INTERVIEW: ‘‘आज बिरंची दास पूरे उड़ीसा में हीरो है..’’ – मनोज बाजपेयी

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स्टारडम की बजाय ‘कला’ व अदाकारी को अहमियत देने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी ने बॉलीवुड में अपना एक अलग स्थान बनाया हुआ है. वह मेन स्ट्रीम सिनेमा के साथ ही लीक से हटकर सिनेमा में ज्यादा व्यस्त हैं. तो वहीं अब वह इंटरनेट पर प्रसारित हो रही लघु फिल्में भी कर रहे हैं. फिलहाल वह सौमेंद्र पाधी लिखित व निर्देशित फिल्म ‘बुधिया सिंहः बॉर्न टू रन’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें उन्होंने बाल धावक बुधिया सिंह के कोच रहे बिरंची दास का किरदार निभाया है।

फिल्म ‘बुधिया सिंह’ करने से पहले आपके दिमाग में क्या था और इस फिल्म में अभिनय करने के बाद उसमें क्या बदलाव आया?

जब बुधिया सिंह चर्चा में आया, तब से मैं इस पर नजर रखे हुए था. यह फिल्म बुधिया सिंह के कई अंतरंग बातों पर है. पर जहाँ तक इस कहानी का सवाल है, तो मैं इस कहानी से परिचित था. बुधिया के कोच बिरंची दास को लेकर भी मुझे बहुत सारी जानकारी थी. बाकी जो जानकारी लेनी थी, वह मुझे बीबीसी द्वारा इस बच्चे पर बनायी गयी डाक्यूमेंट्री से मिली. बिरंची दास के इंटरव्यू के काफी वीडियो फुटेज मौजूद हैं. वह सब मैने देखे.यह पॉच छह साल पुरानी कथा है. जब यह बच्चा चर्चा में आया था, तब मीडिया ने कवर किया था, तो इस पर काफी सामग्री है. मैंने टीवी पर काफी कुछ देखा था, तो सब कुछ मेरे दिमाग में ताजा था।

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आपकी नजर में बिरंची दास क्या था?

बिरंची दास एक ऐसा कोच था, जो कि इमानदारी से बच्चों को परवरिश दे रहा था. देखिए, हर आम इंसान बिरंची दास जैसा ही होता है. वह किसी के लिए हीरो, तो किसी के लिए विलेन होता है. बुधिया के लिए बिरंची दास हीरो था. बिरंची दास, बुधिया की प्रतिभा को निखारने में लगा हुआ था. बुधिया ही क्यों उसके जूडो स्कूल में जो भी बच्चे थे, वह उसके अपने नही थे. पर वह हर किसी के रहने खाने पीने वगैरह हर चीज की व्यवस्था करता था. जब तक बिरंची दास जिंदा था, तब तक उसको लेकर लोगो की अलग अलग राय थी. लेकिन आज की तारीख में पूरे उड़ीसा में वह हीरो है।

फिल्म के निर्देशक की यह पहली फिल्म है.आपने उनके साथ काम करने का निर्णय लेते हुए कैसे यकीन किया कि वह कथा को सही रूप में परदे पर ला सकेंगे?

उसकी रिसर्च, उसकी लिखी हुई पटकथा पढ़ने के अलावा उसके इस फिल्म से पहले किया गया काम देखकर मैंने उस पर यकीन किया. मेहनत की।

‘यू-ट्यूब’ पर लघु फिल्मों में अभिनय करने वाले आप पहले स्थापित कलाकार हैं. इसके पीछे कोई और सोच भी है?

मेरी अपनी सोच यह है कि आज हर हाथ में फोन है.लोग कुछ भी देख रहे हैं. ऐसे में मैं उनके सामने इस तरह की फिल्में देखने का एक चुनाव दे रहा हूँ. तो मैं अपनी तरह की फिल्मों का एक दर्शक वर्ग तैयार कर रहा हूं. मैं दर्शक को दस ग्यारह मिनट में उस तरह की चीजे दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ, जिस तरह की चीजें देखना मुझे पसंद है. ‘अलीगढ़’ जैसी फिल्मों का लघुरूप फोन पर उपलब्ध करा रहा हूं. अन्यथा फोन पर तो सिर्फ गाने ही चलते रहते हैं. जब  हमारी फिल्मे देखने की आदत पड़ जाएगी, तो ऐसी हजारों फिल्में बनेंगी. मैं दर्शकों में अच्छी चीजें देखने की आदत डालने का प्रयास कर रहा हूं. क्योंकि नई क्रांति का हम लोग एक हिस्सा हैं।

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पर ‘यू-ट्यूब’ पर बहुत अच्छे पैसे तो मिलते नहीं?

मैं अलग ढंग से सोचता हूं. आपकी बात सही है.फिलहाल ‘यू-ट्यूब’ के लिए बन रही फिल्मों का कोई रिटर्न नहीं है. मगर हम इस तरह की फिल्मों में अभिनय कर सोषल मीडिया को ओर अधिक कारक बना रहे हैं.हम अपने पैशन के लिए ऐसी फिल्में कर रहे हैं. हम सोशल मीडिया को ज्यादा असरदार बनाने में अपना योगदान दे रहे हैं. हम ऐसा कर पाने में सक्षम हैं, तो हम अपना योगदान दे रहे हैं. अब तक मेरी दो फिल्मों यू-ट्यूब पर आ चुकी हैं.चार बनकर तैयार हैं. मैं अभी कुछ और फिल्में करने वाला हूँ. लोग मुझे पसंद कर रहे हैं.‘यू-ट्यूब’ पर ‘जय हिंद’, ‘तांडव’ और ‘कृति’ को बहुत पसंद किया गया है. हम तो हर फार्म के सिनेमा को बनाना चाहते हैं. उससे जुड़ना चाहते हैं. अब तो सोषल मीडिया के जरिए सिनेमा में बहुत बड़ी क्रांति आयी है. मैं बता रहा हूँ कि हम जो पाँच या दस मिनट की लघु फिल्में बना रहे हैं या ऐसी फिल्मों में हम अभिनय कर रहे हैं, तो इसके लिए हमें एक भी पैसा नहीं मिलता है. सिर्फ सहायक निर्देशक या स्पॉट ब्वॉय वगैरह ही कुछ पैसा ले रहे हैं।

आप जिसे सिनेमा की नई क्रांति का नाम दे रहे हैं. यह सिनेमा को कहाँ तक ले जाएगा?

इसकी कोई सीमा नहीं है. सोशल मीडिया का कोई अंत नहीं. यह रूकने वाला नहीं है. अब 4 जी आ गया है।

पर इससे सिनेमाघर के अंदर दर्शक कम जा रहा है?

देखिए, इससे कई चीजें आएंगी. जब फिल्म घर में रिलीज होगी, तो दर्शक को उसके लिए भी पैसे देने ही होगे. मुफ्त में कुछ नहीं होगा.जब सिनेमा घर तक सिमटेगा, तब लोग खरीदकर ही घर के अंदर देख सकेंगे. फिल्मों का व्यापार नहीं रूकेगा, भले ही लोगों का सिनेमाघर के अंदर जाना रूक जाए. जो सिनेमा हाल में जाने की बजाय घर पर बैठकर सिनेमा देखना चाहता है, वह पैसे दे और खुशी खुशी देखे।

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अब तक आपने कई किरदार निभाए हैं. किस किरदार ने आपकी निजी जिंदगी पर असर किया है?

‘शूल’ फिल्म ने. इस फिल्म के किरदार से अपने आपको हटाने में मुझे 7-8 माह का वक्त लग गया था. इस किरदार का गुस्सा व खीज मुझे छोड़ नहीं रही थी. इससे उबरने के लिए मैंने मेडीटेशन किया था. डॉक्टर की सलाह के अनुसार भी कुछ उपाय किए थे. मुझे उन दिनों सोने के लिए नींद की गोली खानी पड़ती थी।

 इसके बाद कौन सी फिल्में हैं?

‘मिसिंग’ तथा ‘सात उचक्के’।


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Mayapuri

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