मूवी रिव्यू: इराक कुवैत की जंग में घटी अविश्वसनीय घटना पर बनी अद्भुत फिल्म है ‘एयरलिफ्ट’

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रेटिंग***

आज बॉलीवुड में बड़े स्टार्स या प्रोड्यूसर्स सौ दो या तीन चार सौ करोड़ के फेर में पड़े हुये हैं। ऐसे में इन्हीं में शामिल एक स्टार सौ करोड़ उघाने वाली फिल्मों के अलावा ऐसी फिल्में भी कर रहा है या बना रहा है जिनमें कहीं न कहीं देश प्रेम या उससे रिलेटिड संदेश होते हैं। उसका नाम है अक्षय कुमार। बेशक ये फिल्म सौ या दो सौ करोड़ नहीं करती लेकिन इनमें घाटा भी नहीं होता। इन्हीं फिल्मों की अगली कड़ी हैं निर्देशक राजा मेनन की फिल्म ‘एयरलिफ्ट’। आज से पच्चीस साल पहले विश्व की सबसे ज्यादा चौंका देने वाली इस घटना को अक्षय कुमार ने इस फिल्म के द्वारा पूरी दुनिया के सामने लाने का कारनामा कर दिखाया है।

कहानी

रंजीत कत्याल यानि अक्षय कुमार कुवैत का जाना माना ऐसा बिजनिसमैन है जो अपने आपको इंडियन नहीं बल्कि कुवैती मानता है। बिजनिस में वो अपने सगे या यार दोस्त से भी समझौता नहीं करता। बात 1990 के दौरान की है जब इराक और कुवैत के बीच कुछ अनबन चल रही थी अचानक एक दिन इराक ने कुवैत पर हमला कर दिया लिहाजा बाहर से आये अन्य लोगों की तरह वहां काम कर रहे या रह रहे एक लाख सत्तर हजार इंडियंस भी सड़क पर आ गये। यहां तक उनकी जान के लाले तक पड़ गये।

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रंजीत कत्याल का बिजनिस भी बरबाद हो गया लेकिन हालात ने उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन ये किया कि अब उसे अपने परिवार के अलावा उन एक लाख सत्तर हजार भारतीयों की भी फिक्र थी, इसलिये उसने निश्चय किया कि वो उस वक्त तक वहां से नहीं जायेगा जब तक उन सारे भारतीयों को इंडिया नहीं भेज देता। इसके लिये वो अपने कुछ दोस्तों के साथ ऐसा कुछ कर जाता है कि 59 दिनों में तकरीबन 448 एयर इंडिया की उड़ानों द्वारा सारे भारतीयों को उनके घर तक पुहंचाने में कामयाब हो जाता है।

निर्देशन

निर्देशन के अलावा फिल्म की कहानी राजा मेनन ने अपने कुछ साथियों की मदद से पूरी की। इस अद्भूत साहसी कारनामे पर उतने ही साहस से राजा ने फिल्म को एक ईमानदारी से अंजाम दिया। कुवैत और उस पर होते हमले, इराक के महज पंदरह सोलह साल के बच्चे हाथ में संगीन लेकर कुवैत में दरींदगी से लूटपाट करते हुये चुन चुन कर कुवैतियों को मार रहे थे। ये सभी दृश्य मार्माहित कर देने वाले हैं। इसके अलावा कुवैत और वहां फंसे इंडियंस के लिये इकलौता शख्स अपने बच्चे और बीवी की परवाह किये बिना क्या कुछ कर रहा था। उस दौरान भारत सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी क्योंकि बेशक सद्दाम हुसैन इंडिया का दोस्त था लेकिन इसके लिये इंडिया अमेरिका या अन्य देशो से रिश्ते खराब नहीं कर सकता था। बावजूद इसके मिनिस्ट्री में कुछ लोग रंजीत की मदद कर रहे थे।

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बाद में किस प्रकार करीब डेढ़ लाख से ज्यादा भारतीयों को वाया जार्डन एयरपोर्ट से एयरइंडिया के विमानों द्वारा इंडिया पहुंचाया जाता है। ये सारी बातें फिल्म असरदार ढंग से बताती है युद्ध के तथा अन्य दृश्यों में विजुअल इफेक्ट्स कमाल के हैं निर्देशक ने ये कहानी स्तब्ध कर देने वाले ढंग से दर्शाई है। इसके लिये वे उतने ही बधाई के पात्र हैं जितने कि फिल्म के प्रोड्यूसर्स।

अभिनय

रंजीत कत्याल की भूमिका में अक्षय ने पूरी तरह से घुस कर अभिनय किया है। उनकी पत्नी की भूमिका में निमरत कौर ने भी बढि़या अभिव्यक्ति दी है। इनके अलावा फरियाना वजीर, पवन चोपड़ा, कैजाद कोतवाल, नरेन्द्र जेटली, समीर अली खान तथा पूरब कोहली आदि कलाकारों का अच्छा सहयोग रहा। फिल्मीस्तान के बाद एक बार फिर इंजामुलहक इराकी मेजर की भूमिका में प्रभावित करने मे कामयाब रहे।

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संगीत

फिल्म में जैसे कहानी संगीत को साथ लेकर चली है। लिहाजा फिल्म के गीत भी कहानी का हिस्सा बन गये। जिनमें एक गीत तू भूला जैसे काफी इमोशनल सांग है ।

क्यों देखें

आज से पच्चीस साल पहले घटी घटना जिससे अभी तक तकरीबन सभी अंजान थे। उसे प्रत्यक्ष देखने के लिये ये फिल्म जरूर देखें।

 


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Mayapuri

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