मूवी रिव्यू: सआदत की कहानियों पर आधारित ‘मन्टोस्तान’

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सआदत मंटो साहित्य की दुनिया का बहुत बड़ा नाम है। मंटो की कहानियों पर अभी ढेर सारे नाटक लिखे जा चुके हैं। लेकिन किसी फिल्म में पहली बार निर्देशक राहत काज़मी ने अपनी फिल्म  ‘मन्टोस्तान’  में मंटो की चार कहानियां पिरोयी हैं । जैसे ठंडा गोश्त, असाइनमेंट, खोल दो तथा आखरी सैल्यूट।

ठंडा गोश्त बंटवारे के वक्त की कहानी है जब पंजाब में मार काट के साथ लूट मची थी। शोहेब निकास यानि सरदार इस्सर सिंह ने भी अपनी पत्नि  के लिये गहनों के लिये खूब लूटमार की। एक  बार इस्सर एक सप्ताह बाद घर आता है तो बीवी के साथ हम बिस्तर हो कुछ नहीं कर पाता । बाद में बीवी को शक हो जाता है उसके इकरार के बाद कि वो एक लड़की के साथ सोया था तो बीवी तलवार से उसकी गर्दन काट देती है । मरने से  पहले इस्सर बताता है कि एक मुस्लिम परिवार के लोगों को मारकर उसने उसी घर की लड़की के साथ बलात्कार किया था, लेकिन जब उसे पता चला कि उसने पहले से मर चुकी लड़की का बलात्कार किया तो उसकी सारी मर्दानगी जाती रही। दूसरी कहानी असाइनमेंट एक ऐसे मुसलमान जज  वीरेन्द्र सक्सेना की  है जो बंटवारे के बाद भी इंडिया नहीं छोड़ता। बाद में उसे लकवा मार जाता है। उसके मरहूम दोस्त का बेटा ईद पर  हमेशा की तरह इस बार भी महज अपना फर्ज पूरा करते हुये उसके  परिवार के लिये मिठाईयां लाता है लेकिन साथ ही उन लोगों को भी साथ लाता है जो उसके बाप के दिये वचन के तहत उसका फर्ज पूरा करने के बाद उस घर को लूटने वाले थे । तीसरी  कहानी   खोल दो रघुवीर यादव की है यानि एक मुसलमान बाप की है जो बंटवारे की आग से बचते हुये अपनी बेटी सकीना को लेकर भाग रहा  है लेकिन इस बीच उसकी बेटी उससे बिछड़ जाती है बाद में कैंप में वो उन चार  मुस्लिम नोजवानों को अपनी बेटी के बार बताते हुये गुजारिश करता है कि वे चारों अमृतसर जाते रहते हैं लिहाजा वहां वे उसकी बेटी की भी खोज खबर ले । एक बार उन चारों को सकीना मिल जाती है लेकिन वे उसे बाप के हवाले करने से पहले अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं । चौथी कहानी ऐसे दो फोजियों की हैं जो बंटवारे से पहले एक ही रेजीमेंट  में थे । काश्मीर में तैनात ये दोनों फोजी पहले की तरह आज भी पक्के दोस्त हैं और बंटवारे के बाद दुश्मन होते हुये भी मानवता का परिचय देते हैं।

राहत काज़मी ने मंटो की मशहूर चार कहानीयो को फिल्म का विषय बनाया है और बिना किसी लाग लपेट के ईमानदारी से दर्शाया है। दरअसल कहानी के पात्रों के लुक, भाषा और पहनावे को नजर अंदाज करते हुये निर्देशक ने सिर्फ कहानीयों पर ध्यान दिया । यहां तक उसने रघुवीर यादव, वीरेन्द्र सक्सेना के अलावा कोई भी नाम चीन कलाकार नहीं लिया बल्कि अपने साथ प्रडयूसर तारिख खान को एक दो कहानियों का पा़त्र बना दिया। इन में रघुवीर यादव सोनल सहगल और शोहेब निकास शाह ने अच्छा काम किया बाकी सभी साधारण रहे।  इन चारों कहानीयों से पता चलता है कि मंटो एक अमन परस्त मानवतावादी  तथा अहिंसावादी इंसान थे । उन्होंने अपनी कहानीयों के तहत दोनों तरफ हुई बरबरता को पूरी ईमानदारी से बताने की कोशिश की है। राहत काजमी इसलिये भी शाबासी के हकदार हैं क्योंकि मंटो या उनकी कहानीयों को लेकर अभी तक किसी ने भी फिल्म नहीं बनाई। फिल्म कई फिल्म फेस्टिवल्स में शिरकत कर कितनी ही इनाम इकराम पा चुकी है। आगे नंदिता दास मंटों पर जरूर एक फिल्म बनाने जा रही हैं।


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Mayapuri

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