मूवी रिव्यू: अन्ना हजारे की जर्नी को दर्शाती है ‘अन्ना- किसन बाबूराव हजारे’

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रेटिंग***

अभी तक खिलाड़ीयों पर बनी बायोपिक फिल्में सर्वथा हिट साबित रही हैं लेकिन शशांक उदापुरकर द्धारा लिखित निर्देशित फिल्म ‘अन्ना- किसन बाबूराव हजारे’ शायद पहली ऐसी बायोपिक है जो किसी प्रसिद्ध समाज सेवक पर बनी हों। अन्ना हजारे पर बनी इस फिल्म में उनके बचपन से लेकर अभी तक की जर्नी दिखाई गई है।

कहानी

महाराष्ट्र के गांव रालेगण सिद्धी के एक गरीब किसान के यहां पैदा हुए किसन हजारे को बचपन में ही उसके मामा मुबंई ले आये थे लेकिन उनका मन पढ़ाई में ज्यादा नहीं लगा इसलिये उन्होंने वहीं छोटा मोटा काम करना शुरू कर दिया। बाद में वे सेना में भर्ती हो गये। वहां भी उनका मन नहीं लगा तो वे फोज की नौकरी छोड़ कर गांव आ गये। यहां आने के बाद सबसे पहले उन्होंने गावं में सूखे की समस्या को खत्म करते हुए गांव में पानी की समस्या हल की। उसके बाद गांव में अपनी पूरी कमाई से मंदिर बनवाया। उसके बाद गरीब किसानों को साहुकार के चुगंल से छुड़वाने के लिये कार्य किया। बाद में उन्होंने अपना परिवार त्याग गांव के मंदिर को ही अपना वास बना लिया। इसके बाद अन्ना अपने गांव से निकल पूरे महाराष्ट्र के गरीब और किसानों के लिये कार्य करने के लिये निकल पड़े। इस बीच उन्होंने किसानों और आम आदमी के हित में नये कानून बनवाये। बाद में उन्होंने देखा कि आम आदमी के लिये तो कानून है लेकिन बड़े सरकारी ऑफिसरों और नेताओं मंत्रीया के लिये कोई काननू नहीं इसलिये उन्होंने पिछले बयालिस साल से संसद में धूल फांक रहे जनलोकपाल को पारित करने का सरकार से आव्हान किया। जब सरकार ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया तो उन्होंने दिल्ली आकर आमरण अनशन शुरू कर दिया। इस बार उनके साथ जैसे पूरा देश खड़ा हो गया। आखिर उनके सामने सरकार को झुकना पड़ा।annaz-hazare

निर्देशक

फिल्म के लेखक निर्देशक शशाक एक अभिनेता भी हैं। फिल्म में उन्होंने ही अन्ना का किरदार निभाया है। फिल्म में अन्ना के बचपन से लेकर उनके जनलोकपाल बिल तक के संघर्श को दर्शाया है। फिल्म में गरीब आदमी आम आदमी ओर किसानो के लिये उनका संघर्ष गांधीजी की तरह अहिंसक रहा है। जिसके लिये निर्देशक ने कुछ रीयल तो कुछ अन्य लोकशनों का प्रयोग किया। फिल्म मध्यांतर तक अन्ना के बचपन और उनके सेना छोड़ वापस गांव आने तक का विवरण है जो ज्यादा दिलचस्प नहीं रहा जबकि निर्देशक ढेर सारी बातें एंकरिंग के द्धारा बता सकता था। मध्यांतर के बाद फिल्म से दर्शक पूरी तरह जुड़ जाता है और आखिर तक जुड़ा रहता है।

अभिनय

शशांक ने अन्ना के बारे में अच्छी रिसर्च की है इसके अलावा उनके किरदार को भी भली भांती निभाया है। उनके अलावा साहुकार बने गोविंद नामदेव, गरीब किसान बने दया शंकर पांडे तथा अप्पा की भूमिका में किशोर कदम आदि सभी कलाकारों ने बढ़िया अभिनय किया है तथा टीवी एंकर के रोल में रजित कपूर, टीवी रिर्पोटर तनिषा मुखर्जी और सेना ऑफिसर की भूमिका में शरत सक्सेना भी प्रभावशाली रहे।anna-hazare

संगीत

फिल्म के संगीतकार स्व. रविंद्र जैन हैं जिन्होंने कहानी में गुंथा हुआ संगीत बनाया है जो कहानी को और ज्यादा पारदर्शी बनाता है।

क्यों देखें

आज किसन बाबूराव हजारे को पूरा देश एक प्रसिद्ध समाल सेवी के रूप में तो जानता है। उनके अभी तक के जीवन की यात्रा दर्शाती है ये फिल्म लिहाजा उनके बारे में जानने के लिये फिल्म देखी जा सकती है।

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Mayapuri