साल 2015 में बनी ये अर्थपूर्ण फिल्में

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बॉलीवुड में हर साल बनने वाली फिल्मों में कई फिल्में बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण और तार्किक होती हैं। लेकिन वो फिल्में उन फिल्मों के बीच कहीं न कहीं दबकर रह जाती हैं जो बिग बजट की होती हैं या फिर उनमें बड़े स्टार्स होते हैं ऐसे में इन फिल्मों को उतनी तवज्जो नही दी जाती जितनी की वो हकदार हैं मगर अच्छी और तर्कसंगत फिल्मों के शौकिन इन फिल्मों को कभी मिस नहीं करना चाहेंगे भले ही इन फिल्मों में बड़े स्टार्स न हो भव्य सेट न हो लेकिन बावजूद इसके ये फिल्में एक अलग ही वर्ग के दर्शकों के दिलों में घर कर जाती हैं और ये फिल्म भारतीय सिनेमा में बनने वाली बाकी फिल्मों से काफी अलग होती हैं। ऐसी ही फिल्मों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं

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मसान

फिल्म निर्देशक नीरज घेवान की ‘मसान’ को कान्स, अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में अन सर्टेन रिगार्ड श्रेणी में एफआईपीआरईएससीआई पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये फिल्म अपने अंदर दो अलग अलग कहानियां समेटे हुए है, दोनों की कहानियों में अलग अलग संघर्ष है। पहली कहानी एक निम्न जाति के दीपक की है, जो एक उंची जाति की लड़की से प्यार कर बैठता है। दूसरी कहानी है देवी की जो एक ऐसे जाल में फंस जाती है, जिससे उसके लिए बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता है।

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तलवार

नोएडा के आरूषि हत्या कांड पर आधारित इस फिल्म का निर्देशन मेघना गुलजार ने किया था और फिल्म की कहानी लिखी थी विशाल भारद्वाज ने। आरूषि हत्याकांड अभी तक पुलिस और सीबीआई दोनों के लिये सबसे जटिल केस साबित हुआ है, बेशक आज आरूषि की हत्या के जुर्म में उसके मां बाप जेल में है लेकिन ये फिल्म देखने के बाद इस केस के अनछुए पहलुओं से आप रूबरू होंगे। आपको इस केस से जुड़ी वो बातें पता चलेगी जो शायद आप पहले न जानते है और न सुनने में मिली हो। बता दें कि इस फिल्म में इरफान खान, कोंकणा सेन शर्मा और नीरज काबी मुख्य भूमिकाओँ में थे।

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किस्सा

फिल्म ‘किस्सा: द टेल ऑफ लोनली गोस्ट’ बेहद ही कम बजट में बनी है। इस फिल्म का सबजेक्ट काफी अलग है, फिल्म का निर्देशन अनूप सिंह ने किया है। टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में अवॉर्ड जीतने वाली यह फिल्म 1947 भारत-पाक विभाजन पर आधारित है। ये कहानी है एक पिता कि जिसकी चार बेटियां है जिनमें से एक का पालन पोषण वो लड़के की तरह करता है, लेकिन बाद में उसके जीवन में काफी परेशानियां आ खड़ी होती हैं। इस फिल्म में इरफान खान और टीस्का चोपड़ा मुख्य भूमिकाओँ में है और ये फिल्म इस साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक है।

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कोर्ट

न्यायपालिका के सच को आईना की तरह साफ तौर पर दिखाती ये फिल्म बहुत कुछ बयां करती है। ये फिल्म अब तक कई पुरस्कार जीत चुकी है जिसमें राष्ट्रीय के साथ साथ अंतर्राष्ट्रीय अवॉर्ड भी शामिल है। भारतीय सिनेमा की फिल्मों में दिखाई जाने वाली अदालतें अक्सर ड्रामाई होती हैं या यूं कहे कि वो वास्तविकता से कोसों दूर होती हैं लेकिन चैतन्य तम्हाणे की फिल्म कोर्ट आपको हमारी अदालतों और उनके स्तंभ अधिवक्ताओं-न्यायाधीशों की कार्यप्रद्धति और उनके जीवन के अलग अलग पक्षों को उजागर करके सामने रखती है।

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मार्गरिटा विद ए स्ट्रा

‘मार्गरिटा विद ए स्ट्रा’ एक ऐसी लड़की ‘लैला’ की कहानी है जो ‘सेरेब्रल पाल्सी’ नाम की बीमारी से पीड़ित है। यह बीमारी शरीर के अंगों को शिथिल कर देती है। इस कारण लैला एक असहज जिंदगी जीने लगती है। ये फिल्म हमारे समाज की मनोदशा पर भी एक बड़ा सवाल करती है साथ ही ये फिल्म समलैंगिकता के मसले को भी उठाती है। एक शारीरिक अक्षमता से पीड़ित व्यक्ति के साथ उसके परिवार वालों की भवानाएं कैसे समय समय पर बदलती है ये सब इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है। भारतीय सिनेमा में बनने वाली बाकी फिल्मों से काफी अलग फिल्म है मार्गरिटा विद ए स्ट्रा। इस फिल्म में लैला का किरदार कल्कि कोचलिन ने अदा किया है।

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दृश्यम

एक चौथी फेल इंसान अपने परिवार को बचाने के लिए किस तरह से जद्दो जहद करता है इस फिल्म का सबसे ज्यादा स्ट्रांग प्वाइंट यही है। डायरेक्टर निशिकांत कामत के निर्देशन में बनी ये फिल्म दर्शकों के दिलों में उतर जाती है। एक पिता जो अपने परिवार को बचाने के सारी हदें पार कर जाता है और रास्ते में आने वाली हर चुनौती का डटकर सामना करता है। उस पिता का हौंसला और जज्बा वाकई देखने लायक है।

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मिस टनकपुर हाजिर हो

इस फिल्म का ताना बाना एक अलग की घटना को लेकर बुना गया है पत्रकार से निर्देशक बने विनोद कापड़ी ने फिल्म ‘मिस टनकपुर हाजिर’ हो से बॉलीवुड में बेहतरीन शुरूआत की है। छोटे शहरों में अंधविश्वास, खाप पंचायत के खोखले फैसले से लेकर कानूनी व्यवस्था पर कटाक्ष करती हुई ये फिल्म समाज को एक गहरा संदेश देती है। समाज का एक तबका ऐसा भी है जहां नारियों से लोग जानवर की तरह पेश आते हैं। भले ही हम लाख कोशिश कर ले, लेकिन उनकी सोच नहीं बदल सकते, ये फिल्म इस बात का अच्छे से समझाती है।

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कौन कितने पानी में

पानी के महत्व को दर्शाती इस फिल्म की कहानी को एक व्यंग्यात्मक तरीके से पेश किया है। ये एक ऐसे गांव की कहानी है जो कि पानी की कमी से जूझ रहा है और पानी की कमी की वजह से ही इस गांव के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। नौबत यहां तक आ जाती है कि गांव के लोग गांव को बेचने के लिए आतुर हो जाते हैं लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं है ये सारी जद्दो जहद दरअसल पानी के लिए है। बता दें भारत की 70 फीसदी आबादी आज भी पानी की कमी से जूझ रही है। इस समस्या को बारीकी से दर्शाती है ये फिल्म।

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तितली 

‘तितली’ एक ऐसी फिल्म है जिसे देखने के बाद आप आसानी से अपने दिमाग से बाहर नहीं निकाल पाएँगे। जहां एक ओर हमारी बॉलीवुड की फिल्मों में एक हंसता खेलता परिवार दिखाया जाता है वहीं ये फिल्म कहानी है एक ऐसे परिवार की है जो अभावो में जी रहा है। इन्हे खुद को जिंदा रखने के लिए किस तरह से जद्दो जहद करनी पड़ती है ऐसी स्थिति में कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। लेकिन इस फिल्म में बताया गया है कि ये लोग बुरे नहीं बल्कि परिस्थितियां बुरी हैं जो उन्हें ये सब करने पर मजबूर कर रही हैं।

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एंग्री इंडियन गोडेसेस

निर्देशक पैन नलिन के निर्देशन में बनी फिल्म ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेस’ एक अलग ही तरह की फिल्म है, जिसमें सात लड़कियों की कहानी घढ़ी गई है जो अपनी अपनी जिंदगी से जूझ रही हैं कोई अपनी शादीशुदा जिंदगी से खफा है तो कोई अपना करियर बनाने के लिए संघर्ष कर रही है इतना ही नहीं एक नौकरानी और एक समलैंगिक लड़की भी कहानी है इस फिल्म में बॉलीवुड की बाकी फिल्मों से कई मायनों में अलग है ये फिल्म ।

 


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Mayapuri

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