मराठी फिल्म ‘सैराट’ लाई अच्छे दिन…

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क्या सिनेमा जातिवाद की ओर बढ़ेगा?

नागराज मंजुले की फिल्म ‘सैराट’ ने सफलता का नया अध्याय लिखा है। तीन हफ्ते में 67 करोड़ की कमाई की कल्पना भी मराठी फिल्म उद्योग ने नहीं की होगी। इससे पहले मराठी फिल्म ‘नट सम्राट’ ने कामयाबी का परचम लहराया था। यानि – मराठी सिनेमा के अच्छे दिन आ गये हैं।
और इसके साथ ही शुरू हुई है बॉलीवुड में एक नये दौर के कथावस्तु की तलाश। ‘सैराट’ के जैसी कथानक वाली कई फिल्मों की घोषणा होने जा रही है। बता दें कि इस फिल्म की कहानी में एक दलित होनहार लड़का एक स्वर्ण पाटिल लड़की के प्यार में पड़ जाता है और उत्पीड़न की विभीषिका से गुजरता है। यानि-सिनेमा पर क्षेत्रियता का जातिवाद असर रंग दिखा रहा है। और, हो भी क्यों न! जो लोग मानते हैं कि सिनेमा समाज की तत्कालिक परिस्थितियों से अलग नहीं जा सकता, वे लोग समझ सकते हैं कि ‘सैराट’ की कामयाबी के पीछे क्या सोच है। आज पूरे देश में, स्थानीय राजनीति की कामयाबी का सेहरा जातीय-समीकरण में छुपा हुआ है। क्षेत्रियता भारी पड़ रही है। मद्रास, बंगाल, असम के चुनाव का परिणाम क्षेत्रीय सोच का फल है। अब, सिनेमा पर वही रंग चढ़ने लगा है। मराठी में ‘सैराट’ और दक्षिण में ‘बाहुबली’ की सफलता यह संकेत है कि अब सिनेमा बदल रहा है और बदलाव जारी रहेगा।
हिन्दी-सिनेमा की जातिवाद आधारित प्रेम कथा को महत्व नहीं दिया जाता है। जाति और वर्ग-भेद लवस्टोरी के मुख्य मुद्दे नहीं थे। बावजूद इसके वैसी फिल्में जब भी बनी हैं, अपना असर छोड़ गयी हैं। ‘सुजाता’, ‘अंकुर’, ‘बैंडिट क्वीन’, ‘आकर्षण’, ‘ओमकारा’ आदि फिल्में एक रेवोल्यूशन थी। ‘सैराट’ बनाने के पीछे वही सोच है। जाहिर है इस फिल्म की कामयाबी सिनेमा को जातिवाद की ओर धकेलेगी। अब ये अच्छे दिन आने के संकेत हैं या खराब… आप सोचिये!


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Mayapuri

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