INTERVIEW!! ‘‘उस फिल्म से इसका कोई तालमेल नहीं है’’ – निर्देशक सुभाष कपूर-

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पत्रकारिता से निर्देशन के क्षेत्र में आये सुभाष कपूर की पहली फिल्म का नाम था ‘सलाम इंडिया’लेकिन फिल्म ‘फंस गये रे ओबामा’ से उन्हें बतौर निर्देशक पहचान मिली और ‘जाॅली एल एल बी’ जैसी हिट फिल्म से प्रतिष्ठा। उनकी ताजा तरीन फिल्म का नाम हैं ‘गुड्डू रंगीला’। एक्शन काॅमेडी ड्रामे से सरोबर इस फिल्म में भी उनके फेवरेट स्टार अरशद वारसी हैं। उनके अलावा अमित साद तथा अदिति राव हैदरी और रोनित राय प्रमुख भूमिकाओं में हैं । इस फिल्म को लेकर उनसे एक बातचीत।

सुभाष का कहना है कि मै उन दिनों पाॅलीटिक्ल जर्नलिस्ट हुआ करता था । जब फिल्मों में आया तो मेरी पहली फिल्म थी ‘सलाम इंडिया’ लेकिन वो फिल्म ज्यादा कुछ नहीं चल पाई। दूसरी फिल्म ‘फंस गये रे ओबामा’ ने बतौर निर्देशक एक पहचान दी। ‘जाॅली एल एल बी’ ने बाॅलीवुड में पूरी तरह से स्थापित किया। जाॅली… की बात की जाये, तो जिन दिनों मैं जर्नलिस्ट हुआ करता था। उन्हीें दिनों मुझे एक केस के सिलसिले में कोर्ट जाना पड़ा। हां मैने देखा कि अभी तक मेरे दिमाग में कोर्ट कचहरी के काम करने की जो तस्वीर थी। इसके अलावा हम फिल्मों जो कोर्ट देखते आये। वहां तो सब कुछ अलग था। न तो चीख कर योरानर योरानर कहते हुये वकील थे और न ही आर्डर आर्डर करते हुये अपने हथोड़े को मेज पर ठोकता जज था। वहां सारा काम बड़े आराम से हो रहा था। बस वहीं से मुझे जाॅली एल एल बी बनाने का आइडिया आया।

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गुड्डू रंगीला के बारे में बात की जाये तो मेरा कहना है कि ये दो भाईयों की कहानी है जो माता के जगराते में भजन कीर्तन करते हैं । नार्थ स्टाइल में इनकी एक आरकेस्ट्रा पार्टी है । इनमें गुड्डू यानि अमित साद एक चंचल और मस्तमौला किस्म का युवक है, वहीं रंगीला यानि अरशद वारसी अपने नाम के विपरीत गंभीर बंदा है। दरअसल पहले वो भी अपने नाम के जैसा ही था लेकिन उसके अतीत के पीछे घटी एक घटना ने उसे गंभीर बना दिया। अचानक उन्हें एक लड़की बेबी यानि अदिति राव हैदरी की किडनेपिंग का काम करना पड़ जाता है। बेबी दीखने में मासूम लगती है लेकिन किडनेपिंग भी उसी का गेम है। इस तरह वहि फिल्म के किरदार को यहां वहां घुमाती है। बिल्लू पहलवान यानि रोनित राय हरियाणे के दबंग पहलवान दिखाये गये हैं। मैं बिल्लू को महाराश्ट्रीयन पहलवान भी दिखा सकता था लेकिन जंहा पहलवान की बात आती है तो हरियाणे का नाम वजन पैदा करता है। रोनित एक ऐसा धाकड़ आदमी हैं जिससे पंगा लेने की कोई हिम्मत नहीं करता। लेकिन ये दोनों भाई इत्तफाकन बेबी को किडनेप कर उससे पंगा लेकर फंस जाते हैं। रोनित को मैं दाद देना चाहूंगा क्योंकि उन्होंने अपनी भूमिका के लिये बाकायदा पहले हरियाणवी सीखी तथा बाॅडी पर भी मेहनत की। जिसमें उन्हें करीब छ महिने लगे। फिल्म कं जाॅनर की बात की जाये तो ये एक्शन काॅमेडी ड्रामा है। बेशक ये दर्शकों का मनोरजंन करने में कामयाब होगी। जहाँ तक मेरी बात है तो फिल्म बनाते वक्त मैंने किसी किस्म का दबाव न लेते हुये वही किया जो मैं चाहता था।

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फिल्म में कुल चार गाने हैं जो अमित त्रिवेदी ने कंपोज किये हैं तथा जिनके रचियता है इरशाद कामिल। लोग बाग इस फिल्म की तुलना जाॅली एल एल बी से कर रहे है लेकिन उन्हें मैं क्लीयर कर देना चाहता हूं कि उस फिल्म से इसका कोई तालमेल नहीं। अरशद वारसी भी बाकी फिल्मों से अलग दिखाई देगें। बेशक यहां वे गंभीर दिखाई देने वाले हैं लेकिन फिर भी उनकी सिचवेशन लोगों को मुस्कराने पर मजबूर करती हैं । दरअसल अरशद मेथर्ड एक्टिंग में बिलीव नहीं करते। इसलिये हमेशा स्वाभाविक दिखाई देते हैं। उन्हें बस स्क्रिप्ट समझाने की देर है इसके बाद वे पूरी तरह से किरदार में समा जाते हैं। मुझे उनके साथ काम करते हुये बहुत अच्छा लगता है। फिल्म में दिल्ली से पंजाब तक कहानी है। डेफिनेटली खासकर नार्थ इंडियन दर्शक फिल्म से जरूर रिलेट करेगें ।

dir. subhash kapur


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