बाथरूम से बाथरूम तक मनोज कुमार

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Hariyali_030

मायापुरी अंक 2.1974

‘जय बोलो बेईमान की जय बोलो’ एक गीत था फिल्म ‘बेईमान’ में जो रह-रह कर मेरे कानों से टकराता रहता है और मुझे यूं लगने लगता है कि पर्दे पर सिद्धांतों और आदर्श देने वाले बगुला भगत भी जब अपने चेहरे पर नकाब चढ़ाकर मैदान में उतर आते हैं तो क्य होता है? महज अपनी कुंठाओं को अपने सीने में छिपाए हुए देशभक्ति के नाम पर जब भारतीय जनता के साथ कोई खिलवाड़ करता है तो क्या होता है? हां, तब कैसा महसूस होता है जब ’इस रात को हर बात गुलाबी’ जैसे कामुक दृश्यों वाली फिल्म को तो मनोरंजन कर से मुक्त कर दिया जाता है और स्वतन्त्रता-संग्राम की अमर-गाथा गाने वाली रोमांचक कृति ‘के शहीद’ प्रदर्शन तक के लिए तरस जाती है। शहीद, उपकार शोर, पूरब और पश्चिम सभी फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त हो गई क्योंकि इनका निर्माता-निर्देशक और कलाकार मनोज लाल फीताशाही और भ्रष्टाचार में लिप्त उन सभी ‘बगुलों को खुश कर सका जिनके पास मनोरंजन कर मुक्त करने के अधिकार है, जो प्राय: ये दावे करते रहते है कि ‘मेरी कोट की जेब में इतना डाल दो और काम करवा लो। उस समय मनोज के आदर्श कहां गए होगें, मदिरा से परहेज करने वाले मनोज जब अपना काम निकलवाने के लिए मदिरा की नदियां बहाते है तो उनकी भावनाएं कहां जाती हैं ? तो उनकी भावनाएं कहां जाती है ‘गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज’ की कहावत को चरिततार्थ करने वाला मनोज कुमार स्वयं ‘बेईमान’ गीत की पंक्ति का उदाहरण प्रस्तुत कर रहें है।

फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से प्रभावित होकर हीरो बनने का सपना लेकर मनोज कुमार दिल्ली से मुंबई भागे थे। दिल्ली में उसने एक लड़की की सब्ज बाग दिखाए जो आजकल उनकी पत्नि है। मुंबई में सौभाग्य सें उन्हें फिल्मों में काम मिला मगर अभिनय की मौलिकता के मामले में वह पिछड़ गये। उन्होनें अपने अभिनय में दिलीप और राजेन्द्र की नकल करनी प्रारम्भ कर दो। बोलने का अन्दाज दिलीप का लिया और अभिनय की गरिमा राजेन्द्र की। परिणामत: बहुत जल्दी मनोज कुमार का जादू खत्म होने लगा। सिनेमा दर्शक उसे हीरो के रूप में नकारने लगे और मनोज जी को अनुभव होने लगा कि अब वह दिन दूर नही है जब उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फैंक दिया जाएगा। अब मनोज जी के सामने एक ही विकल्प था कि वह कुछ ऐसा करे जिससे लोगों की निगाह में उनकी खोई हुई प्रतिष्ठा के चक्कर में उन्होनें निर्माता-निर्देशक का मुखौटा लगा लिया। देश के गीत गाए जाने लगे। खेत और खलिहानौं तथा कल कारखानों और भारतीय एवं पाश्चात्य संस्कृति के विषयों को फिल्मों का माध्यम बनाया। उनके इस मुखौटे को स्थिर रखने में उनकी पत्नि शशि का भी बहुत बड़ा हाथ है मनोज जी के चेहरे पर लगा यह मुखौटा उन्हें रास आ गया और अब तक एक के बाद एक नये-नये चेहरे तराशने के क्रम में वह सहजता और स्वाभाविकता से दूर होता चले जा रहें है।

मनोज कुमार जी की हर कहानी का ’थीम’ बड़ी प्यारी होती है इसमें शक नही है मगर जहां तक फिल्म में उनके निर्वाह का प्रश्न है वह गड़बड़ा जाता है। सारी कहानी बिखर कर रह जाती है और वह बॉक्स ऑफिस के मोह में पड़ जाता है। ‘शोर’ में जया भादुड़ी और प्रेमनाथ के चरित्र उनके इसी बॉक्स ऑफिस मोह का परिणाम थे। ‘शोर’ की कहानी यदि किसी अच्छे निर्देशक के पास होती तो एक बहुत बड़ा चमत्कार हो गया होता। एक परिष्कृत रुचि की कहानी को चूं-चू का मुरब्बा बना देने वाले मनोज बहुत जल्दी हर फिल्म में नारे बाजी पर उतर आते है जिससे फिल्म का विषय तक ‘गौण’ हो जाता है।

मनोज कुमार जी की ‘रोटी’ कपड़ा और मकान के ऊपर फिल्म भी कहना होगा कि यह आज की ज्वलन्त समस्या है। हर आदमी आज इन आभावों से जूझ रहा है। लोग दाने-दाने को मोहताज है और मनोज कुमार ने इस फिल्म में एक रेप्सीन आटे की बोरियों पर फिल्मा कर आटे का सत्यानाश किया है। आखिर क्यों ? सम्भवत: मनोज कुमार का इस प्रसंग में यह उत्तर होगा कि यह कहानी की मांग थी मगर क्या इससे सैकड़ो आदमियों का पेट नही भर सकता था? किन्तु मनोज जी को इससे क्या? वह तो एक कुशल व्यापारी है और उन्हें पता है कि इसी रेप सीन के कारण फिल्म चलेगी और हां फिर एक बार और उनकी योग्यता का सिक्का जम जाएगा। दिन-रात अपना पसीना बहाने वाले उनकी यूनिट के सदस्य चाहे अपने पेट पर पट्टी बांध लें मगर मनोज जी के यहां सोना बरसना चाहिए। आखिर क्या किया है मनोज ने अपनी सफलता के लिए जिम्मेदार अपने आधारभूत स्तम्भों के लिए? इस मंहगाई के जमाने में तिल-तिल कर रिसते हुए उन सैकड़ों कर्मठ कर्मचारियों के लिए मनोज ने क्या किया है जिनकी ‘मनोज जी, मनोज जी, कहते मुंह सूखता है। मनोज के वे अंतरंग मित्र जिन्होंने मनोज की हर खुशी और हर गम में साथ दिया जब ये कहते है कि, अब पट्ठे के पास पैसा हो गया है। अब अपने से बात नही करता। जब भी यार को फोन करो तो कहलवा देता है कि बाथरूम में है, तो कितना विचित्र लगता है? सब से अधिक विचित्र तो तब लगता है, जब कोई पत्रकार यह कहता है, मनोज कुमार ने पब्लिसिटी का बिल अब तक पे नही किया। क्या कमाया नही है उसने ? ठीक उसी समय मेरी आंखो के सामने से एक उफनता हुआ सागर गुजर जाता है और मेरे कानों में वही गीत गूंजने लगता है जय बोलो बेईमान की।

‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’ नीति का परिचायक मनोज अपने दर्शकों से भी दूर-दूर भागता है। वह मात्र फिल्म के पर्दे पर तो आदर्शो की दुहाई देता है और स्वयं अपने जीवन में उन आदर्शो का सामना तक करने से घबराता है। वह उसी महात्मा की तरह है जो बच्चे को तो गुड़ न खाने की सीख देता है और खुद छिप कर गुड़ खाता है। अपने शुभचिंतकों और घनिष्ठ मित्रों से बाथरूम का बहाना इसलिए करना है कि कही कोई उसके चेहरे की नकाब नोचकर न फेंक दे नही तो क्या कारण है कि ‘रोटी कपड़ा और मकान’ की दुहाई देकर भारतीय जनता की भावनाओं को उत्तेजित करने वाला मनोज कुमार फिर एक और मुखौटा लगाकर सामने आये क्योंकि इससे निर्धन और असहाय जनों को चाहे उपहास का पात्र बनना पड़े मगर मनोज जी की तो ‘रोटी कपड़ा और मकान’ की समस्या तो हल हो ही जाएगी। मनोज जी को शायद यह नही पता कि यह बेरहम इंडस्ट्री किसी की सगी नही है और ये सिने –दर्शक जिनसे आज मनोज मुंह छिपाते है, कल ऐसा भी तो हो सकता है कि उन्हें बाथरूम में ही बन्द होकर रह जाना पड़ें वैसे भी मनोज जी का बाथरूम अच्छा खासा बाथरूम है जो उसके देशभक्ति के थोथे नारों से कैश हुआ है।


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Mayapuri

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