उनकी मां का देहांत हो गया और उसके बाद उनके पिता इंदौर चले गए जहाँ बालक मकबूल की प्रारंभिक शिक्षा हुई। वहां मदरसे मे पड़ते वक़्त उनके अन्दर इस कला ने जन्म लिया व  बीस साल की उम्र में हुसैन बम्बई गये और जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में दाखिला ले लिया। अपने करियर के शुरूआती दौर में पैसा कमाने के लिए हुसैन सिनेमा के पोस्टर बनाते थे। पैसे की तंगी के कारण वे दूसरे काम भी करते थे जैसे खिलौने की फ़ैक्टरी में काम जहाँ उन्हे अच्छे पैसे मिल जाते थे। जब भी उन्हें समय मिलता वे गुजरात जाकर प्राकृतिक दृश्यों के चित्र बनाते थे क्योकि उनका परिवार मूलतः वहीँ का रहने वाला था ।मकबूल फ़िदा हुसैन का विवाह 11 मार्च सन 1941 में फाज़िला के साथ संपन्न हुआ। इस विवाह से उनके तीन पुत्र (मुस्तफा, शमशाद और ओवैस) और दो पुत्रियाँ (राइसा और अकीला) हुईं।

यदि उनके करियर की बात करें तो एक युवा पेंटर के तौर पर एम एफ़ हुसैन ‘बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट्स’ की राष्ट्रवादी परंपरा को तोड़कर कुछ नया करना चाहते थे इसलिए कुछ और चित्रकारों और कलाकारों के साथ मिलकर उन्होंने वर्ष 1947 में ‘द प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप ऑफ़ बॉम्बे’ की स्थापना की।उसके बाद शुरू हुआ उनके करियर का सुनहरा दौर मकबूल फ़िदा हुसैन के कला कृतियों की पहली प्रदर्शनी सन 1952 में ज्यूरिख में लगायी गई। अमेरिका में उनके कला की प्रदर्शनी पहली बार सन 1964 में न्यू यॉर्क के ‘इंडिया हाउस’ में लगायी गई।

 सन 1967 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘थ्रू द आईज ऑफ़ अ पेंटर’ बनाई जिसे ‘बर्लिन इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’ में प्रदर्शित किया गया और ‘गोल्डन बेयर शॉर्ट फिल्म’ का पुरस्कार भी मिला। सन 1971 में ‘साओ पावलो बाईएन्निअल’ में पाब्लो पिकासो के साथ-साथ वे भी विशिष्ट अतिथि थे।

1990 के दशक में हुसैन को हिन्दू देवी-देवताओं को गैर-पारंपरिक तरीके से दर्शाने के कारण कुछ हिन्दू संगठनों का विरोध झेलना पड़ा। उनके खिलाफ अदालत में कई मुकदमे दाखिल किये गए और सन 1998 में कुछ अतिवादी तत्वों ने उनके घर पर हमला कर तोड़-फोड़ भी किया। विरोध-प्रदर्शन के कारण उनकी एक प्रदर्शनी को लन्दन में भी बंद करना पड़ा।

सन 2000 में उन्होंने प्रसिद्ध अदाकारा माधुरी दीक्षित को लेकर ‘गजगामिनी’ नामक फिल्म बनायी। सन 2004 में उन्होंने अदाकारा तब्बू के साथ एक और फिल्म ‘मिनाक्षी: अ टेल ऑफ़ थ्री सिटीज’ बनायी पर कुछ मुस्लिम संगठनों के विरोध के बाद हुसैन ने फिल्म को सिनेमाघरों से उतार लिया।

सन 2006 में हुसैन पर हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्रों के द्वारा ‘लोगों की भावना को ठेस पहुँचाने’ का आरोप लगाया गया। हालाँकि फिल्म सिनेमा घरों में ज्यादा समय तक प्रदर्शित नहीं हो पाई पर फिल्म समीक्षकों ने फिल्म को सराहा और इसे कई पुरस्कार भी प्राप्त हुए। इस फिल्म को ‘कांस फिल्म फेस्टिवल’ में भी प्रदर्शित किया गया।

और अब समय ये आया की सन 2008 में एम एफ हुसैन सबसे महंगे भारतीय चित्रकार बन गए जब क्रिस्टीज के नीलामी में उनकी एक चित्रकला लगभग 16 लाख अमेरिकी डॉलर में बिकी।

सन 2007 के आस-पास तक ‘लोगों की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने’ के मामले में हुसैन के खिलाफ 100 से भी ज्यादा मुकदमे दाखिल हो गए थे और इन्ही में से एक मामले में ‘अदालत में हाजिर नहीं होने के लिए’ उनके खिलाफ वारंट भी जारी कर दिया गया। हालाँकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इस वारंट को बाद में रद्द कर दिया था। हुसैन को मौत की धमकियाँ भी मिली जिसके बाद उन्होंने 2006 में स्वेच्छा से देश छोड दिया था और लंदन में प्रवास करने लगे। सन 2010 में कतर ने उनके सामने नागरिकता का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। क़तर में रहते हुए उन्होंने दो परियोजनाओं पर कार्य किया – अरब सभ्यता का इतिहास और भारतीय सभ्यता का इतिहास।

सन 1955 में उन्हें पद्म श्री से नवाजा गया, सन 1973 में सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया,सन 1991 में उन्हें,‘पद्म विभूषण’ पुरस्कार दिया गया,सन 2008 में केरल सरकार ने उन्हें प्रतिष्ठित ‘राजा रवि वर्मा पुरस्कार’ से सम्मानित किया,जॉर्डन की राजधानी अम्मान स्थित ‘रॉयल इस्लामिक स्ट्रेटेजिक स्टडीज सेण्टर’ ने उन्हें अपने ‘दुनिया के 500 सबसे प्रभावशाली मुसलमान’ की सूचि में शामिल किया गया ।

इतने प्रभावशाली व्यक्ति व चित्रकार ने अपने जीवन का अंतिम समय उन्होंने क़तर और लन्दन में रहकर गुजारा। हुसैन की मृत्यु 9 जून 2011 को लन्दन के रॉयल ब्रोम्पटन अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से हुई। वे पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे। 10 जून 2011 को उन्हें लन्दन के ब्रुकवुड सेमेट्री में दफना दिया गया।


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Mayapuri

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