मूवी रिव्यू: वरूण और आलिया का दमदार अभिनय ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’

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आज भी देश के अधिकांश भाग में लड़की की पैदाईश तथा दहेज प्रथा जैसी कुरितियां आधुनिक समाज का मुहं चिढ़ा रही  हैं । धर्मा प्रोडक्शन द्धारा निर्मित तथा शशांक खेतान द्धारा निर्देशित फिल्म ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ एक मध्यम वर्गीय लड़की की कहानी है  जो अपने अस्तित्व के लिये लड़ते हुये बताने में कामयाब होती है कि लड़की, लड़के से कहीं भी कम नहीं।

कोटा में  मध्यम परिवार की दो लड़कियाें आलिया भट्ट व  आकांशा सिंह की शादी के लिये उनका पिता स्वानंद किरकिरे चिंतित है क्योंकि उस अपनेे सामने लाखों का दहेज दिखाई दे रहा है। इसके अलावा जंहा उनकी बड़ी बेटी दर्जनों लड़के रिजेक्ट कर चुकी है, वहीं छोटी बेटी आलिया शादी न कर कोई बिजनिस या नोकरी करना चाहती है जिससे वो अपने बाप का सहारा बन सके। झांसी के साहूकार परिवार के दो बेटे हैं, पुनीत सिंह रतन  और बद्री नाथ बसंल यानि वरूण धवन। पुनीत की शादी एक बेहद पढ़ी लिखी लड़की उर्मिला से भारी दहेज लेकर  उसकी मर्जी के खिलाफ होती है जबकि वो कोई बड़ी नोकरी करना चाहती थी। लिहाजा पिता से छुपकर देव उर्मिला को अपने शो रूम का काम संभालने का मौंका देता है । जबकि बंसल परिवार में बहूयें नोकरी नहीं करती। एक शादी में वरूण, आलिया को देखता है और उस पर मर मिटता है और शादी करने के लिये उसके पीछे पड़ जाता है । पहले तो आलिया उसे भाव नहीं देती लेकिन बाद में उसे अपनी बड़ी बहन के लिये लड़का देखने का काम सौंपती है । तय होता कि दोनो बहनों की शादी एक ही मंडप में होगी । लेकिन एन शादी में आलिया गायब हो जाती है। बाद में पता चलता है वो मुबंई आकर एक एयर लाइंस में एयर होस्टेस सलैक्ट हो गई  है और अब वो टे्रनिंग के लिये बैंकॉक गई है। वरूण उसे ढूढंता हुआ बैंकांक पहुच जाता है । आलिया से मिलने पर पहले तो वो उसे धोखा देने के लिये धिक्कारता है लेकिन बाद में उसके साथ रहते हुये  उसे पता चलता है कि आज लड़कियां सिर्फ घर की शोभा नहीं रह गई हैं बल्कि वे भी लड़के की तरह अपने मां बाप का सहारा बन सकती हैं। जैसे आलिया  डेढ़ लाख मासिक की नोकरी करते हुये अपने पिता का बोझ करने के लिये कोशिश कर रही है । बाद में वरूण न सिर्फ अपने परिवार को दहेज जैसी खोटी परपंराओं से बाहर निकालता है बल्कि घर की बहूओं को भी उनके मन मुताबिक काम करने की आजादी दिलवाता है।varun-alai_640x480_51486020395

फिल्म की शुरूआत बहुत ही दिलचस्प और कॉमेडी वे में होती है जो मध्यातंर तक चलती है, लेकिन मध्यांतर के बाद  विदेश जाते ही पटरी से उतर जाती है और बैंकॉक की खूबसूरतीयों में खो जाती है । अचानक निर्देशक को याद आता है तो वो दौबारा फिल्म को कहानी पर ले आता है इसके बाद अच्छे क्लाईमेंक्स पर समाप्त होती है । फिल्म में कोटा ओर झांसी दो राज्य दिखाये गये हैं लेकिन दोनों के माहौल और भाषा पर ध्यान नहीं दिया गया । बावजूद इसके दोनों तरफ के किरदार अपनी अपनी जगह फिट हैं । फिल्म का हर फे्रम खूबसूरत है । झांसी और कोटा तथा बैंकॉक की लोकेशसं लुभावनी हैं । अगर फिल्म में मध्यातंर के बाद बैंकाक के  बीस मिनिट को नजरअंदाज कर दिया जाये तो कथा पटकथा तथा संवाद बढि़या रहे । लेकिन इस बार संगीत थोड़ा औसत रहा लेकिन तमा तमा गीत का रीमेक अच्छा रहा ।Badrinath

वरूण धवन पहले ही साबित कर चुका है कि वो इस तरह की भूमिकायें आराम से निभा सकता है इस बार भी उसने खूब मजे ले लेकर  अपनी भूमिका को अंजाम तक पहुंचाया है । आलिया तो इससे पहले भी अपनी उम्र से कई बड़ी भूमिकायें निभा चुकी है । इस बार भी उसने  अस्तित्व के लिये लड़ती लड़की की भूमिका को प्रभावशाली ढंग से अभिनीत किया है । सहायक भूमिकाओं में स्वानंद किरकिरे, आकांशा सिंह, छोटी सी भूमिका में गौहर खान, श्वेता वासू प्रसाद तथा पुनीत सिंह रतन आदि कलाकारों ने बढि़या काम किया है ।

ये कहने में में काई प्रॉब्लम नहीं कि हंप्टी शर्मा के बाद  इस बार भी उनकी दमदार भूमिकाओं में वरूण धवन और आलिया भट्ट  के प्रशंसक उन्हें पसंद करने वाले हैं ।

 

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Mayapuri