संघर्ष से सफलता तक मजरूह सुल्तानपुरी

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053-16 Majrooh Sultanpuri

मायापुरी अंक 53,1975

लगभग 27 वर्ष पहले की बात हैं मियां जी कारदार एक महान चित्र ‘शहजहां’ बनाने वाले थे। उनके संगीतकार नौशाद और गीतकार डी.एन. मधोक का आपस में मन-मुटाव हो गया था। इसलिए शाहजहां के गीत लिखने के लिए एक गीतकार की जरूरत थी। मियां जी कारदार ने अपने समय के महान शायर जिगर मुरादाबादी को इस काम के लिए अनुबंध किया और उन्हें पांच हजार रूपये बतौर साइनिंग अमाउंट देकर ‘शाहजहां’ के गीत लिखने को कहा। और गानों की सिच्युएशन उन्हें समझा दी। जिगर मुरादाबादी ने पैसे रख लिए लेकिन अगले दिन मियां जी को फोन कर दिया कि वे किसी फिल्म के गीत नहीं लिख सकते। अगर उन्हें कुछ चाहिये तो उनकी कविता संग्रह से गजलें चुन लें।

जिगर मुरादाबादी ने स्वंय तो इंकार कर दिया किंतु मजरूह सुल्तानपुरी से कहा कि वो ‘शाहजहां’ के गीत लिखने का काम हाथ में ले ले. किंतु मजरूह ने कहा मैं अपनी शायरी खराब नही करूंगा। मेरे बस का यह काम नही है।

मियां जी को जिगर मुरादाबादी का फैसला सुनने के पश्चात बड़ी निराशा हुई। उस समय मजरूह सुल्तानपुरी की गज़लों की भी धूम मचने लगी थी। वो उस समय जिगर मुरादाबादी के साथ ही रहते थे। मियां जी ने निराश होकर कहा, अच्छा, आपके साथ जो नौजवान शायर है उसे ही हमें दे दें, जिगर ने कहा। आप काम करवा सकते है तो करवालें लेकिन मजरूह जिगर साहब से पहले तो मना कर चुके थे लेकिन मियां जी आये तो जिगर ने मजरूह को फिर समझाया कि अभी तुम अकेले हो। इसलिए तुम्हें पैसों की कद्र नही है। जब बीवी बच्चे हो जाए जाएंगे तो उसकी कद्र पता चलेगी। गरज़ जिगर साहब ने इस तरह समझाया कि मजरूह गीत लिखने के लिए राज़ी हो गए।

मियां जी ने आकर पहले एक गीत की सिच्युएशन मजरूह को दी और कहा मैंने यह गीत और भी कई गीतकारों को दिया है। लेकिन मुझे जो गीत पसंद आएगा वही गीत रिकॉर्ड होगा। गीत की सिच्युएशन यह थी कि हीरो एक महान शायर है। वह अपने शब्दों द्वारा जनता का ऐसा नक्शा खींचताहै कि सुनने वाला वास्तव में जन्नत की ख्याली तस्वीर में खो जाए।


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Mayapuri

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