बातों बातों में गीत बना देना आनंद बक्शी के बाएं हाथ का खेल था

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आनंद प्रकाश वैद नाम लेकर 21 जुलाई 1930 में जन्में आनंद बक्शी साहब अपनी जन्मभूमि रावलपिंडी से बहुत प्यार करते थे. उसे अपनी माँ का दर्जा देते थे. लेकिन मात्र 17 साल की उम्र में उन्हें बताया गया कि ये मिट्टी अब उनकी नहीं रही, यह पराई हो गयी है. उन्हें और उनके परिवार को अब नये नये जन्में पाकिस्तान को छोड़कर भारत आना था. यहाँ उनका पहला मुकाम पुणे बना, फिर कुछ समय उनका परिवार मेरठ में भी रहा और अंत-पन्त लाखों मुहाजिरों (रिफ्युज़ी) की तरह उनकी फैमिली भी दिल्ली शिफ्ट हो गयी.

आनंद बक्शी साहब को बचपन से ही लेखन का शौक रहा था पर उस दौर में कलाकार होना फ़ख्र की कम और श्रम की ज़्यादा बात होती थी इसलिए, आनंद बक्शी ने अपना ये हुनर अपने तक ही रखा और घरवालों की मर्ज़ी से नेवी में भर्ती हो गये. यहाँ उन्हें लिखने पढ़ने के लिए कम ही समय मिल पाता था लेकिन जितना जब भी मिलता था, वह पूरी लगन से उसे लेखन में बिताते थे.

उसी दौर में, अपनी मिट्टी छूटने, अपना गाँव अपना वतन छूटने के गम में उन्होंने ये गज़ल लिखी थी

तन्हा ये मेरी ज़िन्दगी सह गयी
मैं यहाँ रह गया वो वहाँ रह गयी

कुछ न मैं कर सका देखता ही रह गया
कुछ न वो कर सकी देखती ही रह गयी

लोग कहते हैं कि तकसीम (बटवारा) सब हो गया
जो न बट सकी वो चीज़ वहीँ रह गयी

याद ‘पिंडी’ की आती है अब किस लिए
मेरी मिट्टी थी, झेलम में बह गयी

इन ज़मीनों ने कितना लहू पी लिया
यह ख़बर आसमानों तक रह गयी

रास्तों पर खड़ी हो गयी सरहदें
सरहदों पर खड़ी बेबसी रह गयी

ले गयी घर, गली शहर मेरे क़िस्से
क्या पता किससे ‘बक्शी’ वो क्या कह गयी

इस दिल को पिघला देने वाली नज़्म लिखने के साथ साथ आनंद बक्शी अपने ट्रूप के साथ गाने गाते भी थे. उन्हें संगीत से बहुत लगाव था. एक वक़्त बात उन्हें लगा कि शायद नेवी के लिए वो परफेक्ट शख्स नहीं हैं क्योंकि उनका दिल तो कागज़ में छुपे शब्दों में बसा रहता है. बस, उन्होंने सेना छोड़ दी और मुंबई में स्ट्रगल करने लगे. लेकिन मायानगरी में रातों रात फुटपाथ पर सोने की जगह नहीं मिलती, भला कामयाबी कैसे मिलती? लेकिन बक्शी साहब डटे रहे और सन 1958 में आई भगवान दादा की फिल्म ‘भला आदमी’ में गीतकार के रूप में शामिल हो गये. फिल्म तो नहीं चली पर गाना ‘अब चाहें तो ले ले मेरी जान’  ज़रूर नोटिस में आया.

इसके बाद फिर स्ट्रगल का दौर चलता रहा, फिल्म सखी रोबिन, शमशीर, शेर ए बग़दाद, सिल्वर किंग, हम भी कुछ कम नहीं आदि सी ग्रेड फिल्मों में उन्हें काम मिलना शुरू हो गया लेकिन उस दौर में मेहनताना कितना मिलता था सोचिए? एक गाने के 15 से 25 रुपए. जबकि आनंद बक्शी साहब उन शौक़ीन लोगों में से थे जिन्हें अच्छा खाना, अच्छा पहनना, सिगरेट शराब जैसे ऐब भी रखना अच्छा लगता था. सिगरेट का तो ये आलम था साहब की जिस वक़्त वो गाने का मुखड़ा सोच रहे होते थे, उस वक़्त तो एक एक डिब्बी सिगरेट फूंक दिया करते थे.

उन्हें पहली फिल्म के कोई पाँच साल बाद ज़रा पहचान मिली. फिल्म थी मेहँदी लगी मेरे हाथ और इसी का टाइटल गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में खासा पसंद किया गया था.

फिर 1964 में किशोर कुमार की फिल्म ‘मिस्टर एक्स इन बॉम्बे’ के गीत लिखने के लिए उन्हें लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत का साथ मिला और यहाँ से इस संगीतकार जोड़ी का आनंद बक्शी साहब से ऐसा याराना बना कि बक्शी साहब की ज़िन्दगी के 3500 गानों में कोई 75 प्रतिशत गाने लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल के साथ बने.

मिस्टर एक्स के गाने ख़ूब चले, उसका ये गाना तो आजतक फेमस है, “मेरे महबूब क़यामत होगी, आज रुसवा इन्हीं गलियों में मुहब्बत होगी”

फिर अगले ही साल शशि कपूर की फिल्म जब जब फूल खिले के गानों ने तहलका मचा दिया. उस दौर में लोग गीतकार को तो इतना पहचानते नहीं थे, उनके लिए पर्दे पर दिखता कलाकार ही सबकुछ होता था. तो तब लोग अकसर कहते मिलते थे कि यार, “शशि कपूर ने क्या गाने बनाये हैं न उस फिल्म के”
वो गाने थे –

अफ्फू खुदाया, हो हमको, तुमपे, प्यार आया, प्यार आया

ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे

परदेसियों से न अँखियाँ मिलाना, परदेसियों को है इक दिन जाना

ये समां, समां है प्यार का, किसी के इंतज़ार का, दिल न चुराले कहीं मेरा, मौसम बहार का

कल्याणजी आनंदजी के संगीत में रची ये अलबम सुपरहिट रही और आनंद बक्शी की डिमांड रातों-रात बढ़ गयी. आनंद बक्शी शौक़ीन आदमी होने के साथ साथ अपने काम के प्रति बहुत डिसिप्लिन भी रखते थे. वह दिन में 12-12 घंटे लिखा करते थे.

1967 में आई फिल्म मिलन में फिर लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ जुड़ आनंद बक्शी साहब ने से बढ़कर एक गीत दिए. उसमें टाइटल सॉंग का एक बहुत मज़ेदार किस्सा है.

आनंद बक्शी साहब को लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल समेत हर संगीतकार से ये सुनने को तो मिलता था कि वह अच्छा लिखते हैं, पर उन्हें अपनी पॉपुलैरिटी पर अभी भरोसा नहीं हुआ था. एक रोज़ वो ट्रेन में थे. रात हो चुकी थी और ट्रेन आउटर पर कहीं यूँ शायद लेट होने के लिए खड़ी हो गयी थी. बक्शी साहब खिड़की वाली सीट पर विराजमान थे. तभी कोई लड़का पास से गुनगुनाते हुए गुज़रा “हम तुम, युग युग से ये गीत मिलन के गाते रहे हैं, गाते रहेंगे”

इतना सुन उनके चेहरे पर ये बड़ी सी स्माइल आई और मन ही मन ख़ुश होते बोले कि नहीं यार, मेरे लिखे गीत पॉपुलर तो हो रहे हैं.

आनंद बक्शी साहब ने अपने कैरियर की असली फ्लाइट तब भरी जब उनकी ज़िन्दगी में राजेश खन्ना, शक्ति सामंत की एंट्री हुई. आप राजेश खन्ना पर फिल्माया कोई भी गीत उठा लीजिए, आपको 90% गीत आनंद बक्शी के लिखे मिलेंगे.

सन 1969 में आराधना रिलीज़ हुई और इस फिल्म से कईयों के कैरियर बुलंदियां छूने लगे. उनमें से एक, मुख्य; आनंद बक्शी साहब भी रहे. इस फिल्म के सबसे पॉपुलर गाने के पीछे एक मज़ेदार किस्सा है

एक रोज़ आनंद बक्शी और उनके मित्र टहल रहे थे कि उन्हें एक लड़की दिखी. उस लड़की को देख उनके दोस्त के मुँह से निकला, “इसका रूप देख यार, कितनी सुन्दर है” आनंद बक्शी ने तुरंत पेन निकाला और कागज़ ढूँढने लगे पर कागज़ तो मिला नहीं, अब?

अब उन्होंने सिगरेट की डिब्बी के किनारे पर लिखना शुरू किया और जब उन्हें दोस्त ने पूछा कि क्या लिख रहा है? तो बोले, बाद में बताता हूँ

छः महीने बाद आराधना रिलीज़ हुई तो वो अपने दोस्त को दिखाने ले गये और बोले “याद है उस रोज़ तूने राह चलती लड़की को देख कहा था कि इसका रूप कितना सुन्दर है, अब ये गाना सुन”

गाना आप पहचान ही गये होंगे – “रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना, भूल कोई हमसे न हो जाए”

राह चलते अचानक रुककर गाने का मुखड़ा लिखना उनका पसंदीदा शगल था.

अगले ही साल 1970 में आई फिल्म आन मिलो सजना के एक गाने का भी रोचक किस्सा है.

हुआ यूँ कि एक धुन बनाने के बाद दो दिन तक बक्शी साहब के साथ सिर धुनते रहे पर मुखड़ा बनकर राज़ी न हुआ. तब लक्ष्मीकांत जी खीजकर जाने लगे और बोले “अच्छा तो हम चलते हैं बक्शी साहब”

तो आनंद बक्शी ने पूछा “फिर कब मिलोगे?”

“जब तुम कहोगे”

बस इतना सुनते ही उन्होंने झट से लक्ष्मीकान्त जी को बिठा लिया और कागज़ कलम लेकर जुट गये और ऐसा गाना बना जो आज भी लोग आम बातचीत में कहीं से जाते वक़्त गुनगुना लेते हैं.

आनंद बक्शी साहब का कोई टाइप फिक्स नहीं था कि वो इस तरह का ही लिख सकते थे उस तरह से नहीं लिख सकते थे.

उन्होंने फिल्म हमजोली के लिए “ढल गया दिन, हो गयी शाम, जाने दो जाना है” भी लिखा तो फिल्म काला समुन्दर के लिए कवाली “मेरी तस्वीर लेकर क्या करोगे तुम” भी लिखा.

उन्हें सिर्फ लिखने का नहीं बल्कि गाने का भी बहुत शौक था. बक्शी साहब ने लता मंगेशकर संग मोम की गुडिया फिल्म के लिए “बागों में बहार आई होठों पे पुकार आई” गाया और इसी फिल्म में सोलो भी गया “मैं ढूंढ रहा था सपनों में”

एक रोज़ आनंद बक्शी अपने दोस्त के संग रेलवे स्टेशन जा रहे थे. उनके पिताजी मुंबई आने वाले थे. रास्ते में उन्हें एक ट्रक दिखा तो अचानक गाड़ी रुकवा दी और अपनी सिगरेट की डिब्बी पर कुछ लिखने लगे.

ट्रक के पीछे लिखा था “मेरे हमसफ़र”

फिर 1970 की ही फिल्म मेरे हमसफ़र के लिए उन्होंने वही गाना इस्तेमाल किया “किसी राह में किसी मोड़ पर, कहीं चल देना छोड़कर, मेरे हमसफ़र, मेरे हमसफ़र”

आनंद बक्शी के ऐसे बहुत से क़िस्से हैं जो बताते हैं कि वो भले ही दिन के 12 घंटे काम करते हैं पर उनका मन 24 घंटे गीत लिखने में लगा रहता है.

ऐसा ही हुआ जब अमरप्रेम के गाने लिखवाने के लिए शक्ति सामंत आनंद बक्शी से मिलना चाह रहे थे पर बक्शी साहब एक पार्टी में थे और शक्तिसामंत इंतज़ार कर रहे थे. तब बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. अब सोचिए, पार्टी से रात देर से निकलते हुए, बक्शी साहब कुछ कुछ नशें में भी थे, शक्ति सामंत ने कहा कि मैं गाड़ी लेकर आता हूँ. तबतक आनंद बक्शी सिगरेट जलाने लगे पर बारिश और तेज़ हवा के चलते उनकी सिगरेट बार-बार बुझ रही थी. उन्होंने शक्ति सामंत को इशारा कर तुरंत एक पेपर पैड लेकर बुलाया और लिखा “चिंगारी कोई भड़के, तो सावन उसे बुझाए, सावन जो अगन लगाये उसे कौन बुझाए”

बाकी आप सब बेहतर जानते हैं कि ये गीत कितना पॉपुलर हुआ और इसे कितने अवार्ड्स मिले.

बक्शी साहब सिर्फ पढ़ने में भी बहुत रुची रखते थे.

राज खोसला की फिल्म मेरा गाँव मेरा देश बन रही थी. लिरिक्स की ज़िम्मेदारी आनंद बक्शी साहब के पास ही थी. सीन था कि विलन ने हीरो को बांधा हुआ है और यहाँ एक गाना चाहिए. उन्हें याद आया कि जब अलेक्सेंडर ने पोरस को बाँध दिया था तो क्या कहा “मार दिया जाए की छोड़ दिया तुझे?”

बस वहीँ से इन्सिपिरेशन लेकर उन्होंने लिखा “मार दिया जाए, की छोड़ दिया जाए, बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए”

ऐसे ही उनका गाना “सुनों कहो, कहा सुना, कुछ हुआ क्या.. अभी तो नहीं” भी ऐसे ही एक वार्तालाप से उठा गाना है. उन्हें आम से शब्दों को बहर में पिरोकर लिखने में महारत हासिल थी. शायद इसीलिए वो आनंद बक्शी थे.

नये दौर के शो मैन सुभाष घई भी अपनी फिल्म सौदागर के गाने लेकर उनके घर आए दोनों ने खाना खाया और हाथ धोते वक़्त आनंद बक्शी साहब बोले “सुभाष तुम्हारी फिल्म का नाम सौदागर है न, उसके लिए एक गाना सूझा है, सौदागर, सौदागर, दिल ले ले दिल देकर”

बक्शी साहब काम में इतने व्यस्त होने के बावजूद अपने बच्चों के लिए भी समय निकालते थे. रात में देर से घर पहुँचने पर जब अपने बच्चों को सोता हुआ देखते, तो उनके सिर पर हाथ रखते हुए लोरी सुनाया करते थे. उनके बेटे राकेश बताते हैं कि कई बार वो उठ जाते थे लेकिन फिर भी आँख नहीं खोलते थे कि उन्हें वो प्यार भरी लोरी अच्छी लगती थी.

बक्शी साहब के चार बच्चे थे. उन्होंने अपने स्ट्रगल के दौर में बहुत बुरा समय काटा था. जैसा आपको ऊपर मैंने बताया ही कि तब गीतकार को 25 रुपए मुश्किल से मिला करते थे. तब उनकी पत्नी कमला एक अंडे के चार टुकड़े कर उनके चारों बच्चों को खिला देती थी और ख़ुद सब्र कर लेती थीं. शायद इसीलिए उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा यही सिखाया कि खाना बस उतना लो जीतना खा सकते हो, कभी वेस्ट न करो.

आप यकीन करेंगे, आनंद बक्शी 41 बार फिल्मफेयर अवार्ड्स में नोमिनेट हुए थे. 1970 से लेकर 1982 तक तो वह हर साल लगातार नोमिनेट हुए थे. ये रिकॉर्ड आजतक बना हुआ है. उन्हें चार बार फिल्मफेयर अवार्ड मिला था.

1968 से नोमिनेट होते आनंद बक्शी का इंतज़ार कोई 11 साल बाद खत्म हुआ था. उन्हें फिल्म अपनापन के गाने “आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है” के लिए पहना फिल्मफेयर अवार्ड मिला था.

फिर बक्शी साहब ने 1982 में फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ के गाने “तेरे मेरे बीच में, कैसा है ये बंधन अंजाना” भी फिल्मफेयर अवार्ड जीता.

उन्हें तीसरा अवार्ड करीब 13 साल बाद दिलवाले दुल्हनिया के लिए मिला. गाना था “तुझे देखा तो ये जाना सनम, प्यार होता है दीवाना सनम”

और फिर अपने कैरियर या मैं लिखूं कि अपने जीवन के आख़िरी दौर में ए आर रहमान की कम्पोज़ीशन में फिल्म ताल के गाने ‘इश्क़ बिना, क्या जीना यारों” जैसे बेहतरीन गाने के लिए फिल्मफेयर अवार्ड मिला.

1971 में आई फिल्म फिल्म दुश्मन के लिए उन्होंने बेमिसाल गाने लिखे जिसमें ‘वादा तेरा वादा’ सबसे पॉपुलर हुआ. वहीं 1998 में आई दुश्मन के लिए भी उन्होंने ही गाने लिखे और इस फिल्म में जगजीत सिंह का गाया गाना “चिट्ठी न कोई सन्देश, जाने वो कौन सा देश, जहाँ तुम चले गये”

आनंद बक्शी के गानों के बारे में लिखने बैठना तो कुछ ऐसा काम है जिसमें ज़िन्दगी कम पड़ जायेगी. लेकिन फिल्म क़र्ज़ के उस गीत का ज़िक्र मैं फिर भी करना चाहूँगा जो उस दौर में अपनी तरह का इकलौता गाना था.

मोहम्मद रफी की आवाज़ में इस गाने को लिखने से पहले लक्ष्मीकांत प्यारेलाल एक ऐसी धुन बना चुके थे जिसमें हर अंतरे पर अलग सुर थे. अगर आप संगीत की समझ रखते हैं तो जानेंगे कि बॉलीवुड के गानों में हर अंतरे पर एक सी धुन का प्रयोग होता आ रहा है लेकिन इस गाने के लिए ख़ास मुहम्मद रफ़ी को बुलाया गया, गाना जब आनंद बक्शी ने लिखा तो पढ़ते वक़्त लक्ष्मीकांत जी ने कह दिया कि ये गाना ब्लॉकबस्टर होगा.

वो गीत है

दर्द ए दिल, दर्द ए जिगर, दिल में जगाया आपने

प्यार मुहब्बत दिल्लगी के अलावा आनंद बक्शी साहब ने ऐसे गाने भी दिए जिन्हें सुनकर ज़िन्दगी के प्रति नज़रिया बदल सकता है.

फिल्म नई जंग के गीत “ज़िन्दगी हर कदम एक नई जंग है” की पॉपुलैरिटी मेरे लिखने की मोहताज नहीं है. वहीं मेरा सबसे प्रिय गाना फिल्म अंगार से है “मुश्किल में है कौन किसी का, समझो इस राज़ को, लेकर अपना नाम कभी तुम ख़ुद को आवाज़ दो”

आनंद बक्शी साहब यूँ तो अपनी सिगरेट की लत के चलते सन 2002 में शरीर के कई मुख्य ऑर्गन फेल होने की वजह से इस फ़ानी दुनिया से रुकसत हो गये लेकिन, मेरे लिए, आपके लिए और अच्छे गानों के हर शौक़ीन इंसान के लिए वो हमारे दिलों में हमेशा अमर हो गये.

उनके जन्मदिन पर उनका ये बेहतरीन गाना पेश ए ख़िदमत है – (यह गीत उन्होंने फिल्म शोले के लिए अपनी आवाज़ में किशोर कुमार, मन्ना डे और भूपेन्द्र सिंह के साथ रिकॉर्ड किया था पर फिल्म की बढ़ती लम्बाई के कारण फिल्म से हटा दिया गया)

शुरू होता है फिर बातों का मौसम
सुहानी चांदनी रातों का मौसम
बुझाये किस तरह दिल की लगी को
लगाये आग हम है चाँदनी को

के चाँद सा कोई चेहरा न पहलु में हो

 

अरज़ किया है…

हाय, के चांद सा कोई चेहरा न पहलु में हो
तो चाँदनी का मज़ा नहीं आता

अरे, जाम पी कर शराब न गिर जाए तो
मैकाशी का मजा नहीं आता:

के चाँद सा कोई चेहरा…

 

जिंदगी है मुकममल अधूरी नहीं
चांद सा कोई चेहरा जरूरी नहीं

हुस्न सैय्यद है, इश्क फरियाद है
ये जो दो नाम हैं, दो बदनाम हैं

तुम तो नादान हो, गम के महमान हो
दिल जरा थाम लो, अकल से काम लो

अगर आज रोशनी होती है साहब सब चिरागो में
ज़रा सा फ़र्क़ होता है दिलों में और दिमागो में

ए मेरे दोस्तो, अकल से काम लो

बात दिल की करो

क्यू के…

शेर दिल को न तड़पा के रख दे अगर

तो शायरी का मज़ा नहीं आता

के चाँद सा कोई चेहरा…

 

शरबती आंख के दुश्मनों से बचो
रेशमी जुल्फ की उलझनो से बचो

वो गली छोड़ दो, ये भरम तोड़ दो

यू ना आएं भरो, इन से तौबा करो

ये जो दिलदार हैं, सब सीतामगर हैं

दिल जो देते हैं ये तो जान लेते हैं ये

वफ़ा के नाम को आशिक कभी रुसवा नहीं करते

कटा देते हैं वो सर को कभी शिकवा नहीं करते

दिल मचल जाने दो, तीर चल जाने दो, दम निकल जाने दो

और, मौत से आदमी को अगर डरने लगे
तो ज़िंदगी का मज़ा आता नहीं

के चाँद सा कोई चेहरा…

 

इश्क में याद कुछ और होता नहीं
आशिकी ख़ूब की, दिल से महबूब की

याद जाती नहीं, जरूरत आती नहीं
दर्द खिलता नहीं, चैन मिलता नहीं

या खुदा क्या करें, हम दवा क्या करें

दावा दर्द-ए-जिगर की पूछे हो तुम दीवाने से
ये दिल की आग बुझेगी फकत आंसू बहाने से

ये सीतम किस लिए, गम हो कम किस लिए, रोये हम किस लिए

क्यू के…

आग पर कोई पानी अगर डाल दे

तो दिल्लगी का मज़ा आता नहीं

के चाँद सा कोई चेहरा…
फिल्म – शोले
गीतकार – आनंद बक्शी
संगीतकार – राहुल देव बर्मन
गायक – आनंद बक्शी, मन्ना डे, भूपेन्द्र और किशोर कुमार


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Mayapuri

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