बहुत याद आयेंगी मीना कुमारी

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मायापुरी अंक 49,1975

पहली अगस्त को मीना कुमारी पैदा हुई थी। वह आज हमारे बीच नहीं किंतु उसकी यादों के कमल अब भी महक रहे हैं।

जाने वाले कभी नहीं आते,

जाने वालों की याद आती है।

यह प्रसिद्ध पंक्तियां भी मीना कुमारी की एक यादगार फिल्म ‘दिल एक मंदिर’ के गीत के मुखड़े की है। राज कुमार ने उस फिल्म में मीना कुमारी के पति का रोल अभिनीत किया था। राजेन्द्र कुमार की मौत पर बैक-ग्राउंड में यह गीत उभरता है। आज वही गीत हमें मीना कुमारी की यादों की वादी में ले गया। जहां बेशुमार छोटे-बड़े दिलकश फूल मीना कुमारी के नाम की खुश्बू से वादी को महकाए हुए हैं। ऐसे ही चंद फूल पेशे-खिदमत हैं।

अशोक कुमार बेबी मीना के दिल पसंद हीरो थे। वह उनकी हर एक फिल्म देखती थी। चाहे उसके देखने के लिए उसे पैसे ही क्यों न चुराने पड़ते। और बाद में मार भी खानी पड़ती। मां बाप जितना उसे रोकते वह उतना ही और अधिक अशोक कुमार की फिल्में देखती। उसे जब पता चलता कि अशोक कुमार की नई फिल्म आ रही है तो वह खुशी से पागल हो जाती।

मुंबई टॉकीज की फिल्म ‘अंजान’ में अशोक कुमार के साथ मीना कुमारी की बहन माधुरी भी काम कर रही थी। मीना कुमारी को जब पता चला तो मीना ने बाप जिदां की कि मैं ‘अनजान’ की शूटिंग देखूंगी।

तूं वहां जाकर क्या करेगी?

बाप ने टालने के लिए कहा।

“मैं अशोक कुमार को देखूंगी” मीना कुमारी ने कहा।

बाप ने जितना टालने की कोशिश की मीना की जिद उतनी ही बढ़ती गई। और आखिर को मीना ने सैट पर जाकर ही दम लिया। सैट पर अशोक कुमार बड़े प्यार से मिले। मीना से अशोक कुमार ने मज़ाक करते हुए कहा।

क्यों बेबी हमारे साथ फिल्म में काम करोगी?

क्यों नहीं! आप हमारे साथ काम करेंगे? मीना कुमारी ने खड़े होकर कहा।

हां हां, तुम बड़ी हो जाओ तो फिर हम तुम्हारे साथ ही रोल करेंगे।

अशोक कुमार ने यह बात उस वक्त मीना का दिल खुश करने के लिए कही थी। लेकिन कुदरत ने मीना के इस सपने को ‘तमाशा’ में साकार कर दिखाया।

मुंबई टॉकीज के ‘तमाशा’ में दो हीरो थे। एक अशोक कुमार और दूसरे देव आनंद! हीरोइन रोल के लिए निर्माता ने मीना कुमारी को साइन करने के लिए आदमी भेजा तो मीना कुमारी ने पूछा हीरो कौन है?

अशोक कुमार!

इतना सुनकर मीना कुमारी ने तुरंत बिना कुछ पूछे-गुछे फिल्म साइन कर ली। लेकिन मीना कुमारी का सपना साकार होकर भी अधूरा ही रह गया। ‘तमाशा’ में एक दृश्य भी ऐसा न था जिसमें अशोक कुमार और मीना कुमारी एक साथ काम कर सकते। हां, एक दृश्य ऐसा जरूर था कि एक ओर से मीना कुमारी बाहर जाती है और उसी तरफ से अशोक कुमार की एन्ट्री होती है। इस पर भी मीना कुमारी खुश हो रही थी कि चलो पल भर के लिए ही सही किंतु वह अशोक कुमार के साथ काम तो कर सकी। किंतु निर्देशक ने यह दृश्य अलग-अलग ढंग से फिल्म में बंद कर लिया। ‘तमाशा’ खत्म हो गया। अशोक कुमार और मीना कुमारी का सामना न होना था न हुआ।

बहुत दिनों के बाद ‘परिणीता’ में पहली बार अशोक कुमार के साथ मीना कुमारी को काम करने का अवसर मिला।

मीना कुमारी का बचपन बच्चों के बजाए स्टूडियो की झुलसा देने वाली रोशनियों के दरमियान गुजरा। और जवान होने पर जब शादी हुई तो वह बच्चों से वंचित रही। इसलिए बच्चों से मुहब्बत होना स्वाभाविक ही था। वह हर अच्छा बच्चा देखकर उसकी ओर आकृष्ट हो जाती थी। उससे दोस्ती करने की कोशिश करती थी।

मास्टर अज़ीज नामक एक बाल कलाकार ने मीना कुमारी के साथ फिल्म ‘भाभी की चूड़िया’ में काम किया था। मास्टर अज़ीज शुरू-शुरू में मीना कुमारी से दूर रहने की कोशिश करता, केवल काम के वक्त ही मीना के पास आता और काम होते ही दूर चला जाता। मीना को वह बड़ा अच्छा लगता था। इसलिए वह अधिक से अधिक उसको करीब रखने की कोशिश करती। और आहिस्ता आहिस्ता वह मीना के साथ खुलने लगा।

एक दिन मीना और अज़ीज बैठे हुए बातें कर रहे थे बलराज साहनी सैट पर आये और मीना कुमारी का हाथ अपने हाथ में लेकर बातें करने लगे। बलराज साहनी का यह व्यवहार देखकर अज़ीज आगे बढ़ा और मीना कुमारी का हाथ बलराज के हाथ से अलग कर दिया। और बोला शर्म नहीं आती लड़की का हाथ पकड़ते हुए।

ऐसे ही फिल्म ‘बैजू बावरा’ के एक गीत तू गंगा को मौज, मैं जमना की धारा, की फिल्म बन्दी चल रही थी। मीना कुमारी एक किश्ती में बैठी हुई थी। अलीबख्श मुंह फेरे खड़े थे। क्यों कि किसी ज्योतिषी ने बताया था कि इस बच्ची को आग और पानी से बचाना और उस वक्त पानी में ही शूटिंग हो रही थी। किश्ती में मीना अकेली थी। शूटिंग के दौरान कट होने पर निर्देशक विजय भट्ट ने ‘कट’ कहा। लेकिन मीना कुमारी पता नही किस मूड में थी कि उन्होंने वह सुना नहीं। और किश्ती को आगे ही आगे लिये चली गई। पानी का बहाव तेज होता चला गया और भंवर करीब आ गया। किनारे पर के मकानात वाले चिल्लाने लगे। मीना ने समझा कि वह लोग उसे पहचान गए हैं इसलिए चिल्ला रहे हैं। इसलिए हाथ हिला-हिला कर उन्हें जवाब देने लगी। इतने में उसने पानी के गिरने की आवाज़ सुनी। उसने सुन रखा था कि नदी यहां से ऊंचाई से नीचें गिरती हुई बहती है। और उस वक्त किश्ती उसी ओर खिसक रही थी। बस फिर क्या था मीना के हाथों के तोते उड़ गए। उसे अपनी मौत नज़र आने लगी किश्ती रोकने की सारी कोशिशें असफल हो चुकी थी। वह मदद के लिए चिल्लाने लगी। और आखिर घबरा कर आंखे बंद कर ली और खुद को प्रवाह के रहम पर छोड़ दिया। क्योंकि उसे लगा कि बस यहां जिंदगी खत्म है। लेकिन कुछ नहीं हुआ। मीना कुमारी ने आंखे खोल कर देखा तो किश्ती पत्थरों के बीच अटकी हुई है। जहां किश्ती अटकी थी वहां से लगभग बीस कदम पर ही नदी गिर रही थी। मीना को चूंकि एक महान अभिनेत्री बनना था इसलिए वह जी गई। वरना आज कौन मीना कुमारी को इस अंदाज से याद करता?

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Mayapuri